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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 34 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 34/ मन्त्र 7
    ऋषिः - अथर्वा देवता - ब्रह्मौदनम् छन्दः - भुरिगतिशक्वरी सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त
    92

    च॒तुरः॑ कु॒म्भांश्च॑तु॒र्धा द॑दामि क्षी॒रेण॑ पू॒र्णाँ उ॑द॒केन॑ द॒ध्ना। ए॒तास्त्वा॒ धारा॒ उप॑ यन्तु॒ सर्वाः॑ स्व॒र्गे लो॒के मधु॑म॒त्पिन्व॑माना॒ उप॑ त्वा तिष्ठन्तु पुष्क॒रिणीः॒ सम॑न्ताः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    च॒तुर॑: । कु॒म्भान् । च॒तु॒:ऽधा । द॒दा॒मि॒ । क्षी॒रेण॑ । पू॒र्णान् । उ॒द॒केन॑ । द॒ध्ना । ए॒ता: । त्वा॒ । धारा॑: । उप॑ । य॒न्तु॒ । सर्वा॑: । स्व॒:ऽगे । लो॒के । मधु॑ऽमत् । पिन्व॑माना: । उप॑ । त्वा॒ । ति॒ष्ठ॒न्तु॒ । पु॒ष्क॒रिणी॑: । सम्ऽअ॑न्ता: ॥३४.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णाँ उदकेन दध्ना। एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत्पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चतुर: । कुम्भान् । चतु:ऽधा । ददामि । क्षीरेण । पूर्णान् । उदकेन । दध्ना । एता: । त्वा । धारा: । उप । यन्तु । सर्वा: । स्व:ऽगे । लोके । मधुऽमत् । पिन्वमाना: । उप । त्वा । तिष्ठन्तु । पुष्करिणी: । सम्ऽअन्ता: ॥३४.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 34; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (क्षीरेण) भोजन साधन से, (उदकेन) सेचन वा वृद्धिसाधन से और (दध्ना) धारण पोषण सामर्थ्य से (पूर्णान्) परिपूर्ण (कुम्भान्) भूमि को पूर्ण करनेवाले (चतुरः) चार अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को (चतुर्धा) चार प्रकार से अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रम वा चारों वेद द्वारा (ददामि) दान करता हूँ। (एताः) ये (सर्वाः) सब (धाराः) धारण शक्तियाँ (स्वर्गे लोके) स्वर्ग लोक में (मधुमत्) मधु नाम ज्ञान की पूर्णता से (त्वा) तुझको (पिन्वमानाः) सींचती हुई (उप) आदर से (यन्तु) मिलें, और (समन्ताः) सम्पूर्ण (पुष्करिणीः=०-ण्यः) पोषणवती शक्तियाँ (त्वा) तुझ में (उप तिष्ठन्तु) उपस्थित होवें ॥७॥

    भावार्थ

    परमेश्वर ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रम द्वारा और चारों वेद द्वारा धर्म अर्थ आदि चार पदार्थ देता है। इसलिये मनुष्य चारों आश्रम और चारों वेदों के यथावत् सेवन से चारों पदार्थ प्राप्त करके सदा आनन्दित रहें ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(चतुरः) चतुःसंख्याकान् धर्मार्थकाममोक्षान् (कुम्भान्) अ० ३।१२।७। कुं भूमिम् उम्भति पूरयतीति कुम्भः। भूमिपूरकान् (चतुर्धा) चुतुष्प्रकारेण ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थसंन्यासाश्रमरूपेण यद्वा वेदचतुष्टयेन (ददामि) प्रयच्छामि (क्षीरेण) म० ६। भोजनसाधनेन (पूर्णान्) पूरितान् (उदकेन) सेचनसाधनेन (दध्ना) म० ६। धारणेन पोषणेन वा। अन्यत् पूर्ववत् म० ५ ॥

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    विषय

    चार घड़े

    पदार्थ

    १. (क्षीरेण) = दूध से (उदकेन) = जल से, (दध्ना) = तथा दधि से (पूर्णान) = भरे हुए (चतुरः कुम्भान्) = चार घड़ों को (चतुर्धा) = पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में चार प्रकार से (ददामि) = [दधामि] धारण करता हूँ (एता:) = ये ( सर्वा:) = सब (धारा:) = धारण करनेवाली दूध, जल व दही की घटियाँ [घड़े] (त्वा उपयन्तु) = तुझे समीपता से प्राप्त हों। २. (स्वर्गे लोक) = स्वर्गतुल्य गृहप्रदेश में (मधुमत् पिन्वमाना:) = माधुर्ययुक्त रस का सेचन करती हुई (समन्ता:) = पर्यन्तवर्तिनी (पुष्करिणी:)  कमल सरसियों (त्वा उपतिष्ठन्तु) = तेरे लिए उपस्थित हों।

    भावार्थ

    घर में दूध, उदक व दधि से पूर्ण घड़े मङ्गल के प्रतीक हैं। ये घर में माधुर्य का सचेन करनेवाले हों।

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    भाषार्थ

    (चतुर्धा) चतुर्विध विद्यमान (चतुरः कुम्भान्) ४ कुम्भों को (ददामि) मैं परमेश्वर देता हूँ [हे गृहस्थी ! तुझे] (क्षीरेण) दूध द्वारा, (उदकेन) उदक द्वारा (दध्ना) दधि द्वारा (पूर्णान्) पूर्ण [कुम्भों] को। ये कुम्भ ३ हैं। चौथा कुम्भ है "घृतह्रदा, मधुकूलाः, सुरोदकाः' (मन्त्र ६)। बहुवचनान्त इन तीनों को, एकविध मानकर, इन्हें चतुर्थ कुम्भ कहा है। (एताः) ये (सर्वाः धारा:) सब धारक धाराएँ (त्वा) तुझे (उप यन्तु) प्राप्त हों (स्वर्गे लोके) गृहस्थ लोकरूपी स्वर्गलोक में; तथा (मधुमत्) मधुर मधु को (पिन्वमाना:) सींचती हुई (पुष्करिणी:) पुष्करों अर्थात् कमलोंवाली भूमियाँ, (पर्यन्ताः) जोकि पर्यन्तवर्ती हैं, वे (त्वा) तुझे (उप तिष्ठन्तु) उपस्थित हों, तेरे समीप स्थित हों।

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    विषय

    विष्टारी ओदन, परम प्रजापति की उपासना और फल।

    भावार्थ

    (चतुर्धा) चार प्रकार की वस्तुओं से अर्थात् (क्षीरेण, उदकन, दध्ना पूर्णाम्) दूध, सामान्य जल तथा शुद्ध जल और दही से भरे (चतुरः कुम्भान्) चार घड़ों को (ददामि) मैं अतिथियों के प्रति दान भी, इस आश्रम में करता हूं। शेष पूर्ववत् !

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। ब्रह्मास्यौदनं विष्टारी ओदनं वा देवता। १-३ त्रिष्टुभः। ५ त्र्यवसाना सप्तपदाकृतिः। ६ पञ्चपदातिशक्वरी। ७ भुरिक् शक्वरी, ८ जगती। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Worship and Self-Surrender

    Meaning

    I give you four potfuls (of Dharma, artha, kama and Moksha) four ways (of Brahmacharya, grhastha, vanaprastha and sanyasa), all full of the waters of life, milk of love and kindness, and curds of exciting energy. May all these abundant streams of fragrant flower-joy and honey sweets, rising and raising you in the state of paradisal bliss, flow by you for you.

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    Translation

    I give four vessels (pitchers) full of milk, water and curd at four places. May all these streams flow to us in the world of happiness swelling sweetly. May whole lakes full of lotuses be situated near you,

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    Translation

    I give to guests the four jugs filled with milk, with curd and water separately. Rest is like the previous one.

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    Translation

    I bestow on thee four boons, through four diverse sources, filled with the power of supplying food, vigour and nourishment. May all these forces enhancing pleasure reach thee in domestic life. May thou acquire completely these qualities strengthening the soul in diverse ways.

    Footnote

    ‘I’ refers to God. 'Thee' refers to a married man. Four boons: Dharma, Artha, Kama, Moksha. Four.sources: Brahmcharya (celibacy) Grihastha (married life), Ban Prastha (the life of a recluse), Sanyasa (the life of complete, renunciation) or 'four sources' may mean the four Vedas. Food:spiritualfood. Vigour; mental vigour, Nourishment: intellectual nourishment.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(चतुरः) चतुःसंख्याकान् धर्मार्थकाममोक्षान् (कुम्भान्) अ० ३।१२।७। कुं भूमिम् उम्भति पूरयतीति कुम्भः। भूमिपूरकान् (चतुर्धा) चुतुष्प्रकारेण ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थसंन्यासाश्रमरूपेण यद्वा वेदचतुष्टयेन (ददामि) प्रयच्छामि (क्षीरेण) म० ६। भोजनसाधनेन (पूर्णान्) पूरितान् (उदकेन) सेचनसाधनेन (दध्ना) म० ६। धारणेन पोषणेन वा। अन्यत् पूर्ववत् म० ५ ॥

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