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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वेनः देवता - बृहस्पतिः, आदित्यः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मविद्या सूक्त
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    ब्रह्म॑ जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द्वि सी॑म॒तः सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः। स बु॒ध्न्या॑ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठाः स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ वि वः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    बह्म॑ । ज॒ज्ञा॒नम् । प्र॒थ॒मम् । पु॒रस्ता॑त् । वि । सी॒म॒त: । सु॒ऽरुच॑: । वे॒न: । आ॒व॒: । स: । बु॒ध्न्या᳡: । उ॒प॒ऽमा: । अ॒स्य॒ । वि॒ऽस्था: । स॒त: । च॒ । योनि॑म् । अस॑त: । च॒ । वि । व॒: ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    बह्म । जज्ञानम् । प्रथमम् । पुरस्तात् । वि । सीमत: । सुऽरुच: । वेन: । आव: । स: । बुध्न्या: । उपऽमा: । अस्य । विऽस्था: । सत: । च । योनिम् । असत: । च । वि । व: ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (वेनः) प्रकाशमान वा मेधावी परमेश्वर ने (पुरस्तात्) पहिले काल में (प्रथमम्) प्रख्यात (जज्ञानम्) उपस्थित रहनेवाले (ब्रह्म) वृद्धि के कारण अन्न को और (सुरुचः) बड़े रुचिर लोकों को (सीमतः) सीमाओं वा छोरों से (वि आवः) फैलाया है। (सः) उसने (बुध्न्याः) अन्तरिक्ष में वर्तमान (उपमाः) [परस्पर आकर्षण से] तुलना करनेवाले (विष्ठाः) विशेष-विशेष स्थानों, अर्थात् (अस्य) इस (सतः) विद्यमान [स्थूल] के (च) और (असतः) अविद्यमान [सूक्ष्म जगत्] के (योनिम्) घर को (च) निश्चय करके (वि वः) खोला है ॥१॥

    भावार्थ - जैसे उत्पन्न होने से पहिले बालक के लिये माता के स्तनों में दूध हो जाता है, ऐसे ही जगत् के जननी जनक परमेश्वर ने सृष्टि से पूर्व प्रत्येक शरीर के लिये प्रभूत (ब्रह्म) अन्न वा पालन शक्ति और पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, आदि को बनाया, जो परस्पर आकर्षण से स्थिर हैं। यही सब लोक कार्य वा मूर्त और कारण वा अमूर्त दो प्रकार के जगत् के भण्डार हैं ॥१॥ यह मन्त्र यजुर्वेद अ० १३ म० ३ और सामवेद पूर्वार्चिक प्र० ४ द० ३ म० ९ में है ॥


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    Meaning -
    The loving, faithful, visionary sage visualizes the infinite spirit of the universe, first, eternal, and directly manifested from the bounds of brilliant stars. Various stars and planets abiding in space are reflections of the presence of the Spirit. It is that Spirit which brings into existence Prakrti, mother cause of what is in nature and what is yet to be.


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