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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    119

    वै॑कङ्क॒तेने॒ध्मेन॑ दे॒वेभ्य॒ आज्यं॑ वह। अग्ने॒ ताँ इ॒ह मा॑दय॒ सर्व॒ आ य॑न्तु मे॒ हव॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वै॒क॒ङ्क॒तेन॑ । इ॒ध्मेन॑ । दे॒वेभ्य॑: । आज्य॑म् । व॒ह॒ । अग्ने॑ । तान् । इ॒ह । मा॒द॒य॒ । सर्वे॑ । आ । य॒न्तु॒ । मे॒ । हव॑म् ॥८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वैकङ्कतेनेध्मेन देवेभ्य आज्यं वह। अग्ने ताँ इह मादय सर्व आ यन्तु मे हवम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वैकङ्कतेन । इध्मेन । देवेभ्य: । आज्यम् । वह । अग्ने । तान् । इह । मादय । सर्वे । आ । यन्तु । मे । हवम् ॥८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (वैकङ्कतेन) विज्ञानसम्बन्धी (इध्मेन) प्रकाश के साथ (देवेभ्यः) व्यवहारकुशल पुरुषों को (आज्यम्) पाने योग्य वस्तु (वह) पहुँचा। (अग्ने) हे अग्निसमान तेजस्वी राजन् ! (तान्) उन लोगों को (इह) यहाँ पर (मादय) प्रसन्न कर। (सर्वे) वे सब (मे) मेरी (हवम्) पुकार को (आ यन्तु) आकर प्राप्त हों ॥१॥

    भावार्थ

    राजा अनेक विद्याओं का प्रचार करके विद्वानों का सत्कार करे, जिस से प्रजा में दुःख लेशमात्र न रहे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(वैकङ्कतेन) भृमृदृशि०। उ० ३।१०१। इति विपूर्वात् ककि गतौ−अतच्, ततः अण्। विज्ञानेन सम्बन्धिना। वैज्ञानिकेन (इध्मेन) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति ञिइन्धी दीप्तौ−मक्। प्रकाशेन (देवेभ्यः) व्यवहारकुशलेभ्यः (आज्यम्) आङ् पूर्वादञ्जेः संज्ञायामुपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।१०९। इति आङ्+अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु−क्यप्। अनिदितां हल०। पा० ६।१।२४। इति नस्य लोपः। व्यक्तीकरणीयं प्रकाशनीयम्। गम्यं प्राप्यं वस्तु (वह) प्रापय (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (तान्) देवान् (इह) अस्मिन् देशे (मादय) हर्षय (सर्वे) देवाः (आ यन्तु) आगच्छन्तु (मे) मम (हवम्) आह्वानम् ॥

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    विषय

    वैकंकत इध्म

    पदार्थ

    १. जैसे 'कंकतिका' बालों में से मैल को दूर कर देती है [comb off remove], उसी प्रकार वह ज्ञानदीप्सि जो जीवन में से काम-क्रोध आदि को दूर कर देती है, यहाँ 'वैकङ्कत इध्म' कही गई है [इन्धी दीसौ]। इस (वैक्ड़तेन इध्मेन) = विशेषरूप से मलों का बारण करनेवाली ज्ञानदीति के हेतु से हे (अग्ने) = प्रभो! (देवेभ्यः आग्यं) = वह-विद्वानों से हमारे लिए ज्ञानरूपी घृत प्राप्त कराइए। २. (तान्) = उन देवों को (इह) = यहाँ-हमारे जीवनों में (मादय) = अनान्दित कीजिए। हम इन ज्ञानियों का सत्कार करें, वे हमसे प्रसन्न रहें और (सर्वे) = वे सब (मे हवम्) = मेरी पुकार को सुनकर (आयन्तु) = मुझे प्रास हों। मेरा घर सदा ज्ञानियों का अतिथिगह बना रहे।

    भावार्थ

    ज्ञान वह कंकतिका [कंघी] है जो काम-क्रोध आदि मलों का वारण करती है। मुझे ज्ञानियों से यह ज्ञान प्राप्त होता रहे। हम ज्ञानियों का सम्पर्क करें और उनके प्रिय बनें।

     

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    भाषार्थ

    (वैकङ्कतेन) विकङ्कत वृक्ष की ( इध्मेन) इध्म द्वारा, (देवेभ्यः) साम्राज्य के दिव्य अधिकारियों के लिए, (आज्यम्) घृतसम्पन्न खाद्य (वह) प्राप्त कर [इस द्वारा उनका सत्कार कर] (अग्ने) हे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (तान् ) उन अधिकारियों को (इह) यहाँ अर्थात् यज्ञस्थल में (मादय) हर्षित कर, प्रसन्न कर, ताकि ( सर्वे ) वे सब (मे) मेरे (हवम्) आह्वान पर (आ यन्तु) मेरी सहायता के लिए आ जाएँ ।

    टिप्पणी

    [मन्त्रोक्ति साम्राज्य के मुख्य सेनापति की है, जिसेकि बृहस्पति , अर्थात् बृहती सेना का पति कहते हैं (यजु:० १७। ४०)। सूक्त युद्धपरक है। युद्धारम्भ में यज्ञपूर्वक सब अधिकारी-देवों का सत्कार किया है, ताकि वे प्रसन्न होकर मुख्य सेनापति की सहायता करें।

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    विषय

    सैनिकों और सेनापतियों के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे (अग्ने) अग्ने ! राजन् ! शत्रुतापक ! (इध्मेन वैकङ्क-तेन) अति तेजस्वी वज्र की सहायता से (देवेभ्यः) देव-विद्वान् पुरुषों के हित के लिये (आज्यम्) खाने पीने के पदार्थों, बल वीर्य को (वह) धारण कर। (इह) इस राष्ट्र में (तान्) उन सबको (मादय) प्रसन्न कर। वे सब (मे हवम् आयन्तु) मेरे यज्ञ में आवें।

    टिप्पणी

    प्रजापतिर्यां प्रथमामाहुतिमजुहोत्स हुत्वा यत्र न्यमृष्ट ततो विकङ्कतः समभवत्। श० ६। ३। १। तस्मादेष यज्ञो विकङ्कतः। विकङ्कतं भाः आर्च्छत् १। १। ३। १२ ॥ वज्रो वै विकङ्कतः। श० ५। २। ४। १८ ॥ प्रजापति की प्रथम आहुति अर्थात् ईश्वर की शक्ति का प्रकृति में प्रथम संचार है जिससे हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ है। उसी आहुति से यह विराट् यज्ञ उत्पन्न हुआ जिसमें उस अग्नि के बल से सब वैकारिक भूत संयुक्त होकर प्रपञ्च रच रहे हैं। राष्ट्रपक्ष में—अर्थ पूर्व कर दिया है। अध्यात्म में—वैकङ्कत इध्म-प्राण, आज्य = अन्न रस प्राण आदि। अग्नि = वैश्वानर जाठर अग्नि। राष्ट्र पक्ष में वैकङ्कत-इध्म = वज्रमय अग्नि-युद्ध, उस में अग्नि रूप राजा या सेनापति अपने देव = नियुक्त अधिकारियों को आज्य = वज्र, तलवार और अभिलषित पदार्थ प्रदान करें। युद्ध भी यज्ञ है, देखो महाभारत शान्तिपर्व में भीष्म-वचन। संवत्सर यज्ञ में कालाग्नि में ऋतुगण ही इध्म और आज्य आदि कल्पित हैं। जिनमें वसन्त वृत है, ग्रीष्म ईंधन है, शरत् हवि है इत्यादि विद्वान् समझ लें।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। १, २ अग्निर्देवता। ३ विश्वेदेवाः। ४-९ इन्द्रः। २ त्र्यवसाना षट्-पदा जगती। ३, ४ भुरिक् पथ्यापंक्तिः। ६ प्रस्तार पंक्तिः। द्वयुष्णिक् गर्भा पथ्यापंक्तिः। ९ त्र्यवसाना षट्पदा द्व्युष्णिग्गर्भा जगती। नवर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elimination of Enemies

    Meaning

    With sharp and blazing fuel, Agni, ruling power of fire, send noble fighting forces the food and ammunition they need. Let them all be happy here, not wanting anything. Let them all hear my call and come to my yajna.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    O sacrificial fire, with the burning wood of vikankata (Flacourtia sapida), may you carry the purified butter to the bounties of Nature. May you make them revel here. May all of them come at my call.(vikankata = a fuel for sacrifices, the fire -yajnas) -

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    Translation

    With the electrical fuel, O King! bring the necessary provision of eating and drinking for the learned people and give them pleasure in this nation. Let them participate in our yajna,

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    Translation

    O King, with the aid of a sharp weapon, acquire strength and valour, for the welfare of the learned. Make them all joyful in thy Kingdom, let them all come unto my call.

    Footnote

    वज्रो वै विकङ्कनः Shatpath 5-2-4-18.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(वैकङ्कतेन) भृमृदृशि०। उ० ३।१०१। इति विपूर्वात् ककि गतौ−अतच्, ततः अण्। विज्ञानेन सम्बन्धिना। वैज्ञानिकेन (इध्मेन) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति ञिइन्धी दीप्तौ−मक्। प्रकाशेन (देवेभ्यः) व्यवहारकुशलेभ्यः (आज्यम्) आङ् पूर्वादञ्जेः संज्ञायामुपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।१०९। इति आङ्+अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु−क्यप्। अनिदितां हल०। पा० ६।१।२४। इति नस्य लोपः। व्यक्तीकरणीयं प्रकाशनीयम्। गम्यं प्राप्यं वस्तु (वह) प्रापय (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (तान्) देवान् (इह) अस्मिन् देशे (मादय) हर्षय (सर्वे) देवाः (आ यन्तु) आगच्छन्तु (मे) मम (हवम्) आह्वानम् ॥

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