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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 8
    ऋषिः - भृगुः देवता - त्रैककुदाञ्जनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - आञ्जन सूक्त
    47

    त्रयो॑ दा॒सा आञ्ज॑नस्य त॒क्मा ब॒लास॒ आदहिः॑। वर्षि॑ष्ठः॒ पर्व॑तानां त्रिक॒कुन्नाम॑ ते पि॒ता ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रय॑: । दा॒सा: । आ॒ऽअञ्ज॑नस्य । त॒क्मा । ब॒लास॑: । आत् । अहि॑: । वर्षि॑ष्ठ: । पर्व॑तानाम् । त्रि॒ऽक॒कुत् । नाम॑ । ते॒ । पि॒ता ॥९.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः। वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्रय: । दासा: । आऽअञ्जनस्य । तक्मा । बलास: । आत् । अहि: । वर्षिष्ठ: । पर्वतानाम् । त्रिऽककुत् । नाम । ते । पिता ॥९.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 9; मन्त्र » 8
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (तवमा) जीवन को कष्ट देनेवाला ज्वर, (बलासः) बल का गिरानेवाला संनिपात, कफ़ादि रोग, (आत्) और (अहिः) जीवों को मारनेवाला साँप, (त्रयः) ये तीनों (आञ्जनस्य) संसार के व्यक्त करनेवाले ब्रह्म के (दासाः) दास हैं। [हे आञ्जन, ईश्वर !] (वर्षिष्ठः) सब में वृद्ध, (पर्वतानाम्) (अवयव) वाले स्थूल लोकों का (पिता) पालनकर्ता, (त्रिककुत्) तीन प्रकार के [आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक] सुखों का पहुँचानेवाला यद्वा तीनों लोकों वा कालों में गतिवाला (ते) तेरा (नाम) नाम है ॥८॥

    भावार्थ

    ईश्वरीय नियम तोड़नेवाले मनुष्य को परमेश्वर अपनी न्यायव्यवस्था से रोग आदि कष्ट देता है, और अपने आज्ञाकारियों को वह अत्यन्त सुख पहुँचाता है ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(त्रयः) त्रिसंख्याकाः (दासाः) दंसेष्टटनौ न आ च। उ० ५।१०। इति दसि दर्शने-ट। दंसयति पश्यतीति दासः। यद्वा। दास दाने-अच्। दासति ददाति आत्मानं स दासः। सेवकाः (आञ्जनस्य) म० ३। जगतो व्यक्तीकारकस्य ब्रह्मणः (तक्मा) अ० १।२५।१। कृच्छ्रजीवनकारी ज्वरः (बलासः) बल+असुक्षेपणे-अण्। बलमस्यति क्षिपतीति। श्लेष्मविकारः (आत्) अपि च (अहिः) अ० २।५।५। आहन्ता। सर्पः (वर्षिष्ठः) प्रियस्थिर०। पा० ६।४।१५७। इति वृद्ध-इष्ठन्। वर्षि इत्यादेशः। वृद्धतमः (पर्वतानाम्) म० १। पर्ववान् पर्वतः-निरु० १।२०। पर्ववतां लोकानाम् (त्रिककुत्) त्रि+क+कुत्। कं सुखम्-निघ० ३।६। कवते, गतिकर्मा-निघ० २।१४। कुङ् गतिशोषणयोः-क्विप्, तुक् च। अन्तर्भावितण्यर्थः, पृषोदरादित्वात् तस्य दः। आध्यात्मिकादीनि त्रीणि कानि सुखानि कावयति गमयति स त्रिककुत्। यद्वा। मृग्रोरुतिः। उ० १।९४। इति त्रि+ककि गतौ-उति, तस्य दः। त्रिषु लोकेषु कालेषु वा ककुद् गतिर्यस्य सः (नाम) संज्ञा (ते) तव (पिता) सर्वस्य पाता पालयिता वा ॥

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    विषय

    पर्वतानाम् वर्षिष्ठः

    पदार्थ

    १. (आञ्जनस्य) = ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले प्रभु के ये (अयः) = तीनों (दासा:) = [दस्यन्ते] दास हैं-क्षीण करने योग्य है, अर्थात् प्रभु-भक्त को ये तीन पीडित करनेवाले नहीं होते—[क] (तक्मा) = कष्टमय जीवन का कारण बननेवाला ज्वर [तकि कृच्छ्जीवने], [ख] (बलास:) = [शरीरं बलम् अस्यति क्षिपतीति] शरीर के बल को नष्ट करनेवाला सन्निपात आदि रोग (आत्) = और [ग] (अहिः) = सर्पजन्य विष का विकार। प्रभु उपासना करने पर इन तीनों का भय नहीं रहता। २. (पर्वतानाम्) = अपना पूरण करनेवालों में (वर्षिष्ठः) = सर्वश्रेष्ठ (त्रिककुत्) = ज्ञान, बल व ऐश्वर्य तीनों ही दृष्टिकोणों से शिखर पर स्थित-सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् व सर्वैश्वर्यसम्पन्न-इस (नाम) = नामवाले वे प्रभु हे उपासक! (ते पिता) = तेरे रक्षक हैं। प्रभु से रक्षित इस उपासक को भय कहाँ ?

    भावार्थ

    प्रभु का उपासक ज्वर, सन्निपात रोग व सर्पदंश का शिकार नहीं होता। सब न्यूनताओं से रहित ज्ञान, बल व ऐश्वर्य के शिखर पर स्थित वे प्रभु इस उपासक के रक्षक हैं।

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    भाषार्थ

    (आञ्जनस्य) सर्वत्र अभिव्यक्ति करनेवाले ब्रह्म-पुरुष के (त्रयः) तीन (दासाः) दासवत् वशवर्ती हैं [सायण], या उपक्षयनीय हैं, (तक्मा) कृच्छ्र जीवन अर्थात् कष्टमय जीवन, (बलास:) वल की क्षेपण अर्थात् बल का अभाव, (आत्) तदनन्तर (अहिः१) सर्पवत् परछिद्र-प्रवेश पुरुष। (पर्वतानाम्) पर्वतों में (वर्षिष्ठः) सबसे वृद्ध अर्थात पुरातन या सुखवर्षी (त्रिककुद् नाम) तीन ककुदोंवाला पर्वत (ते) हे ब्रह्म-पुरुष! तेरा (पिता) पिता है।

    टिप्पणी

    [दासाः= दसु उपक्षये (दिवादिः)। ब्रह्म-पुरुष के 'आत्मस्वरूप' [मन्त्र ७] की प्राप्ति हो जाने पर कृच्छ्र जीवन, बलक्षय, तथा सर्ववत् परछिद्र में प्रवेश ये तीनों उपक्षीण हो जाते हैं। 'पर्वतानाम्' तथा 'त्रिककुद्',— ये दो पद विचारणीय है। पर्वत पद अनेकार्थक है। निघण्टु १।१० में पर्वत, मेघवाची है, परन्तु इस आञ्जन-प्रकरण में पर्वत का अर्थ है पर्ववान् अर्थात् जोड़वाला। यथा, -"पर्ववान् पर्वतः। तत्प्रकृतीतरत् सन्धिसामान्यात्" (निरुक्त १।६।२०)। मन्त्र में 'पर्वत' पद सन्धिवाचक है, अर्थात् वर्णों की सन्धि द्वारा निर्मित 'पद', शब्दात्मक-पद। वह है ओम्, जोकि "अ, उ, म्" इन तीन वर्णों की सन्धि द्वारा निष्पन्न है। इसलिए ओम् की व्याख्या में "अ, उ, म" इन तीन वर्णों की व्याख्या माण्डूक्य उपनिषद् में हुई है। माण्डूक्य उपनिषद् में, प्रथमः पादः द्वितीयः पादः तथा ततीयः पादः द्वारा। इन तीन पदों को "अकार:, उकार:, मकार:" कहा है (माण्डूक्य उप० खण्ड ८)। त्रिककुत्=इसके परिज्ञान के लिए निम्नलिखित मन्त्र विचारणीय है, यथा- सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्तसिन्धव:। अनु क्षरन्ति काकुदं सुर्म्यं सुषिरामिव। -- ऋ० ८।६९।१२; तथा निरुक्त ५।४।२७ है वरुण ! (सुदेवः) उत्तमदेव (असि) तु है, (यस्य ते) जिस तेरे (सप्तसिन्धवः) सात स्यन्दन करनेवाले मन्त्र (काकुदम्) काकुद के अनुकूल क्षरण करते हैं, (इव) जैसेकि (सूर्म्यम्) उत्तम ऊर्मियोंवाला स्रोत (सुषिराम्) सुछिद्रा भूमि में क्षरण करता है। मन्त्र में 'काकुदम्' की व्याख्या में निरुक्त में कहा है कि "काकुदं ताल्चित्याचक्षते, जिह्वा कोकुवा सास्मिन् धीयते" (५।४।२७ पदसंख्या ७६)। अर्थात् काकुद है 'तालु', मुखस्थ प्रदेश, और कोकुवा है जिह्वा जोकि इस तालु में धारित होती है। काकुदम्= "कोकुवा+धा"। इस निष्पत्ति में वर्णविकार, वर्णनाश आदि नाना परिवर्तन करने होते हैं, जोकि क्लिष्ट कल्पना है। काकुदम् में ककुद् या कुकुत् पद स्पष्ट प्रतीत होता है। बैल की गर्दन के समीप एक उच्च प्रदेश उभरा हुआ होता है जिसकी ककुद् कहते हैं। 'तालु' भी उच्च प्रदेश है। इस अर्थ में भी ककुद् का अभिप्राय 'तालु' सम्भव है। सूक्त के मंत्र ८ में 'त्रिककुत्' पद पठित है, अत: इसका अर्थ 'तीन ककुदों वाला प्रदेश' अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। तालु में तीन उच्च प्रदेश अभिप्रेत हैं, कण्ठ और दो ओष्ठ, एक नीचे का ओष्ठ और दुसरा ऊपर का ओष्ठ। ब्रह्म-पुरुष का जप "ओम्" द्वारा या ओम् सम्बन्धी तीन अवयवों, "अ, उ, म्" द्वारा होता है। ये ही "त्रिककुत्" हैं। ते पिता= ये "त्रिककुत्" हे ब्रह्म-पुरुष ! तेरे पिता हैं। इन तीनों के समूहरूप ओम् द्वारा ब्रह्म-पुरुष की अभिव्यक्ति होती है, अतः इसे पिता कहा है। अथर्व (४।३९।९) में अग्नि में विचरनेवाले अग्नि नामक परमेश्वर को 'ऋषीणां पुत्रः' कहा है, और इस द्वारा ऋषियों को पिता कहा है, क्योंकि ऋषियों में आर्ष दृष्टि के उत्पन्न होने पर परमेश्वर का साक्षात्कार उन्हें होता है। इस प्रकार वेद की वस्तुवर्णन-शैली अद्भुत है।] [१. अथवा, सर्पवत् कुटिल गति, अर्थात् चाल, व्यवहार।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Anjana, Refinement

    Meaning

    Three are the negativities against Anjana, enemies of the beauty and grace of life divine: These are: feverish ambition for the material world, depressive delusion of the mind against clairvoyance, and serpentine suppression of the spirit by passion and instinct. O Anjana, your father and protector is the most generous and highest gracious Spirit of the highest possibilities of life, his name being Kakut, master controller of the three modes of Nature: Sattva, clairvoyance of intelligence, Rajas, energy, and Tamas, inertia or matter. This protector and master of the three motherly materials of Prakrti is Tryambakam, fragrant promoter of the real life.

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    Translation

    Verily, three are the slaves of this belm-fever, consumption and also the snake. Trikakut (having three peaks), the aia of the mountains, is your father, O ointment.

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    Translation

    These three—the fever, consumption and snake-bite causing eye-diseases are destructible wretched of the salve. (These three are destroyed by the salve), the lofty mountain having three Peaks is the father, the mine of this salve.

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    Translation

    Inferiority complex, pessimism, serpent-like lust are the three slaves of a man of knowledge. O Knowledge, thy protector, the strongest of all protectors is God, the grantor of spiritual, physical and elemental happiness who is present in past, present and future, and in Heaven space and Earth, who is the Revealer of Knowledge, Action and Contemplation through the Vedas!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(त्रयः) त्रिसंख्याकाः (दासाः) दंसेष्टटनौ न आ च। उ० ५।१०। इति दसि दर्शने-ट। दंसयति पश्यतीति दासः। यद्वा। दास दाने-अच्। दासति ददाति आत्मानं स दासः। सेवकाः (आञ्जनस्य) म० ३। जगतो व्यक्तीकारकस्य ब्रह्मणः (तक्मा) अ० १।२५।१। कृच्छ्रजीवनकारी ज्वरः (बलासः) बल+असुक्षेपणे-अण्। बलमस्यति क्षिपतीति। श्लेष्मविकारः (आत्) अपि च (अहिः) अ० २।५।५। आहन्ता। सर्पः (वर्षिष्ठः) प्रियस्थिर०। पा० ६।४।१५७। इति वृद्ध-इष्ठन्। वर्षि इत्यादेशः। वृद्धतमः (पर्वतानाम्) म० १। पर्ववान् पर्वतः-निरु० १।२०। पर्ववतां लोकानाम् (त्रिककुत्) त्रि+क+कुत्। कं सुखम्-निघ० ३।६। कवते, गतिकर्मा-निघ० २।१४। कुङ् गतिशोषणयोः-क्विप्, तुक् च। अन्तर्भावितण्यर्थः, पृषोदरादित्वात् तस्य दः। आध्यात्मिकादीनि त्रीणि कानि सुखानि कावयति गमयति स त्रिककुत्। यद्वा। मृग्रोरुतिः। उ० १।९४। इति त्रि+ककि गतौ-उति, तस्य दः। त्रिषु लोकेषु कालेषु वा ककुद् गतिर्यस्य सः (नाम) संज्ञा (ते) तव (पिता) सर्वस्य पाता पालयिता वा ॥

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