अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 102 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 102/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - जमदग्नि देवता - अश्विनौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अभिसांमनस्य सूक्त
    पदार्थ -

    (अश्विना) हे सूर्य और चन्द्रमा [के समान नियमवाले पुरुष !] (यथा) जैसे (अयम्) यह (वाहः) लट्टू पशु [घोड़ा बैल आदि] (समैति) मिलकर आता है (च) और (सम्) ठीक-ठीक (वर्तते) वर्तता है। (एव) वैसे ही [हे जीव !] (माम् अभि) मेरी ओर (ते मनः) तेरा मन (समैतु) मिल कर आवे (च) और (सम् वर्तताम्) ठीक-ठीक वर्ताव करे ॥१॥

    भावार्थ -

    जैसे मनुष्य पशु आदि को शिक्षा देकर सुमार्ग पर चलाता है, वैसे ही जितेन्द्रिय पुरुष मन को वश में करके शुभ मार्ग में अपने को चलावे ॥१॥

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