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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 28 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 4
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - यमिनी छन्दः - यवमध्या विराट्ककुप् सूक्तम् - पशुपोषण सूक्त
    45

    इ॒ह पुष्टि॑रि॒ह रस॑ इ॒ह स॑हस्र॒सात॑मा भव। प॒शून्य॑मिनि पोषय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒ह । पुष्टि॑: । इ॒ह । रस॑: । इ॒ह । स॒ह॒स्र॒ऽसात॑मा । भ॒व॒ । प॒शून् । य॒मि॒नि॒ । पो॒ष॒य॒ ॥२८.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इह पुष्टिरिह रस इह सहस्रसातमा भव। पशून्यमिनि पोषय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इह । पुष्टि: । इह । रस: । इह । सहस्रऽसातमा । भव । पशून् । यमिनि । पोषय ॥२८.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 28; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    उत्तम नियम से सुख होता है।

    पदार्थ

    (इह) यहाँ पर (पुष्टिः) पुष्टि, और (इह) यहाँ पर ही (रसः) रस होवे। (यमिनि) हे उत्तम नियमवाली बुद्धि ! (इह) यहाँ पर (सहस्रसातमा) अत्यन्त करके सहस्रों प्रकार से धन देनेवाली (भव) हो, और (पशून्) व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले जीवों को (पोषय) पुष्ट कर ॥४॥

    भावार्थ

    उत्तम नियम युक्त बुद्धि से मनुष्य अनेक प्रकार की वृद्धि और दूध, घी, आदि रस और बहुत सा धन पाकर सब जीवों की रक्षा करता है ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(पुष्टिः) वृद्धिः। समृद्धिः (रसः) क्षीरदुग्धादिरूपः (सहस्रसातमा) जनसनखनक्रमगमो विट्। पा० ३।२।६७। इति सहस्र+षणु दाने-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। प० ६।४।४१। इति आत्त्वम्। अतिशायने तमबिष्ठनौ। प० ५।३।५५। इति तमप्। टाप्। अतिशयेन सहस्रधनस्य दात्री (पोषय) समेधय। अन्यद् व्याख्यातं म० १ ॥

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    विषय

    पुष्टि+रस

    पदार्थ

    १. यमिनी बुद्धि के कारण (इह) = यहाँ-हमारे घरों में (पुष्टि:) = उचित पोषण हो। (इह) = यहाँ रस:-रस हो-आपस के मधुर व्यवहार के कारण आनन्द-ही-आनन्द हो। २. हे (यमिनि) = संयत बुद्धि! तू (इह) = यहाँ (सहस्त्रसातमा) = सहस्रों धनों को अतिशयेन प्रास करनेवाली (भव) = हो। २. तू (पशून्) = पशुओं को (पोषय) = पुष्ट कर, इनका संहार करनेवाली न हो।

    भावार्थ

    यमिनी [संयत] बुद्धि हमारा पोषण करती है, हमारे व्यवहार को रसमय बनाती है तथा हमें मांसाहार से दूर रखती है।

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    भाषार्थ

    (इह) इस गृहस्थ में (पुष्टिः) पोषण हो, (इह) इसमें (रसः) दुग्धघृत आदि रस हो, (इह) इसमें (सहस्रसातमा) हजारों सुखों को अतिशयदान करनेवाली (भव) तू हो। (यमिनि) हे यमनियमोंवाली वेदवाणी! (पशून्) पञ्चविध पशुओं को (पोषय) परिपुष्ट कर।

    टिप्पणी

    [सहस्रसातमा= सहस्र+षण्ड (दाने, तनादि)+तमप्। मन्त्र में गृहस्थजीवन को आध्यात्मिक बनाने का निर्देश हुआ है।]

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    विषय

    ‘यमिनी’ राजसभा और गृहिणी के कर्तव्यों का उपदेश।

    भावार्थ

    हे (यमिनि) विवाहिता नारि ! अथवा हे व्यवस्थापिका-सभे ! (इह) इस गृह और राष्ट्र में (पुष्टिः) पोषदायक पदार्थों से परिपोषण हो, (इह रसः) यहां जल और रसदायक पदार्थों की वृद्धि हो और तू (इह सहस्रसातमा भव) यहां सहस्रों प्रकार के पदार्थों को देने वाली हो, (पशून् पोषय) तू राष्ट्र पशुओं और अनभिज्ञ प्रजाजनों को पुष्ट कर। इसी प्रकार गृहिणी पशुओं को और बालक-जीवों को पुष्ट करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पशुपोषणकामो ब्रह्मा ऋषिः। यमिनी देवता। १ अतिशाक्वरगर्भा चतुष्पदा अति-जगती, ४ यवमध्या विराट्-ककुप, ५ त्रिष्टुप्, ६ विराडगर्भा प्रस्तारपंक्तिः। २,३ अनुष्टुभौ। षडृर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Observance of Divine Law

    Meaning

    O Yamini, when you are here with us all time, all seasons, then growth is here, nectar joy and flavour of life is here, a thousandfold of wealth and victory. Be the giver of thousand gifts. O Yamini, give life and nourishment to all living beings.

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    Translation

    Here be the prosperity. Here be the joy. May you become bestower of thousands here. O mother of twins (yamini), make our herd prosper.

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    Translation

    Let this destructive activity turn it into rain, and into increases. Let it be useful in multifarious ways and let it give strength to living creatures.

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    Translation

    O administrative Assembly, let there be increase in the state, let there be milk and ghee, be thou most munificent, strengthen thou the cattle and ignorant common people of the state.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(पुष्टिः) वृद्धिः। समृद्धिः (रसः) क्षीरदुग्धादिरूपः (सहस्रसातमा) जनसनखनक्रमगमो विट्। पा० ३।२।६७। इति सहस्र+षणु दाने-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। प० ६।४।४१। इति आत्त्वम्। अतिशायने तमबिष्ठनौ। प० ५।३।५५। इति तमप्। टाप्। अतिशयेन सहस्रधनस्य दात्री (पोषय) समेधय। अन्यद् व्याख्यातं म० १ ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (ইহ) এই গৃহস্থে (পুষ্টিঃ) পোষণ হোক, (ইহ) এর[গৃহস্থ] মধ্যে (রসঃ) দুগ্ধ-ঘৃত আদি রস হোক, (ইহ) এর[গৃহস্থ] মধ্যে (সহস্রসাতমা) সহস্র সুখের অতিশয়-প্রদানকারী (ভব) তুমি হও। (যমিনি) হে যমনিয়মরূপী বেদবাণী! (পশূন্) পঞ্চবিধ পশুদের (পোষয়) পরিপুষ্ট করো।

    टिप्पणी

    [সহস্রসাতমা= সহস্র + ষণু (দানে, তনাদিঃ) + তমপ্। মন্ত্রে গৃহস্থজীবনকে আধ্যাত্মিক করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।]

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    मन्त्र विषय

    সুনিয়মেন সুখং ভবতি

    भाषार्थ

    (ইহ) এখানে (পুষ্টিঃ) পুষ্টি, ও (ইহ) এখানেই (রসঃ) রস হোক। (যমিনি) হে উত্তম নিয়মযুক্তা বুদ্ধি ! (ইহ) এখানে (সহস্রসাতমা) সহস্র প্রকারে ধন প্রদানকারী (ভব) হও, এবং (পশূন্) ব্যক্ত ও অব্যক্ত বাণীর জীবকে (পোষয়) পুষ্ট করো ॥৪॥

    भावार्थ

    উত্তম নিয়মযুক্ত বুদ্ধি দ্বারা মনুষ্য অনেক প্রকারের বৃদ্ধি ও দুধ, ঘী, আদি রস এবং অনেক ধন প্রাপ্ত করে সকল জীবের রক্ষা করে॥৪॥

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