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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 20 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 20/ मन्त्र 6
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रवायू छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - रयिसंवर्धन सूक्त
    51

    इ॑न्द्रवा॒यू उ॒भावि॒ह सु॒हवे॒ह ह॑वामहे। यथा॑ नः॒ सर्व॒ इज्जनः॒ संग॑त्यां सु॒मना॑ अस॒द्दान॑कामश्च नो॒ भुव॑त् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । उ॒भौ । इ॒ह । सु॒ऽहवा॑ । इ॒ह । ह॒वा॒म॒हे॒ । यथा॑ । न॒: । सर्व॑: । इत् । जन॑: । सम्ऽग॑त्याम् । सु॒ऽमना॑: । अस॑त् । दान॑ऽकाम: । च॒ । न॒: । भुव॑त् ॥२०.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रवायू उभाविह सुहवेह हवामहे। यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद्दानकामश्च नो भुवत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रवायू इति । उभौ । इह । सुऽहवा । इह । हवामहे । यथा । न: । सर्व: । इत् । जन: । सम्ऽगत्याम् । सुऽमना: । असत् । दानऽकाम: । च । न: । भुवत् ॥२०.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 20; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (उभौ) दोनों (सुहवा=०-वौ) सुख से बुलाने योग्य (इन्द्रवायू) सूर्य और पवन [के समान स्त्री पुरुष] को (इह इह) यहाँ पर ही (हवामहे) हम बुलाते हैं, (यथा) जिससे (सर्वः इत्) सभी (जनः) जने (नः) हमारी (संगत्याम्) संगति में (सुमनाः) प्रसन्न चित्तवाले (असत्) होवें, (च) और (नः) हमारी (दानकामः) दान के लिए कामना (भुवत्) होवे ॥६॥

    भावार्थ

    सब स्त्री पुरुष प्रयत्न करके घर में और सभा में परस्पर परोपकारी, प्रसन्न चित्त, धार्मिक और धर्मकार्यों में दानशील हों, जैसे सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि आदि से और पवन अपने चेष्टादान और शीघ्रगमन आदि से असंख्य लाभ पहुँचाते हैं ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ३३।८६ में है ॥

    टिप्पणी

    ६−(इन्द्रवायू) ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्। पा० १।१।११। इति उभौ परे प्रकृतिभावः। सूर्यपवनसदृशौ स्त्रीपुरुषौ। (उभौ) द्वौ। (इह इह) अस्मिन्नेव गृहे समाजे वा। (सुहवा) ईषद्दुःसुषु०। पा० ३।३।१२६। सु+ह्वयतेः-खल्। सुहवौ सुखेन ह्वातुं शक्यौ। (हवामहे) आह्वयामः। (यथा) यस्मात्। (नः) अस्माकम् (इत्) एव। (जनः) लोकः। (संगत्याम्) समितौ। सभायाम्। (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः। (असत्, भुवत्) लेटि रूपम्। भवेत्। (दानकामः) दानाय कामः, अभिलाषः ॥

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    विषय

    जितेन्द्रियता क्रियाशीलता

    पदार्थ

    १. (इह) = इस जीवन में (सुहवा) = शोभन है पुकार [आराधना] जिनकी उन (उभौ) = दोनों (इन्द्रवायू) = जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता को हम (हवामहे) = पुकारते हैं। हम क्रियाशील व जितेन्द्रिय बनते हैं। २. हम इसलिए इन्द्र और वायु का आराधन करते हैं कि (यथा) = जिससे (इह) = इस संसार में (न:) = हमारे (संगत्याम्) = संगमन में, मिलने के अवसर पर (सर्वः इत् जन:) = सभी मनुष्य (सुमनाः असत्) = उत्तम मनवाले हों-परस्पर मिलने पर सबको प्रीति का अनुभव हो (च) = और (न:) = हमारे ये लोग (दानकामः) = दान की कामनावाले, सदा धनों को देने की इच्छावाले (भुवत्) = हों।

    भावार्थ

    हम जितेन्द्रिय व क्रियाशील बनें। परस्पर मिलने पर प्रीति का अनुभव करें और दान की वृत्तिवाले हों।

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    भाषार्थ

    (इन्द्रवायू) सम्राट् और वायुमंडल के अधिपति (उभौ) इन दोनों का (इह) इस यज्ञकर्म में (हवामहे) हम आह्वान करते हैं, (सुहवौ) ये दोनों सुगमता से आह्वानयोग्य हों, अतः इन दोनों को (इह) इस यज्ञकर्म में (हवामहे) हम आहूत करते हैं। (यथा) जिस प्रकार कि (नः) हमारा (सर्वः इत् जनः) सब जनसमूह, (संगत्याम्) पारस्परिक सत्सङ्ग में (सुमना: असत्) सुप्रसन्न मनवाला हो, (च) और (न:) हमें (दानकामः) दान देने की कामनावाला (भूत) हो ।

    टिप्पणी

    [इन्द्र=सम्राट् (यजु० ८।३७)। वायु है वायुमण्डल का अधिपति, वायुमण्डल में यानों द्वारा धनार्जन का अधिपति (अथर्व० ३।१५।१-६)। सत्सङ्गों में दान की आवश्यकता तो होती ही है अत: "दानकामः" कहा है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह सत्सङ्गों में सहयोग दे, और दान भी करे।]

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    विषय

    ईश्वर से उत्तम ऐश्वर्य और सद्गुणों की प्रार्थना ।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र-वायू) सूर्य और वायो ! (उभौ) आप दोनों (इह) इस लोक में (सु-हवा) उत्तम रीति से अपनी शक्ति से दूसरे को जीवन और प्राणों का दान करते हो, अतः हम आप दोनों के (इह) इस कार्य में (हवामहे) गुणों का कीर्तन करते हैं (यथा) जिससे (नः) हम में (सर्व इत् जनः) सभी लोग (सं-गत्याम्) परस्पर के मेल-जोल में (सुमनाः) उत्तम चित्त वाले हों और (नः) हममें सब लोग (दानकामः च) दान देने की इच्छा वाले (भुवत्) हों ।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘इन्द्रवायू बृहस्पति’ इति ऋ० ‘इन्द्रवायू सुसंदृशा’ (च०) ‘नोदय’ इति यजु०। (च०) ‘सर्वइज्ज नः अनमीवाः संगमे’ इति यजु०। यथानः सर्वमिज्जगत् अयक्ष्म सुमना असत्’ तै० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वसिष्ठ ऋषिः । अग्निर्वा मन्त्रोक्ता नाना देवताः। १-५, ७, ९, १० अनुष्टुभः। ६ पथ्या पंक्तिः। ८ विराड्जगती। दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Man’s Self-development

    Meaning

    Here in our life at our time of growth and development, we invoke, adore and worship Indra and Vayu, givers of power and life’s vibrancy. They are both generous, charitable and hospitable. We adore them as our ideal benefactors so that all our people be united in form and mind and feel inspired with the spirit of yajna and charity as a nation.

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    Translation

    O lord resplendent and omnipresent,here we invoke you, easy to invoke, so that all the people who come in our contact, may be favorably inclined towards and become willing to give gifts to us. (Rv. X.141.4)

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    Translation

    We speak of the Operation of the sun and air both of which are highly lendable in this world, so that all of the men of us we concordant in their mutual dealings and all of us be benevolent.

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    Translation

    O Sun and Air, Ye both, in this world nicely bestow life on us. Here do we sing your attributes, that in assembly all the folk may be benevolent to us, and be inclined to give us gifts!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(इन्द्रवायू) ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्। पा० १।१।११। इति उभौ परे प्रकृतिभावः। सूर्यपवनसदृशौ स्त्रीपुरुषौ। (उभौ) द्वौ। (इह इह) अस्मिन्नेव गृहे समाजे वा। (सुहवा) ईषद्दुःसुषु०। पा० ३।३।१२६। सु+ह्वयतेः-खल्। सुहवौ सुखेन ह्वातुं शक्यौ। (हवामहे) आह्वयामः। (यथा) यस्मात्। (नः) अस्माकम् (इत्) एव। (जनः) लोकः। (संगत्याम्) समितौ। सभायाम्। (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः। (असत्, भुवत्) लेटि रूपम्। भवेत्। (दानकामः) दानाय कामः, अभिलाषः ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (ইন্দ্রবায়ূ) সম্রাট্ ও বায়ুমণ্ডলের অধিপতি (উভৌ) এই উভয়কে (ইহ) এই যজ্ঞকর্মে (হবামহে) আমরা আহ্বান করি, (সুহবৌ) এই উভয়েই সুগমতার সহিত আহ্বানযোগ্য হোক, অতঃ এই উভয়েই (ইহ) এই যজ্ঞকর্মে (হবামহে) আমরা আহূত করি। (যথা) যাতে (নঃ) আমাদের (সর্বঃ ইৎ জনঃ) সমস্ত জনসমূহ, (সংগত্যাম্) পারস্পরিক সৎসঙ্গে (সুমনাঃ অসৎ) সুপ্রসন্ন মনের হয়, (চ) এবং (নঃ) আমাদের (দানকামঃ) দান দেওয়ার কামনাসম্পন্ন (ভুবৎ) হয়/হোক।

    टिप्पणी

    [ইন্দ্র=সম্রাট (যজুঃ০ ৮।৩৭)। বায়ু হলো বায়ুমণ্ডলের অধিপতি, বায়ুমণ্ডলে যান দ্বারা ধনার্জনের অধিপতি (অথর্ব০ ৩।১৫।১-৬)। সৎসঙ্গে দানের আবশ্যকতা হয়ই, অতঃ “দানকামঃ" বলা হয়েছে। প্রত্যেক ব্যক্তির এই কর্তব্য যে, সে সৎসঙ্গে যোগদান করুক, এবং দানও করুক।]

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    मन्त्र विषय

    ব্রহ্মজ্ঞানোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (উভৌ) উভয়েই (সুহবা=০-ণৌ) সুখপূর্বক আহ্বানযোগ্য (ইন্দ্রবায়ূ) সূর্য ও পবন [এর সমান স্ত্রী পুরুষ] কে (ইহ ইহ) এখানেই (হবামহে) আমরা আহ্বান করি, (যথা) যাতে (সর্বঃ ইৎ) সমস্ত (জনঃ) মনুষ্যগণ (নঃ) আমাদের (সংগত্যাম্) সংগতিতে (সুমনাঃ) প্রসন্ন চিত্তের (অসৎ) হয়, (চ) এবং (নঃ) আমাদের (দানকামঃ) দানের জন্য কামনা (ভুবৎ) হয়॥৬॥

    भावार्थ

    সকল স্ত্রী পুরুষ প্রচেষ্টাপূর্বক ঘরে এবং সভায় পরস্পর পরোপকারী, প্রসন্ন চিত্ত, ধার্মিক ও ধর্মকার্যে দানশীল হোক, যেমন সূর্য নিজের আলো এবং বৃষ্টি আদি দ্বারা এবং পবন নিজের চেষ্টাদান এবং শীঘ্রগমন আদির মাধ্যমে অসংখ্য লাভদায়ক হয়॥৬॥ এই মন্ত্র কিছু ভেদে যজুর্বেদ ৩৩।৮৬ এ রয়েছে॥

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