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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 22 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 6
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - तक्मनाशनः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - तक्मनाशन सूक्त
    64

    तक्म॒न्व्या॑ल॒ वि ग॑द॒ व्य॑ङ्ग॒ भूरि॑ यावय। दा॒सीं नि॒ष्टक्व॑रीमिच्छ॒ तां वज्रे॑ण॒ सम॑र्पय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तक्म॑न् । विऽआ॑ल । वि । ग॒द॒ । विऽअ॑ङ्ग । भूरि॑ । य॒व॒य॒ । दा॒सीम् । नि॒:ऽतक्व॑रीम् । इ॒च्छ॒ । ताम् । वज्रे॑ण । सम् । अ॒र्प॒य॒ ॥२२.६।


    स्वर रहित मन्त्र

    तक्मन्व्याल वि गद व्यङ्ग भूरि यावय। दासीं निष्टक्वरीमिच्छ तां वज्रेण समर्पय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तक्मन् । विऽआल । वि । गद । विऽअङ्ग । भूरि । यवय । दासीम् । नि:ऽतक्वरीम् । इच्छ । ताम् । वज्रेण । सम् । अर्पय ॥२२.६।

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 22; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रोग नाश करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (तक्मन्) हे ज्वर ! (व्याल) हे सर्प ! हे धूर्त ! (व्यङ्ग) हे कुरूप ! (विगद) तू बोल, (भूरि) बहुत दूर (यवय) चला जा (निष्टक्करीम्) ठटोल, निर्लज्ज (दासीम्) दासी [नीच स्त्री] को (इच्छ) ढूँढ़ और (ताम्) उसको (वज्रेण) अपने वज्र से (समर्पय) मार गिरा ॥६॥

    भावार्थ

    कुचाली, व्यभिचारी स्त्री पुरुष रोगी होकर दारुण दुःख भोगते हैं, इससे मनुष्य सदाचारी होकर सदा स्वस्थ रहें ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(तक्मन्) हे ज्वर (व्याल) वि+अड व्याप्तौ उद्यमे च−घञ्, डस्य लः। हे सर्प। हे धूर्त (वि) विशेषेण (गद) वद (व्यङ्ग) वि विकलमङ्गं यस्य। हे कुरूप (भूरि) बहुदूरम् (यवय) पृथग्भव (दासीम्) नीचस्त्रियम् (निष्टक्करीम्) श्रः करन्। उ० ४।३। इति निः+तक हसने−करन्, ङीप्। उपहासशीलाम्। निर्लज्जाम् (इच्छ) अन्विच्छ (ताम्) दासीम् (वज्रेण) स्वकुठारेण (समर्पय) सम्+ऋ गतौ हिंसायां च−णिच्, युक्। निक्षिप ॥

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    विषय

    असंयम व ज्वर

    पदार्थ

    १. हे (तक्मन्) = जीवन को कष्टमय बनानेवाले, (व्याल) = सर्प के समान विषैले, (व्यंग) = [वि अङ्ग] अङ्गों को विकृत कर देनेवाले, (वि-गद) = विशिष्ट ज्वर ! तू (भूरि यावय) = हमें तो बहुत दूर छोड़ा जा-हमसे दूर चला जा। २. तू (निष्टक्वरीम्) = [नि: तक हसने] निकृष्ट परिहास करनेवाली (दासीम्) = शक्तियों का क्षय करनेवाली दासी की (इच्छ) = कामना कर-उसी को प्राप्त हो, (तां वज्रेण समर्पय) = उसी को अपने वज्र से पीड़ित कर [ हिंसायाम्] । तेरा वज्र इस ठठोल, असंयमी स्त्री को ही आहत करे।

    भावार्थ

    ज्वर शरीर में विर्षों को उत्पन्न कर देता है, अङ्गों को विकृत कर देता है, जीवन को कष्टमय बना देता है। असंयमी और शक्ति का क्षय कर लेनेवाले व्यक्तियों को यह प्राप्त होता है।

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    भाषार्थ

    (व्याल) विशेषरूप में समाप्त कर देनेवाले! (वि गद) व्यक्त वाणी बोलने से विगत कर देनेवाले! (व्यङ्ग) अङ्गों को विकृत कर देनेवाले ! (तक्मन्) जीवन को कृच्छ्र कर देनेवाले हे ज्वर (भूरि) प्रभूतरूप में (यावय) हमें तू अपने से पृथक् कर दे। (निष्टक्वरीम्) तक्सा से रहित, (दासीम् ) परन्तु क्षीणा हुई स्त्री को (इच्छ) तू चाह, (ताम) उसे (वज्रेण) निज वज्र द्वारा (समर्पय) समर्पित हो, प्राप्त हो।

    टिप्पणी

    [व्याल१= वि+आ+अल ('अलम्' कर देनेवाला, समाप्त कर देनेवाला तक्मा) वि गद=वि+गद व्यक्तायां वाचि (भ्वादिः)। यावय= यु अमिश्रणे च (अदादिः)। दासीम्= दसु उपक्षये (दिवादिः)। वज्रेण= कष्टापत्त्या। जो स्त्री तक्मा से रहित है, परन्तु शक्ति से दुर्बल हो गई है, वह तक्मा से पुनः आक्रान्त हो जाती है। स्त्रियाँ प्रायः गृह में रहती हैं और शारीरिक परिश्रम नहीं करती अत: वे तक्मा से पराभूत हो जाती हैं। (देखिये मन्त्र ७)।] [१. अथवा, व्याल=सर्पसदृश घातक।]

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    विषय

    ज्वर का निदान और चिकित्सा।

    भावार्थ

    हे (तक्मन्) दुःखदायक ज्वर ! हे (व्याल) सर्प के समान विष रूप से शरीर में फैलने वाले ! हे (वि-गद) विषमज्वर ! हे (वि-अङ्ग) शरीर को विकृत करने वाले ज्वर ! (भूरि यवय) तू हम से बहुत दूर रह। तू (निः- तक्वरीम्) खूब ज्वर को फैलाने वाली, खूब पीड़ादायक (दासीम्) काटने वाली, मच्छर जाति को (इच्छ) चाहता है और (तां) उसी को (वज्रेण) अपने रोग पीड़ादायक हथियार से (सम्-अर्पय) समृद्ध करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरसो ऋषयः। तक्मनाशनो देवता। १, २ त्रिष्टुभौ। (१ भुरिक्) ५ विराट् पथ्याबृहती। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Fever

    Meaning

    The fever is fatal like snake poison. Typically dangerous as it is, it should be eliminated. It affects the female mosquito and on it it strikes its forceful onslaught.

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    Translation

    O fever, vicious, much poisonous, distorter of limbs, may you go far away. Seek her, who does not move about, as your maid-servant and strike her with your adamantine weapon.

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    Translation

    Let this fever which is like a snake, which is limbless and which is an extraordinary disease. be away from us. Let it desire to go back to the luxuriant destructive species of mosquitoes and strike them with its weapons.

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    Translation

    O Fever, poisonous like a snake, virulent in nature, deformer of the body, keep thyself far away from us. Thou longest for the fever-spreading and biting race of mosquitoes, and strengthenest it with thy deadly venom.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(तक्मन्) हे ज्वर (व्याल) वि+अड व्याप्तौ उद्यमे च−घञ्, डस्य लः। हे सर्प। हे धूर्त (वि) विशेषेण (गद) वद (व्यङ्ग) वि विकलमङ्गं यस्य। हे कुरूप (भूरि) बहुदूरम् (यवय) पृथग्भव (दासीम्) नीचस्त्रियम् (निष्टक्करीम्) श्रः करन्। उ० ४।३। इति निः+तक हसने−करन्, ङीप्। उपहासशीलाम्। निर्लज्जाम् (इच्छ) अन्विच्छ (ताम्) दासीम् (वज्रेण) स्वकुठारेण (समर्पय) सम्+ऋ गतौ हिंसायां च−णिच्, युक्। निक्षिप ॥

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