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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अथर्वा देवता - लाक्षासूक्तम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - लाक्षा
    38

    हिर॑ण्यवर्णे॒ सुभ॑गे॒ सूर्य॑वर्णे॒ वपु॑ष्टमे। रु॒तं ग॑च्छासि निष्कृते॒ निष्कृ॑ति॒र्नाम॒ वा अ॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हिर॑ण्यऽवर्णे । सुऽभ॑गे । सूर्य॑ऽवर्णे । वपु॑:ऽतमे । रु॒तम् । ग॒च्छा॒सि॒ । नि॒:ऽकृ॒ते॒ । नि:ऽकृ॑ति: । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ ॥५.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हिरण्यवर्णे सुभगे सूर्यवर्णे वपुष्टमे। रुतं गच्छासि निष्कृते निष्कृतिर्नाम वा असि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हिरण्यऽवर्णे । सुऽभगे । सूर्यऽवर्णे । वपु:ऽतमे । रुतम् । गच्छासि । नि:ऽकृते । नि:ऽकृति: । नाम । वै । असि ॥५.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 5; मन्त्र » 6
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (हिरण्यवर्णे) हे सुवर्ण के रूपवाली ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (सूर्यवर्णे) हे सूर्यसमान वर्णवाली ! (वपुष्टमे) हे अतिशय उत्तम रूपवाली ! (निष्कृते) हे उद्धारशक्ति ! (रुतम्) हमारे दुःख में (गच्छासि) तू पहुँच। (निष्कृतिः) उद्धारशक्ति (नाम वै) अवश्य ही (असि) है ॥६॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर के उपकार विचारके निर्धनता, रोग आदि क्लेशों को प्रयत्नपूर्वक हटावें ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(हिरण्यवर्णे) हे सुवर्णरूपे (सुभगे) शोभनैश्वर्ययुक्ते (सूर्यवर्णे) आदित्यवर्णे (वपुष्टमे) वपुः=रूपम्−निघ० ३।७। मतुपो लोपः। वपुष्मत्तमे। अतिशयप्रशस्तरूपे (रुतम्) रुङ् गतिहिंसयोः−क्त। दुःखम् (गच्छासि) लेट्। प्राप्नुयाः (निष्कृते) म० ४। रोगस्य बहिष्करणशक्ते (निष्कृतिः) निर्मुक्तिः। उद्धारशक्तिः (नाम) अवश्यम् (वै) एव (असि) ॥

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    विषय

    वपुष्टमा निष्कृति

    पदार्थ

    १. (हिरण्यवर्णे) = सुवर्ण के समान पीतवर्णवाली, (सुभगे) = उत्तम सौभाग्य की कारणभूत (सूर्यवर्णे) सूर्य के समान चमकती हुई, (वपुष्टमे) = [वपू रूपम्-नि० ३.७] अतिशयित उत्तम रूपवाली (निष्कृते) = रोग को सर्वथा दूर करनेवाली लाक्षे! तू (रुतं गच्छासि) = रोग वा व्रण पर पहुँचती है-उस रोग वा व्रण को समाप्त करनेवाली होती है। २. तु (वा) = निश्चय से (निष्कृति:) = निष्कृति (नाम असि) = नामवाली है-सचमुच रोग को बाहर करनेवाली है।

    भावार्थ

    लाक्षा चमकती हुई है। यह रोग वा व्रण को दूर करके सौभाग्य का कारण बनती है। वस्तुत: यह 'निष्कृति' है।

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    भाषार्थ

    (हिरण्यवर्णे) हे सुवर्ण के वर्णवाली ! (सुभगे ) हे सुन्दर रूपैश्वर्य-वाली ! (सूर्यवर्णे) हे सूर्य के सदृश वर्णवाली ! (वपुष्टमे) हे अत्यन्त सुन्दर शरीरवाली ! (निष्कृते) हे कष्ट दूर करनेवाली लाक्षा ! (रुतम्) रुलाने-वाले घाव को (गच्छासि) तू प्राप्त हो, (वै) निश्चय से ( नाम) प्रसिद्ध (निष्कृतिः) रुलानेवाले घाव को दूर करनेवाली (असि) तू है ।

    टिप्पणी

    ["लाक्षा" लाल वर्णवाली होती है, जैसाकि सूर्य उदय और अस्त समय में लाल होता है। रुतम्= रु शब्दे (अदादिः), अभिप्रेत है - घाव के कारण कष्टोत्पन्न शब्द। लाक्षा लाल होती है, अत: इसका शरीर अर्थात् स्वरूप सुन्दर है, बुरा नहीं।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Laksha

    Meaning

    Golden in colour, blissful, bright as sun light, good for body’s health, when applied to the wound, you heal and heal completely. Indeed, your very name is Nishkrti, the healer, the restorative.

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    Translation

    O gold-coloured (hiranya varna), bringer of good fortune, sun-coloured and most beneficial for body, O relieving one, may you reach the wound (or injury; verily, niskrti (reliever) is your name.

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    Translation

    This Laksha is of golden color, brilliant like rays, beautiful and of Spreading nature. Its healing comes into the fracture therefore; it bears the name of Niskriti the healing one.

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    Translation

    Gold-colored, lustrous, shining like the Sun, most lovely, O healing medicine, thou art applied on the wound or fracture. Healing is thy name!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(हिरण्यवर्णे) हे सुवर्णरूपे (सुभगे) शोभनैश्वर्ययुक्ते (सूर्यवर्णे) आदित्यवर्णे (वपुष्टमे) वपुः=रूपम्−निघ० ३।७। मतुपो लोपः। वपुष्मत्तमे। अतिशयप्रशस्तरूपे (रुतम्) रुङ् गतिहिंसयोः−क्त। दुःखम् (गच्छासि) लेट्। प्राप्नुयाः (निष्कृते) म० ४। रोगस्य बहिष्करणशक्ते (निष्कृतिः) निर्मुक्तिः। उद्धारशक्तिः (नाम) अवश्यम् (वै) एव (असि) ॥

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