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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 95 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 95/ मन्त्र 1
    ऋषिः - गृत्समदः देवता - इन्द्रः छन्दः - अष्टिः सूक्तम् - सूक्त-९५
    93

    त्रिक॑द्रुकेषु महि॒षो यवा॑शिरं तुवि॒शुष्म॑स्तृ॒पत्सोम॑मपिब॒द्विष्णु॑ना सु॒तं य॒थाव॑शत्। स ईं॑ ममाद॒ महि॒ कर्म॒ कर्त॑वे म॒हामु॒रुं सैनं॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रिऽक॑द्रुकेषु । म॒हि॒ष: । यव॑ऽआशिरम् । तु॒वि॒ऽशुष्म॑: । तृ॒षत् । सोम॑म् । अ॒पि॒ब॒त् । विष्णु॑ना । सु॒तम् । यथा॑ । अव॑शत् ॥ स: । ई॒म् । म॒मा॒द॒ । महि॑ । कर्म॑ । कर्त॑वे । म॒हाम् । उ॒रुम् । स: । ए॒न॒म् । स॒श्च॒त् । दे॒व: । दे॒वम् । स॒त्यम् । इन्द्र॑म् । स॒त्य: । इन्दु॑: ॥९५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृपत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशत्। स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्रिऽकद्रुकेषु । महिष: । यवऽआशिरम् । तुविऽशुष्म: । तृषत् । सोमम् । अपिबत् । विष्णुना । सुतम् । यथा । अवशत् ॥ स: । ईम् । ममाद । महि । कर्म । कर्तवे । महाम् । उरुम् । स: । एनम् । सश्चत् । देव: । देवम् । सत्यम् । इन्द्रम् । सत्य: । इन्दु: ॥९५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 95; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (त्रिकद्रुकेषु) तीन [शारीरिक, आत्मिक] और सामाजिक [उन्नतियों] के विधानों में (तृपत्) तृप्त होते हुए (महिषः) महान् (तुविशुष्मः) बहुत बलवाले [शूर] ने (विष्णुना) बुद्धिमान् मनुष्य वा व्यापक परमेश्वर करके (सुतम्) निचोड़े हुए, (यवाशिरम्) अन्न के भोजनयुक्त (सोमम्) सोमक्षरण [तत्त्व रस] को (अपिबत्) पिया है, (यथा) जैसा (अवशत्) उस [शूर] ने चाहा। (सः) उस [तत्त्वरस] ने (ईम्) प्राप्तियोग्य, (महाम्) महान् (उरुम्) लम्बे-चौड़े पुरुष को (महि) बड़े (कर्म) कर्म (कर्तवे) करने के लिये (ममाद) हर्षित किया है, (सः) वह (देवः) दिव्य (सत्यः) सत्य गुणवाला, (इन्दुः) ऐश्वर्यवान् [तत्त्वरस] (एनम्) इस (देवम्) कामनायोग्य, (सत्यम्) सच्चे [सत्यकर्मा] (इन्द्रम्) इन्द्र [महाप्रतापी मनुष्य] को (सश्चत्) व्यापा है ॥१॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करके परमात्मा और विद्वानों के सिद्धान्तों पर चलता है, वही शूर संसार में बड़े-बड़े कर्म करके सर्वहितैषी होत है ॥१॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-२।२२।१, सामवेद-पू० ।८।१। तथा साम०-उ० ६।३।२० ॥ १−(त्रिकद्रुकेषु) अ० २।।७। त्रि+क्रद कदि आह्वाने-क्रुन्, कप् च। तिसॄणां शारीरिकात्मिकसामाजिकवृद्धीनां कद्रुकेषु आह्वानेषु-विधानेषु (महिषः) महान् (यवाशिरम्) अ० २०।२४।७। अन्नभोजनयुक्तम् (तुविशुष्मः) बहुबलः (तृपत्) नुमभावः। तृप्यन् (सोमम्) तत्त्वरसम् (अपिबत्) पीतवान् (विष्णुना) कर्मसु व्यापकेन विदुषा सर्वव्यापकेन परमेश्वरेण वा (सुतम्) निष्पादितम् (यथा) येन प्रकारेण (अवशत्) वश कान्तौ-छान्दसः शप्। अवष्ट। अकामयत (सः) सोमः (ईम्) प्राप्तव्यम् (ममाद) हर्षितवान् (महि) महत् (कर्म) कर्तव्यम् (कर्तवे) तुमर्थे तवेन्। कर्तुम् (महाम्) महान्तम् (उरुम्) विस्तृतम् (सः) सोमः (एनम्) (सश्चत्) सश्चतिर्गतिकर्मा-निघ० २।१४। असश्चत्। व्याप्तवान् (देवः) दिव्यः (देवम्) कमनीयम् (सत्यम्) यथार्थकर्माणम् (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं मनुष्यम् (सत्यः) सत्यगुणयुक्तः (इन्दुः) इदि परमैश्वर्ये-कु। परमैश्वर्यवान् सोमः ॥

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    विषय

    'देव, सत्य व इन्दु' बनना

    पदार्थ

    १. (त्रिकद्रुकेषु) = [कदि आहाने] जीवन के तीनों आह्वानकालों में-बाल्य, यौवन व वार्धक्य में (महिष:) = प्रभु की पूजा करनेवाला और अतएव (तुविशुष्मः) = महान् बलवाला मन्त्र का ऋषि गृत्समद (विष्णुना) = परमात्मा के द्वारा सुतम् उत्पन्न किये गये यवाशिरम् [यौति आभृणाति] अशुभों को दूर करनेवाले, शुभों को हमारे साथ सम्पृक्त करनेवाले और सब रोगकृमियों व वासनाओं को शीर्ण करनेवाले (सोमम्) = सोम को (तृपत्) = तृप्ति का अनुभव करता हुआ (अपिबत्) = अपने अन्दर ही पीता है, अर्थात् शरीर में ही इसे व्यास करता है। उतना-उतना व्याप्त करता है (यथा अवशत्) = जितना-जितना इन्द्रियों को वश में करता है। २. इसप्रकार सदा प्रभु का स्मरण करता हुआ और इन्द्रियों को वश में करता हुआ गृत्समद सोम का पान करता है-वीर्य को शरीर में ही सुरक्षित करता है। (स:) = वह (ईम्) = निश्चय से (ममाद) = प्रसन्नता का अनुभव करता है। (महि कर्म कर्तवे) = महान् कर्म करने के लिए होता है और (एनम्) = इस (महाम्) = महान्-पूजनीय (उरुम्) = सर्वव्यापक प्रभु को (सश्चत्) = प्राप्त होता है। (देव:) = प्रकाशमय जीवनवाला बनकर (देवम्) = प्रकाशमय प्रभु को प्राप्त करता है। (सत्यः) = सत्यवादी व (इन्दुः) = शक्तिशाली बनकर (सत्यम्) = सत्यस्वरूप (इन्द्रम्) = सर्वशक्तिमान् प्रभु को पाता है।

    भावार्थ

    उपासक उपासना की वृत्ति के परिणामस्वरूप वासनाओं से आक्रान्त न होकर सोम का रक्षण कर पाता है। इस सोम-रक्षण से उल्लासमय जीवनवाला-महान् कर्मों को करनेवाला तथा 'देव, सत्य व इन्द्र' बनकर उस महान् 'देव, सत्य व इन्दु' को प्राप्त करता है।

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    भाषार्थ

    (त्रिकद्रुकेषु) पृथिवी के तीन स्थानों—जल, स्थल, पर्वत में, अथवा पार्थिव शरीर के शरीर-मन-आत्मा में (विष्णुना) व्यापक परमेश्वर की कृपा से (सुतं सोमम्) निष्पादित भक्तिरस को—(यवाशिरम्) जो भक्तिरस कि राग-द्वेष की भावनाओं से रहित होकर दृढ़ाभ्यास और वैराग्य की भावनाओं द्वारा परिपक्व किया गया है—उस भक्तिरस को (महिषः) महान् तथा (तुविशुष्मः) महाबली परमेश्वर ने (यथावशत्) यथेच्छ (अपिबत्) पिया है, (तृपत्) और तृप्त हो गया है, (सः) उस भक्तिरस ने (ईम्) इस (महाम्) महान् तथा (उरुम्) सर्वाच्छादक अर्थात् सर्वव्यापक परमेश्वर को (ममाद) प्रसन्न कर दिया है (महि कर्म कर्तवे) ताकि परमेश्वर पाप-वृत्र के वध का महाकर्म वा मोक्षप्रदानरूपी कर्म करे। (सः) वह (देवः) दिव्य (सत्यः) सत्पुरुषों द्वारा सेवित और, (इन्दुः) चन्द्रसम आह्लादकारी भक्तिरस, (एनम्) इस (देवम्) देवाधिदेव, (सत्यम् इन्द्रम्) सनातन परमेश्वर को (सश्चत्) प्राप्त होता है।

    टिप्पणी

    [कद्रुक=“इयं पृथिवी कद्रूः” (श০ ब्रा০ ३.६.२.२)। द्रु=गतौ; कद्रु=कुत्सित गतिवाली; कद्रुक=और अल्प गतिवाली। पृथिवी परिक्रमा कर रही है सूर्य की। इस परिक्रमा की अनुभूति हमें नहीं हो रही। इसलिए पृथिवी को “कद्रुक” कहा है, अर्थात् अल्प गतिवाली, और वह अल्पगति भी कुत्सित, न अनुभूत होनेवाली। त्रिकद्रुक=शरीर, मन, आत्मा (ऋ০ २.११.१७, महर्षि दयानन्द)। यवाशिरम्=यु अमिश्रण; यथा—“यवोऽसि यवयास्मद् द्वेषो यवयारातीः” (यजुः০ ५.२६); आशिरः=श्रा पाके। सत्यः=सत्सु तायते (निरु০ ३.३.१३)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brhaspati Devata

    Meaning

    The great and powerful sun drinks up the soma, essence of vital juices reinforced with herbal elixir, matured in three containers, i.e., the earth, the sky and the heaven of light, and distilled by light and wind while it shines and energises the essences. He who delights in energising this sun, greatest of the great in nature, to do great things, who blesses and continues to bless this blazing power of light is the eternal, ever true, self-refulgent Lord Supreme, blissful as the moon. And he who would love to do great things vast and worthy of the great, he, true and bright as the moon, should serve and meditate on this lord of unbounded light and energy.

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    Translation

    The man of sharp understanding power who is great in attainments being satisfied in his three kinds of progresses (the physical, social and spiritual) drinks the Soma-juice mixed with barley pressed by a man of comprehensive knowledge (Vishnu) and as he desires this Soma-juice gladen the great man of long standing to perform the great deed and that man pious, truthful and possessor of wendrous powers attains the unity with this Almighty God who Himself is truthful.

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    Translation

    The man of sharp understanding power who is great in attainments being satisfied in his three kinds of progresses (the physical, social and spiritual) drinks the Soma-juice mixed with barley pressed by a man of comprehensive knowledge (Vishnu) and as he desires this Soma-juice gladen the great man of long standing to perform the great deed and that man pious, truthful and possessor of wondrous powers attains the unity with this Almighty God who Himself is truthful.

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    Translation

    Fully sing the praises of the strength of the foremost chariot of this great king. He, being the benefactor of the people in the fearless assemblageof the people,, the destroyer of the enemies in wars and energizer of us all, knows our interests quite well. Let bow-strings upon the bows of the wicked enemies break down.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-२।२२।१, सामवेद-पू० ।८।१। तथा साम०-उ० ६।३।२० ॥ १−(त्रिकद्रुकेषु) अ० २।।७। त्रि+क्रद कदि आह्वाने-क्रुन्, कप् च। तिसॄणां शारीरिकात्मिकसामाजिकवृद्धीनां कद्रुकेषु आह्वानेषु-विधानेषु (महिषः) महान् (यवाशिरम्) अ० २०।२४।७। अन्नभोजनयुक्तम् (तुविशुष्मः) बहुबलः (तृपत्) नुमभावः। तृप्यन् (सोमम्) तत्त्वरसम् (अपिबत्) पीतवान् (विष्णुना) कर्मसु व्यापकेन विदुषा सर्वव्यापकेन परमेश्वरेण वा (सुतम्) निष्पादितम् (यथा) येन प्रकारेण (अवशत्) वश कान्तौ-छान्दसः शप्। अवष्ट। अकामयत (सः) सोमः (ईम्) प्राप्तव्यम् (ममाद) हर्षितवान् (महि) महत् (कर्म) कर्तव्यम् (कर्तवे) तुमर्थे तवेन्। कर्तुम् (महाम्) महान्तम् (उरुम्) विस्तृतम् (सः) सोमः (एनम्) (सश्चत्) सश्चतिर्गतिकर्मा-निघ० २।१४। असश्चत्। व्याप्तवान् (देवः) दिव्यः (देवम्) कमनीयम् (सत्यम्) यथार्थकर्माणम् (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं मनुष्यम् (सत्यः) सत्यगुणयुक्तः (इन्दुः) इदि परमैश्वर्ये-कु। परमैश्वर्यवान् सोमः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ত্রিকদ্রুকেষু) তিন [শারীরিক, আত্মিক এবং সামাজিক] প্রকারের [উন্নতি] বিধানে (তৃপৎ) তৃপ্ত (মহিষঃ) মহান্ (তুবিশুষ্মঃ) বহু বলযুক্ত [বীর] (বিষ্ণুনা) বুদ্ধিমান্ মনুষ্য বা ব্যাপক পরমেশ্বর দ্বারা/কর্তৃক (সুতম্) নিষ্পাদিত, (যবাশিরম্) অন্নভোজনযুক্ত (সোমম্) সোমক্ষরণ [তত্ত্বরস] (অপিবৎ) পান করেছে, (যথা) যেমনটা (অবশৎ) সেই প্রসিদ্ধ [বীর] চেয়েছিল। (সঃ) সেই [তত্ত্বরস] (ঈম্) প্রাপ্তিযোগ্য, (মহাম্) মহান্ (উরুম্) বিস্তৃত পুরুষকে (মহি) মহৎ (কর্ম) কর্ম (কর্তবে) করার জন্য (মমাদ) হর্ষিত করেছে, (সঃ) সেই (দেবঃ) দিব্য (সত্যঃ) সত্য গুণ বিশিষ্ট, (ইন্দুঃ) ঐশ্বর্যযুক্ত [তত্ত্বরস] (এনম্) এই (দেবম্) কামনাযোগ্য, (সত্যম্) সত্য [সত্যকর্মা] (ইন্দ্রম্) ইন্দ্রকে [মহাপ্রতাপী মনুষ্যকে] (সশ্চৎ) ব্যাপ্ত করেছে ॥১॥

    भावार्थ

    যে মনুষ্য শারীরিক, আত্মিক ও সামাজিক উন্নতি দ্বারা পরমাত্মা এবং বিদ্বানগণের সিদ্ধান্ত অনুযায়ী চলমান, সেই বীর সংসারে মহৎ কর্ম সম্পাদন পূর্বক সর্বহিতৈষী হয় ॥১॥ এই মন্ত্র রয়েছে, ঋগ্বেদ-২।২২।১, সামবেদ-পূ০ ৫।৮।১। তথা সাম০-উ০ ৬।৩।২০ ॥

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    भाषार्थ

    (ত্রিকদ্রুকেষু) পৃথিবীর তিন স্থান—জল, স্থল, পর্বতে, অথবা পার্থিব শরীরের শরীর-মন-আত্মার মধ্যে (বিষ্ণুনা) ব্যাপক পরমেশ্বরের কৃপা দ্বারা (সুতং সোমম্) নিষ্পাদিত ভক্তিরস—(যবাশিরম্) যে ভক্তিরস রাগ-দ্বেষের ভাবনারহিত হয়ে দৃঢ়াভ্যাস এবং বৈরাগ্যের ভাবনা দ্বারা পরিপক্ব হয়েছে—সেই ভক্তিরস (মহিষঃ) মহান্ তথা (তুবিশুষ্মঃ) মহাবলী পরমেশ্বর (যথাবশৎ) যথেচ্ছ (অপিবৎ) পান করেছেন, (তৃপৎ) এবং তৃপ্ত হয়েছেন, (সঃ) সেই ভক্তিরস (ঈম্) এই (মহাম্) মহান্ তথা (উরুম্) সর্বাচ্ছাদক অর্থাৎ সর্বব্যাপক পরমেশ্বরকে (মমাদ) প্রসন্ন করেছে (মহি কর্ম কর্তবে) যাতে পরমেশ্বর পাপ-বৃত্র বধের মহাকর্ম বা মোক্ষপ্রদানরূপী কর্ম করেন। (সঃ) সেই (দেবঃ) দিব্য (সত্যঃ) সৎপুরুষদের দ্বারা সেবিত এবং, (ইন্দুঃ) চন্দ্রসম আহ্লাদকারী ভক্তিরস, (এনম্) এই (দেবম্) দেবাধিদেব, (সত্যম্ ইন্দ্রম্) সনাতন পরমেশ্বরকে (সশ্চৎ) প্রাপ্ত হয় ।

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