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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 13
    ऋषिः - चातनः देवता - जातवेदाः छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - रक्षोघ्न सूक्त
    48

    सोम॑स्येव जातवेदो अं॒शुरा प्या॑यताम॒यम्। अग्ने॑ विर॒प्शिनं॒ मेध्य॑मय॒क्ष्मं कृ॑णु॒ जीव॑तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सोम॑स्यऽइव । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । अ॒शु: । आ । प्या॒य॒ता॒म् । अ॒यम् । अग्ने॑ । वि॒ऽर॒प्शिन॑म् । मेध्य॑म् । अ॒य॒क्ष्मम् । कृ॒णु॒ । जीव॑तु ॥२९.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सोमस्येव जातवेदो अंशुरा प्यायतामयम्। अग्ने विरप्शिनं मेध्यमयक्ष्मं कृणु जीवतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सोमस्यऽइव । जातऽवेद: । अशु: । आ । प्यायताम् । अयम् । अग्ने । विऽरप्शिनम् । मेध्यम् । अयक्ष्मम् । कृणु । जीवतु ॥२९.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 29; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध ! (अयम्) यह पुरुष (सोमस्य अंशुः इव) चन्द्रमा की किरण अथवा सोमलता के अङ्कुर के समान (आ प्यायताम्) बढ़ता रहे। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! तू (विरप्शिनम्) विविध प्रकार से कहने योग्य महागुणी पुरुष को (अयक्ष्मम्) नीरोग और (मेध्यम्) बुद्धि के लिये हितकारी (कृणु) कर, और (जीवतु) वह जीता रहे ॥१३॥

    भावार्थ

    विद्वान् पुरुष शारीरिक और आत्मिक रोगों को नाश करके सब को प्रसन्न रक्खे ॥१३॥

    टिप्पणी

    १३−(सोमस्य) चन्द्रस्य सोमवृक्षस्य वा (इव) यथा (अंशुः) म० १२। किरणो अङ्कुरो वा (आ) सम्यक् (प्यायताम्) वर्धताम् (अयम्) पुरुषः (अग्ने) विद्वन् (विरप्शिनम्) वि+रप व्यक्तायां वाचि−शक्। विविधं रपणं विरप्शः। तदस्यास्ति, इनि। विरप्शी, महन्नाम−निघ० ३।३। महागुणविशिष्टम् (मेध्यम्) उगवादिभ्यो यत्। पा० ५।१।२। इति मेधा-यत्। मेधायै हितम्। मेधाविनम् (अयक्ष्मम्) नीरोगम् (कृणु) कुरु (जीवतु) सप्राणान् धारयतु ॥

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    विषय

    विरप्शी, मेध्य, अयक्ष्म

    पदार्थ

    १. हे (जातवेदः) = ज्ञानी वैद्य ! (अयम्) = यह पुरुष (सोमस्य अंशः इव) = चन्द्रमा की किरण के समान (आप्यायताम्) = आष्यायित होता चले। जैसे चन्द्रमा की एक-एक किरण बढ़ती जाती है, इसीप्रकार यह बढ़ता चले। २. हे (अग्ने) = अग्रणी वैद्य! तू इस पुरुष को (विरप्शिनम्) = निर्दोष अथवा शुद्ध शब्दों का उच्चारण करनेवाला (मेध्यम्) = पवित्र (अयक्ष्मम्) = नीरोग (कृणु) = कर दे, (जीवतु) = यह पूर्ण जीवन को जीनेवाला हो।

    भावार्थ

    उचित औषध-प्रयोग से चन्द्रमा की भाँति वृद्धि को प्राप्त होता हुआ यह पुरुष "निर्दोष, पवित्र व नीरोग' बने।

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    भाषार्थ

    (जातवेदः) हे प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान (अग्ने) यज्ञिय अग्नि ! (सोमस्य अंशुः इव) सोम ओषधि के अंकुरों के सदृश (अयम् ) यह रुग्ण (आ प्यायताम् ) पूर्णतया प्रवृद्ध हो। इसे (विरप्शिनम्) महान् (मेध्यम्) मेधावान, (अयक्ष्मम् ) यक्ष्मारहित (कृणु) कर, (जीवतु) यह जीवित रहे ।

    टिप्पणी

    [विरप्शी=महान् (निघं० ३।३) । अथवा 'वि +रप् (व्यक्तायां वाचि, भ्वादिः)+शीङ् स्वप्ने (अदादिः), अर्थात् व्यक्त वाणी बोलनेवाला हुआ तथा सुखपूर्वक शयन करनेवाला।]

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    विषय

    रोगों का नाश करके आरोग्य होने का उपाय।

    भावार्थ

    हे (जात-वेदः) अग्ने ! (सोमस्य अंशुः इव) चन्द्र के एक भाग, कला के समान (अयम्) यह कृश पुरुष भी (आ प्यायताम्) पुष्टि को प्राप्त हो। हे (अग्ने) अग्ने ! (विरप्शिनम्) नाना प्रकार की विद्याओं का उपदेश करने वाले महान् विद्वान् (मेध्यं) मेधावी, पवित्राचारी पुरुष को (अयक्ष्मं) रोग, यक्ष्मादि कष्ट से रहित (कृणु) कर जिससे वह (जीवतु) चिरकाल तक जीवित रहे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। जातवेदा मन्त्रोक्ताश्व देवताः। १२, ४, ६-११ त्रिष्टुमः। ३ त्रिपदा विराड नाम गायत्री। ५ पुरोतिजगती विराड्जगती। १२-१५ अनुष्टुप् (१२ भुरिक्। १४, चतुष्पदा पराबृहती ककुम्मती)। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of Germs and Insects

    Meaning

    Agni, Jataveda, let this patient recover and grow like filaments of the lotus and be whole like phases of the moon. Let him be fully healthy, strong, vigorous, fresh and free from negativities. Let him live his full life.

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    Translation

    O knower of all the born organisms, may this person swell like a tendril of Soma plant (like the rays of moon). O biological fire, may you make this person powerful, discrete, and free from consumption. May he live.

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    Translation

    O learned physician! let this man swell like the phase of moon. O learned one! make him full of sap, fat and free from consumption and let him live.

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    Translation

    O learned physician, let this sick man grow like a digit of the moon. Make him free from fault, impurity and disease, so that he may live long!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(सोमस्य) चन्द्रस्य सोमवृक्षस्य वा (इव) यथा (अंशुः) म० १२। किरणो अङ्कुरो वा (आ) सम्यक् (प्यायताम्) वर्धताम् (अयम्) पुरुषः (अग्ने) विद्वन् (विरप्शिनम्) वि+रप व्यक्तायां वाचि−शक्। विविधं रपणं विरप्शः। तदस्यास्ति, इनि। विरप्शी, महन्नाम−निघ० ३।३। महागुणविशिष्टम् (मेध्यम्) उगवादिभ्यो यत्। पा० ५।१।२। इति मेधा-यत्। मेधायै हितम्। मेधाविनम् (अयक्ष्मम्) नीरोगम् (कृणु) कुरु (जीवतु) सप्राणान् धारयतु ॥

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