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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 10 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 3/ सूक्त 10/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - धेनुः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रायस्पोषप्राप्ति सूक्त
    102

    प्र॑थ॒मा ह॒ व्यु॑वास॒ सा धे॒नुर॑भवद्य॒मे। सा नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒थ॒मा । ह॒ । वि । उ॒वा॒स॒ । सा । धे॒नु: । अ॒भ॒व॒त् । य॒मे । सा । न॒: । पय॑स्वती । दु॒हा॒म् । उत्त॑राम्ऽउत्तराम् । समा॑म् ॥१०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रथमा ह व्युवास सा धेनुरभवद्यमे। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रथमा । ह । वि । उवास । सा । धेनु: । अभवत् । यमे । सा । न: । पयस्वती । दुहाम् । उत्तराम्ऽउत्तराम् । समाम् ॥१०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (सा) वह [ईश्वरी वा लक्ष्मी] (प्रथमा) प्रसिद्ध वा पहली शक्ति [प्रकृति] (ह) निश्चय करके (वि, उवास) प्रकाशित हुई। वह (यमे) नियम में (धेनुः) तृप्त करनेवाली [वा गौ के समान] (अभवत्) हुई है। (सा) वह (पयस्वती) दुधेल [प्रकृति] (नः) हमको (उत्तराम्-उत्तराम्) उत्तम-उत्तम (समाम्) सम [समान वा निष्पक्ष] शक्ति से (दुहाम्) भरती रहे ॥१॥

    भावार्थ - इस सूक्त में ‘रात्रि’ म० २ और ‘एकाष्टका’ म० ५ दोनों शब्द प्रकृति के वाचक हैं। प्रकृति ईश्वरशक्ति वा जगत् की सामग्री, सृष्टि से पहिले विद्यमान थी, उसने ईश्वर नियम से [मन्त्र २ वा ८ देखो] विविध पदार्थ सूर्य, अन्नादि उत्पन्न किये हैं। विद्वान् लोग प्रकृति के विज्ञान और प्रयोग से अधिक-२ ऐश्वर्यवान् होते हैं ॥१॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध ‘सा नः पयस्वती’ ऋ० ४।५७।७ में हैं ॥


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    Meaning -
    This sukta is a celebration with yajna at a new dawn. The night is over, a new dawn is come. The new dawn can be interpreted as the dawn of a new creation, dawn of the cosmos, as the dawn of a new year or the dawn of a new phase of history or a new phase in a person’s life. It is a highly symbolic sukta. The words ‘ratri’ and ‘ekashtaka’ stand for Prakrti. ‘Ashtaka’ is a three day celebration on the 7th, 8th and 9th day after the full moon in the month of Magha which could be a practice after this sukta, but there is no such indication in the sukta. What is important is the yajnic celebration and prayers for prosperity, progress and progeny in the new phase of time. There arises the new dawn, light of primal Shakti of the Divine, like the mother cow abundant in the milk of life for us in the Law Divine. May she, with milk overflowing bless us with higher and higher prosperity and joy year after year.


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