Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 31 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 31/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - पाप्महा, अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - यक्ष्मनाशन सूक्त
    171

    वि दे॒वा ज॒रसा॑वृत॒न्वि त्वम॑ग्ने॒ अरा॑त्या। व्यहं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि । दे॒वा: । ज॒रसा॑ । अ॒वृ॒त॒न् । वि । त्वम् । अ॒ग्ने॒ । अरा॑त्या । वि । अ॒हम् । सर्वे॑ण । पा॒प्मना॑ । वि । यक्ष्मे॑ण । सम् । आयु॑षा ॥३१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वि देवा जरसावृतन्वि त्वमग्ने अरात्या। व्यहं सर्वेण पाप्मना वि यक्ष्मेण समायुषा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वि । देवा: । जरसा । अवृतन् । वि । त्वम् । अग्ने । अरात्या । वि । अहम् । सर्वेण । पाप्मना । वि । यक्ष्मेण । सम् । आयुषा ॥३१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 31; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आयु बढ़ाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (जरसा) आयु के घटाव से (वि) अलग (अवृतन्) रहे हैं। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष (त्वम्) तू (अरात्या) कंजूसी वा शत्रुता से (वि=वि वर्तस्व) अलग रह। (अहम्) मैं (सर्वेण) सब (पाप्मना) पाप कर्म से (वि) अलग और (यक्ष्मेण) राजरोग, क्षयी आदि से (वि=विवर्त्तै) अलग रहूँ और (आयुषा) जीवन [उत्साह] से (सम्=सम् वर्तै) मिला रहूँ ॥१॥

    भावार्थ

    पुरुषार्थी लोग ब्रह्मचर्य आदि के सेवन से सदा बलवान् रहते हैं, इसी प्रकार सब मनुष्य मानसिक पाप और शारीरिक रोग के त्याग और शुभ गुणों के सेवन से बल बढ़ाकर अपना जीवन सफल करें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(देवाः) विजिगीषवः। (जरसा) षिद्भिदादिभ्योऽङ्। इति जॄष् वयोहानौ-अङ्। ऋदृशोऽङि गुणः। पा० ७।४।१६। इति गुणः। टाप्। जराया जरसन्यतरस्याम्। पा० ७।२।१०१। इति जरस्। वयोहन्या। (वि) पृथग्भूय (अवृतन्) वृतु वर्तने, भावे-लुङ्, अभूवन्, (वि) वि वर्तस्व। पृथग्भव। (अग्ने) हे विद्वन् पुरुष (अरात्या) अ० १।२।२। अदानेन। शत्रुतया (पाप्मना) नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति पा रक्षणे-अपादाने मनिन्, षुक् च। मानसेन पापेन। दुष्टकर्मणा। (वि) वि वर्त्तै। पृथग् भवानि। (यक्ष्मेण) अ० २।१०।५। शारीरेण राजरोगेण। क्षयादिना। (सम्) सं वर्त्तै। सम्भूय भवानि। (आयुषा) चिरकालजीवनेन ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    जीर्णता व अदानशीलता-पाप व रोग

    पदार्थ

    १. (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (जरसा) = जीर्णता से (वि अवृतन्) = व्यावृत्त होते हैं-दूर रहते हैं। (अग्ने) = हे अग्रणी प्रभो! (त्वम्) = आप (अरात्या) = अदान से सदा दूर हैं। आप सदा देनेवाले होते हैं। २. (अहम्) = मैं (सर्वेण) = सब (पाप्मना) = पापों से (वि) = दूर रहूँ, परिणामत: (यक्ष्मेण वि) = रोगों से भी दूर होता हूँ और (आयुषा सम्) = उत्कृष्ट दीर्घजीवन से संयुक्त होता है।

     

    भावार्थ

    हम देव बनकर जीर्णता से दूर रहें। प्रभु की उपासना करते हुए अदानवृत्ति से दूर रहें। पापों व रोगों से रहित होकर उत्कृष्ट दीर्घजीवन को प्राप्त करें। वस्तुतः जीर्णता व अदानशीलता ही पापों व रोगों का कारण बनकर जीवन के हास का कारण बनते हैं।

     

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (देवाः) सूर्य, चन्द्र आदि देव (जरसा) जीर्णावस्था से (वि अवृतन्) वियुक्त हैं, पृथक् हैं, (अग्ने) हे यज्ञियाग्नि! (त्वम्) तू (अरात्याः) अदान से (वि) वियुक्त है, पृथक् है। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब प्रकार के पाप से (वि) वियुक्त हो जाऊँ (यक्ष्मेण वि) और यक्ष्मरोग से वियुक्त हो जाऊँ, (आयुषा सम्) स्वस्थ तथा दीर्घायु से सम्पन्न हो जाऊँ।

    टिप्पणी

    [सूर्य, चन्द्र आदि दिव्य-तत्त्व जब से पैदा हुए हैं, निज शक्तियों द्वारा तरुणावस्था में है। यज्ञियाग्नि में भी जो हवि डाली जाती है, वह सुसंस्कृत होकर वायुमण्डल में फैल जाती है। अत: यज्ञियाग्नि अदानी नहीं। मैं रोगी भी सब पापों से और यक्ष्मा रोग से वियुक्त होकर स्वस्थ आयु से संयुक्त हो जाऊँ, ऐसी अभिलाषा या प्रार्थना है। पापों से वियुक्त हो जाने पर, रोगों से वियुक्त होकर, स्वस्थ आयु प्राप्त होती है।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मैं पापों से पृथक् रहूँ

    शब्दार्थ

    (देवाः) दिव्यगुण युक्त, सदाचारी, उदार विद्वान् लोग (जरसा) वृद्धावस्था से (वि अवृतन्) पृथक् रहे हैं और (अग्ने) आग (त्वम्) तू (अरात्या) कंजूसी से, अदान भावना से (वि) सदा अलग रही है । (अहम्) मै (सर्वेण) सब (पाप्मना) पाप से (वि) दूर रहूँ (यक्ष्मेण) यक्ष्मा आदि रोगों से (वि) पृथक् रहूँ और (आयुषा) उत्तम तथा पूर्णायु से, सुजीवन से (सम्) संयुक्त रहूँ ।

    भावार्थ

    १. जैसे देव वृद्धावस्था से पृथक् रहते हैं वैसे ही मैं भी पापों से दूर रहूँ । देव, परोपकारी, उदाराशय व्यक्ति कभी वृद्ध नहीं होते । शरीर के वृद्ध होने पर भी इनके मन में जवानी की तरंगें उठती हैं । जिसका मन जवान है उन्हें बुढापा कैसा ? २. जैसे अग्नि अदान-भावना से मुक्त रहती है उसी प्रकार मैं भी रोगों से दूर रहूँ । अग्नि का गुण है ताप और प्रकाश । अग्नि अपने इन गुणों से कभी पृथक् नहीं होती । यदि अग्नि में ये गुण न रहें तो वह अग्नि नहीं रहती; फिर तो वह राख की ढेरी बन जाती है और उसे उठाकर कूड़े पर फेंक दिया जाता है । ‘शरीरं व्याधिमन्दिरम्’ शरीर बीमारियों का घर है, ऐसा मत सोचो । हमारी तो ऐसी कामना और भावना होनी चाहिए कि जिस प्रकार अग्नि ताप और प्रकाश से युक्त होती है, मैं भी वैसा ही ओजस्वी और तेजस्वी बनूँ, आधियाँ और व्याधियाँ मेरे निकट न आएँ । ३.मैं सदा सुन्दर, शोभन एवं श्रेष्ठ जीवन से युक्त रहूँ ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Negativity

    Meaning

    Let Devas, brilliant, illuminative, generous creative powers in humanity be free from decrepitude O Agni, man of brilliance and enthusiasm, keep away from meanness and niggardliness. Let me be far away from all sin. Let me be free from cancer and consumption, let me be happy with good health and long age.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject

    Freedom from Evils

    Translation

    May the bounties of Nature, keep this away from old age. May, O you adorable Lord, keep him away from misery. I free this man from all evil, and from wasting disease. I unite him with a iong life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    The learned and celibate persons remain free from the untimely old age. O learned one; be always free from malignity. May we be free from all evils and let us be free from decline and encompassed with long life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Learned persons keep aloof old age. O learned person keep aloof from stinginess and your foe. May I remain aloof from all sins and pulmonary disease. May I belinked with old age.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(देवाः) विजिगीषवः। (जरसा) षिद्भिदादिभ्योऽङ्। इति जॄष् वयोहानौ-अङ्। ऋदृशोऽङि गुणः। पा० ७।४।१६। इति गुणः। टाप्। जराया जरसन्यतरस्याम्। पा० ७।२।१०१। इति जरस्। वयोहन्या। (वि) पृथग्भूय (अवृतन्) वृतु वर्तने, भावे-लुङ्, अभूवन्, (वि) वि वर्तस्व। पृथग्भव। (अग्ने) हे विद्वन् पुरुष (अरात्या) अ० १।२।२। अदानेन। शत्रुतया (पाप्मना) नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति पा रक्षणे-अपादाने मनिन्, षुक् च। मानसेन पापेन। दुष्टकर्मणा। (वि) वि वर्त्तै। पृथग् भवानि। (यक्ष्मेण) अ० २।१०।५। शारीरेण राजरोगेण। क्षयादिना। (सम्) सं वर्त्तै। सम्भूय भवानि। (आयुषा) चिरकालजीवनेन ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top