अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 15/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - दिशः छन्दः - विराड्जगती सूक्तम् - वृष्टि सूक्त
    पदार्थ -

    (नभस्वतीः=०−त्यः) बादल से छायी हुई (प्रदिशः) दिशाएँ (समुत्पतन्तु) भले प्रकार उदय हों, (वातजूतानि) पवन से चलाये गये (अभ्राणि) जल भरे बादल (संयन्तु) छा जावें। (महऋषभस्य) बड़े गमनशील (नदतः) गरजते हुए (नभस्वतः) आकाश में छाये [बादल] की (वाश्राः) धड़ धड़ाती (आपः) जलधाराएँ (पृथिवीम्) पृथिवी को (तर्पयन्तु) तृप्त करें ॥१॥

    भावार्थ -

    पवन द्वारा वर्षा होने से दिशाएँ निर्मल और पृथिवी अन्न आदि पदार्थ उत्पन्न करने योग्य हो जाती है, इसी प्रकार मनुष्य उपकारी बनें ॥१॥

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