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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 8
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मरुद्गणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वृष्टि सूक्त
    28

    आशा॑माशां॒ वि द्यो॑ततां॒ वाता॑ वान्तु दि॒शोदि॑शः। म॒रुद्भिः॒ प्रच्यु॑ता मे॒घाः सं य॑न्तु पृथि॒वीमनु॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आशा॑म्ऽआाशाम् । वि । द्यो॒त॒ता॒म् । वाता॑: । वा॒न्तु॒ । दि॒श:ऽदि॑श: । म॒रुत्ऽभि॑: । प्रऽच्यु॑ता: । मे॒घा: । सम् । य॒न्तु॒ । पृ॒थि॒वीम् । अनु॑ ॥१५.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः। मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आशाम्ऽआाशाम् । वि । द्योतताम् । वाता: । वान्तु । दिश:ऽदिश: । मरुत्ऽभि: । प्रऽच्युता: । मेघा: । सम् । यन्तु । पृथिवीम् । अनु ॥१५.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 15; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वृष्टि की प्रार्थना और गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (वाताः) पवने (दिशोदिशः) दिशा दिशा से (द्योतताम्) दीप्यमान (आशाम् आशाम्) प्रत्येक दिशा को (वि) विविध प्रकार से (वान्तु) चलें। (मरुद्भिः) पवनों से (प्रच्युताः) चलाये गये (मेघाः) मेह (पृथिवीम्) पृथिवी पर (अनु) अनुकूल (संयन्तु) उमड़ कर आवें ॥८॥

    भावार्थ

    जैसे मेह पवन द्वारा एक देश से दूसरे देश में बरसते हैं, वैसे ही मनुष्य प्रयत्न करके देश-देशान्तरों में वेदविद्या फैलावें ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(आशामाशाम्) दिशंदिशम् आश्रित्य (द्योतताम्) भृमृदृशि०। उ० ३।११०। इति द्युत दीप्तौ अतच्, टाप्। द्योतमानाम्, दीप्यमानाम् (वाताः) पवनाः (वि वान्तु) विविधं संचरन्तु (दिशोदिशः) सर्वस्या अपि दिशः सकाशात् (संयन्तु) संगता भवन्तु (अनु) अनुलक्ष्य। अन्यद् यथा म० ७ ॥

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    विषय

    सर्वत्र वृष्टि की अनुकूलता

    पदार्थ

    १. (आशाम् आशम्) = प्रत्येक दिशा में (विद्योतताम्) = विधुत् की दीसियाँ चमकें । (दिशोदिश:) = प्रत्येक दिशा को प्राप्त करके (वाता: वान्तु) = मेघों को लानेवाले वायु बहें। २. (मरुद्धिः) = वायुओं से प्(रच्युता: मेघा:) = प्रेरित मेष वृष्टि द्वारा (पृथिवीम् अनुसंयन्तु) = पृथिवी को अनुकूलता से प्राप्त रहें।

    भावार्थ

    गतमन्त्र के अनुसार प्रजा के अग्निहोत्र आदि करने पर सर्वत्र वृष्टि की अनुकूलता हो। बादलों में विद्युत् की दीप्ति चमके और वृष्टि को लानेवाले वायु सर्वत्र बहें।

     

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    भाषार्थ

    (आशाम्, आशाम्) प्रत्येक व्यापक दिशा में (वि द्योतताम्) विद्युतु चमके, (दिशोदिश:) प्रत्येक दिशा में (वाताः) मेघसंपृक्त वायुएँ (जन्तु) संचार करें। (मरुद्भिः) मानसून वायुओं द्वारा (प्रच्युताः) गिरे (मेघाः) मेघ (पृथिवीमनु) पृथिवी के अनुकूल होकर (संयन्तु) मिलकर गति करें, मंडलाएं।

    टिप्पणी

    [आशामाशाम्="आशा दिशो भवन्ति, आसदनात्" (निरुक्त ६।१।१); आशाभ्यः, पद(२)। आशाः = सर्वत्र स्थिति होने से। 'आशारैषी' (मन्त्र ६) में आशा पद भी व्यापक दिशाबाचक है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Song of Showers

    Meaning

    Let lightnings flash all round in all directions. Let winds blow in all directions from all directions. Let clouds moved by winds shower in accord with the earth.

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    Translation

    May the lightning flash on each and every side. May the gusty winds blow from each and every direction. May the rain bearing clouds, urged by stormy winds, rush to the earth.

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    Translation

    Let lightning flash on all sides and let the winds blow from & all directions and the clouds agitated by the winds come down to earth. .

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    Translation

    Let lightning flash from every side; from all the regions blow the winds Urged by the winds let the clouds come down upon the earth.

    Footnote

    अजगर is the cloud that swallows the Sun, or is long fantastic shaped like a serpent.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(आशामाशाम्) दिशंदिशम् आश्रित्य (द्योतताम्) भृमृदृशि०। उ० ३।११०। इति द्युत दीप्तौ अतच्, टाप्। द्योतमानाम्, दीप्यमानाम् (वाताः) पवनाः (वि वान्तु) विविधं संचरन्तु (दिशोदिशः) सर्वस्या अपि दिशः सकाशात् (संयन्तु) संगता भवन्तु (अनु) अनुलक्ष्य। अन्यद् यथा म० ७ ॥

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