अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 5
ये की॒लाले॑न त॒र्पय॑न्ति॒ ये घृ॒तेन॒ ये वा॒ वयो॒ मेद॑सा संसृ॒जन्ति॑। ये अ॒द्भिरीशा॑ना म॒रुतो॑ व॒र्षय॑न्ति॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठये । की॒लाले॑न । त॒र्पय॑न्ति । ये । घृ॒तेन॑ । ये । वा॒ । वय॑: । मेद॑सा । स॒म्ऽसृ॒जन्ति॑ । ये । अ॒त्ऽभि: । ईशा॑ना: । म॒रुत॑: । व॒र्षय॑न्ति । ते । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥२७.५॥
स्वर रहित मन्त्र
ये कीलालेन तर्पयन्ति ये घृतेन ये वा वयो मेदसा संसृजन्ति। ये अद्भिरीशाना मरुतो वर्षयन्ति ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥
स्वर रहित पद पाठये । कीलालेन । तर्पयन्ति । ये । घृतेन । ये । वा । वय: । मेदसा । सम्ऽसृजन्ति । ये । अत्ऽभि: । ईशाना: । मरुत: । वर्षयन्ति । ते । न: । मुञ्चन्तु । अंहस: ॥२७.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पवन के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जो [मरुद्गण] (वयः) जीवन को (कीलालेन) अन्न से और (ये) जो (घृतेन) जल से (तर्पयन्ति) तृप्त करते हैं, (वा) और (ये) जो (मेदसा) मेदा अर्थात् चर्बी से (संसृजन्ति) संयुक्त करते हैं। और (ये) जो (ईशानाः) समर्थ (मरुतः) वायुगण (अद्भिः) जल से [प्राणियों को] (वर्षयन्ति) सींचते हैं। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥५॥
भावार्थ
वायुवेग द्वारा अन्न, जल मिलकर शरीररक्षा के लिये रक्त अस्थि आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं। उन वायुगणों के गुणों से हम सदा स्वस्थ और पुष्ट रहें ॥५॥
टिप्पणी
५−(ये) मरुतः (कीलालेन) अ० ४।२६।६। अन्नेन (तर्पयन्ति) पोषयन्ति (घृतेन) उदकेन (वा) चार्थः (वयः) अ० २।१०।३। वी गतौ-असुन्। अन्नम्-निघ० २।७। आयुः जीवनम् (मेदसा) सर्वधातुभ्योऽसुन् उ० ४।१८९। इति ञिमिदा स्नेहने-असुन्। मांसप्रभवधातुविशेषेण। वपया तुरीयवायुना (संसृजन्ति) संयोजयन्ति (वर्षयन्ति) सिञ्चन्ति प्राणिनः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४ ॥
विषय
"अन्न में मेदस्तत्त्व के जनक' मरुत्
पदार्थ
१. (ये) = जो मरुत (कीलालेन) = अन्न से (तर्पयन्ति) = हमें प्रीणित करते हैं, (ये) = जो घृतने मलों का क्षरण करनेवाले व स्वास्थ्य की दीप्ति देनेवाले जल से हमें प्रीणित करते हैं, ये वा अथवा जो मरुत् वयः अन्न को (मेदसा) = मेदस्तत्त्व [Fat] से (संसृजन्ति) = संसृष्ट करते हैं, २. (ये मरुतः) = जो मरुत् (अद्धिः) = जलों के द्वारा (ईशाना:) = हमारे जीवनों के ईशान होते हुए (वर्षयन्ति) = जलों की वृष्टि करते हैं, (ते) = वे मरुत् (न:) = हमें (अंहसः मुञ्चन्तु) = पाप से मुक्त करें।
भावार्थ
मरुत् ही हमें अन्न व जल प्राप्त कराते है। ये ही अन्न में मेदस्तत्त्व को पैदा करते हैं। ये वृष्टि करनेवाले मरुत् हमें प्रभूत अन्न आदि प्राप्त कराके पापों से मुक्त करें।
भाषार्थ
(ये) जो मानसून वायुएं (कीलालेन) अन्न द्वारा (तर्पयन्ति) तृप्त करती हैं, (ये) जो (घृतेन) घृत या जल द्वारा [तृप्त करती हैं], (वा) अथवा (ये) जो (वयः) अन्न को (मेदसा) स्नेहतत्व के साथ (संसृजन्ति) सम्पृक्त करती हैं; (ये) जो (अद्भिः) जल द्वारा (ईशाना:) ऐश्वर्ययुक्त हुई (मरुतः) मानसून वायुएँ (वर्षयन्ति) वर्षा करती हैं, (ते) वे तुम दोनों (न:) हमें (अंहसः) पापजन्य कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ाएँ।
टिप्पणी
[कीलालम्= अन्ननाम (निघं० २।७) घृतम् उदकनाम (निघं० १।१३); घृतम्= आज्य, घी, (प्रसिद्ध)। वयः अन्ननाम (निघं० २।७)। मेदसा= मेदस् अर्थात् स्नेहतत्त्व, यथा तिलों में तैल, सरसों के बीजों में तेल आदि। ईशाना:= ईश ऐश्वर्ये (अदादिः)।]
विषय
पापमोचन की प्रार्थना।
भावार्थ
(ये) जो मरुद्रण (कीलालेन) अन्न से (तर्पयन्ति) प्राणियों को तृप्त करते हैं (ये) और जो (मेदसा) पुष्टिकारक पदार्थ से (वा) ही (वयः) दीर्घ आयु को (सं-सृजन्ति) उत्पन्न करते हैं और (ये मरुतः) जो मरुद्गण (अद्भिः) जलों से (ईशानाः) शक्ति-सम्पन्न होकर (वर्षयन्ति) जलों की वर्षा करते हैं (ते नः०)वे हमें सुखी करें और कष्टों से मुक्त करें। विद्वानों के पक्ष में—जो विद्वान् कीलाल = अमृतरस से, (घृतेन) तेजोमय ज्ञान से और पुष्टिकारक पदार्थों से सब को तृप्त करते और पुष्ट करते और दीर्घायु होने का उपदेश करते हैं वे हमें पाप से मुक्त करें। प्राणों के पक्ष में स्पष्ट है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मृगार ऋषिः। नाना देवताः। पञ्चमं मृगारसूक्तम्। १-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Sin
Meaning
Those that nurture with the food of life, who refine with the sweetness and light of ghrta, who infuse life with beauty and grace, Maruts who command the strength, sweetness and culture of life with grace and no friction, and shower us with the joy of life, may they save us from sin and suffering.
Translation
Who gratify with delicious drink; who gratify with clarified butter: and who combine longevity with fat; who cause rain lording it over waters; may they free us from sin.
Translation
These are the Maruts which refresh the creatures with water and grain, which fill up the world with light and luster, which increase length of life by creating fat and which rain mighty with waters. May they become the sources of our deliverance from grief and troubles.
Translation
The learned persons, who satisfy us with foodstuffs and knowledge, who instruct us to acquire longevity and vigour, the highly learned persons, who through Yajnas make the clouds rain with their waters, may they deliver us from sin.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(ये) मरुतः (कीलालेन) अ० ४।२६।६। अन्नेन (तर्पयन्ति) पोषयन्ति (घृतेन) उदकेन (वा) चार्थः (वयः) अ० २।१०।३। वी गतौ-असुन्। अन्नम्-निघ० २।७। आयुः जीवनम् (मेदसा) सर्वधातुभ्योऽसुन् उ० ४।१८९। इति ञिमिदा स्नेहने-असुन्। मांसप्रभवधातुविशेषेण। वपया तुरीयवायुना (संसृजन्ति) संयोजयन्ति (वर्षयन्ति) सिञ्चन्ति प्राणिनः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ४ ॥
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