Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 34 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 34/ मन्त्र 7
    ऋषि: - अथर्वा देवता - ब्रह्मौदनम् छन्दः - भुरिगतिशक्वरी सूक्तम् - ब्रह्मौदन सूक्त
    30

    च॒तुरः॑ कु॒म्भांश्च॑तु॒र्धा द॑दामि क्षी॒रेण॑ पू॒र्णाँ उ॑द॒केन॑ द॒ध्ना। ए॒तास्त्वा॒ धारा॒ उप॑ यन्तु॒ सर्वाः॑ स्व॒र्गे लो॒के मधु॑म॒त्पिन्व॑माना॒ उप॑ त्वा तिष्ठन्तु पुष्क॒रिणीः॒ सम॑न्ताः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    च॒तुर॑: । कु॒म्भान् । च॒तु॒:ऽधा । द॒दा॒मि॒ । क्षी॒रेण॑ । पू॒र्णान् । उ॒द॒केन॑ । द॒ध्ना । ए॒ता: । त्वा॒ । धारा॑: । उप॑ । य॒न्तु॒ । सर्वा॑: । स्व॒:ऽगे । लो॒के । मधु॑ऽमत् । पिन्व॑माना: । उप॑ । त्वा॒ । ति॒ष्ठ॒न्तु॒ । पु॒ष्क॒रिणी॑: । सम्ऽअ॑न्ता: ॥३४.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णाँ उदकेन दध्ना। एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत्पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चतुर: । कुम्भान् । चतु:ऽधा । ददामि । क्षीरेण । पूर्णान् । उदकेन । दध्ना । एता: । त्वा । धारा: । उप । यन्तु । सर्वा: । स्व:ऽगे । लोके । मधुऽमत् । पिन्वमाना: । उप । त्वा । तिष्ठन्तु । पुष्करिणी: । सम्ऽअन्ता: ॥३४.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 34; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (क्षीरेण) भोजन साधन से, (उदकेन) सेचन वा वृद्धिसाधन से और (दध्ना) धारण पोषण सामर्थ्य से (पूर्णान्) परिपूर्ण (कुम्भान्) भूमि को पूर्ण करनेवाले (चतुरः) चार अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को (चतुर्धा) चार प्रकार से अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आश्रम वा चारों वेद द्वारा (ददामि) दान करता हूँ। (एताः) ये (सर्वाः) सब (धाराः) धारण शक्तियाँ (स्वर्गे लोके) स्वर्ग लोक में (मधुमत्) मधु नाम ज्ञान की पूर्णता से (त्वा) तुझको (पिन्वमानाः) सींचती हुई (उप) आदर से (यन्तु) मिलें, और (समन्ताः) सम्पूर्ण (पुष्करिणीः=०-ण्यः) पोषणवती शक्तियाँ (त्वा) तुझ में (उप तिष्ठन्तु) उपस्थित होवें ॥७॥

    भावार्थ - परमेश्वर ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रम द्वारा और चारों वेद द्वारा धर्म अर्थ आदि चार पदार्थ देता है। इसलिये मनुष्य चारों आश्रम और चारों वेदों के यथावत् सेवन से चारों पदार्थ प्राप्त करके सदा आनन्दित रहें ॥७॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    I give you four potfuls (of Dharma, artha, kama and Moksha) four ways (of Brahmacharya, grhastha, vanaprastha and sanyasa), all full of the waters of life, milk of love and kindness, and curds of exciting energy. May all these abundant streams of fragrant flower-joy and honey sweets, rising and raising you in the state of paradisal bliss, flow by you for you.


    Bhashya Acknowledgment
    Top