अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 104/ मन्त्र 2
ऋषिः - प्रशोचन
देवता - इन्द्राग्नी
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
46
इ॒दमा॒दान॑मकरं॒ तप॒सेन्द्रे॑ण॒ संशि॑तम्। अ॒मित्रा॒ येऽत्र॑ नः॒ सन्ति॒ तान॑ग्न॒ आ द्या॒ त्वम् ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒दम् । आ॒ऽदान॑म् । अ॒क॒र॒म् । तप॑सा । इन्द्रे॑ण । सम्ऽशि॑तम् । अ॒मित्रा॑: । ये । अत्र॑ । न॒: । सन्ति॑ । तान् । अ॒ग्ने॒ । आ । द्य॒ । त्वम् ॥१०४.२॥
स्वर रहित मन्त्र
इदमादानमकरं तपसेन्द्रेण संशितम्। अमित्रा येऽत्र नः सन्ति तानग्न आ द्या त्वम् ॥
स्वर रहित पद पाठइदम् । आऽदानम् । अकरम् । तपसा । इन्द्रेण । सम्ऽशितम् । अमित्रा: । ये । अत्र । न: । सन्ति । तान् । अग्ने । आ । द्य । त्वम् ॥१०४.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
शत्रुओं के हराने का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्रेण) बड़े ऐश्वर्यवाले आचार्य करके (संशितम्) तीक्ष्ण किया गया (इदम्) यह (आदानम्) आकर्षण यन्त्र (तपसा) तप से (अकरम्) मैंने बनाया है। (अत्र) यहाँ पर (नः) हमारे (ये) जो (अमित्राः) शत्रु (सन्ति) हैं, (तान्) उनको (अग्ने) हे तेजस्वी राजन् ! (त्वम्) तू (आ द्य) बाँध ले ॥२॥
भावार्थ
बड़े-बड़े विद्वानों की सम्मति से सेनापति लोग अस्त्र-शस्त्र बना कर शत्रुओं को वश में करें ॥२॥
टिप्पणी
२−(इदम्) निर्दिष्टम् (आदानम्) आकर्षणपाशम् (अकरम्) अकार्यम् (तपसा) तपोबलेन (इन्द्रेण) ऐश्वर्यवता गुरुणा (संशितम्) सम्यक् तीक्ष्णीकृतम् (अमित्राः) शत्रवः (ये) (अत्र) अस्मिन् संग्रामे (नः) अस्माकम् (सन्ति) वर्तन्ते (तान्) शत्रून् (अग्ने) हे तेजस्विन् राजन् (आ द्य) बधान। पाशयन्त्रेण गृहाण (त्वम्) ॥
विषय
पाया 'तपसा इन्द्रेण संशितम्'
पदार्थ
१. (इन्द्रेण) = जितेन्द्रिय पुरुष के द्वारा (तपसा) = तप से (संशितम्) = तीक्ष्ण किये हुए (इदम्) = इस (आदानम्) = शत्रुओं के बन्धन-पाश को (अकरम्) = किया है-जितेन्द्रिय व तपस्वी बनकर मैंने शत्रुबन्धन पाश बनाया है। हे (अग्ने) = परमात्मन्! (अत्र) = इस जीवन में (ये) = जो (न:) = हमारे (अमित्रा:) = शत्र सन्ति हैं, (तान्) = उन्हें (त्वम्) = आप (आ द्या) = बन्धन में डालो। आपके अनुग्रह से हमारे सब शत्रु हमारे द्वारा बद्ध किये जाएँ।
भावार्थ
प्रभु के अनुग्रह से जितेन्द्रिय व तपस्वी बनकर हम सब शत्रुओं को बाँधनेवाले बनें। हम काम-क्रोधादि को वश में कर सकें।
भाषार्थ
(इदम्) इस (आदानम्) आदान-पाश अर्थात् शत्रु को पकड़ने के साधन का प्रयोग (अकरम्) मैं सेनाध्यक्ष ने किया है, जो कि (इन्द्रेण) सम्राट् ने (तपसा) तप के द्वारा (संशितम्) निर्मित किया है। (अत्र) इस संग्राम में (ये) जो (नः) हमारे (अमित्राः) शत्रु (सन्ति) हैं (तान्) उन्हें (अग्ने) वे अग्रणी प्रधानमन्त्रिन् ! (त्वम्) तू (आ दध) बन्द१-दण्ड दे।
टिप्पणी
[यह आदान-पाश है जाल। यथा, अथर्व ८।८।५।८,१२; १०।१।३०)। तपसा= परिश्रमेण]। [१. जेल में बन्द करने का दण्ड]
विषय
शत्रुओं का पराजय और बन्धन।
भावार्थ
(तपसा) ताप द्वारा (इन्द्रेण सं शितम्) और इन्द्र = विद्युत् द्वारा अत्यन्त तीक्ष्ण (इदम्) यह ऐसा (आदानम्) बन्धनपाश मैं शिल्पी (अकरम्) बनाऊँ कि जिससे (अत्र) यहां इस युद्धभूमि में (ये नः अमित्राः) जो हमारे शत्रु हैं, हे (अग्ने) सेनापति ! (तान्) उनको (त्वम् आ द्य) तू उस पाश से बांध ले।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रशोचन ऋषिः। इन्द्राग्नी उत बहवो देवताः। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Conquest of Enemies
Meaning
I have created and invented the arms and strategy of taking over, which has been further refined and sophisticated by the relentless work of Indra, the designer strategist. O Agni, commander of the forces, all those enemies of ours that are here around, round up and bind them all.
Translation
I have made this fetter, sharpened by the resplendent army-chief, with much zeal. O adorable king, may you fetter our enemies, who are here.
Translation
I, the maker of arm make this binding fetter sharpened by electricity. Bind securely O Commander! those our enemies who are standing in the battle-field.
Translation
This bond, made keen by the Acharya, I have formed with heat of holy zeal. Securely bind our enemies, O Commander of the army, who are standing here on the battlefield!
Footnote
Acharya: Guru, teacher, preceptor. I: A veteran warrior.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(इदम्) निर्दिष्टम् (आदानम्) आकर्षणपाशम् (अकरम्) अकार्यम् (तपसा) तपोबलेन (इन्द्रेण) ऐश्वर्यवता गुरुणा (संशितम्) सम्यक् तीक्ष्णीकृतम् (अमित्राः) शत्रवः (ये) (अत्र) अस्मिन् संग्रामे (नः) अस्माकम् (सन्ति) वर्तन्ते (तान्) शत्रून् (अग्ने) हे तेजस्विन् राजन् (आ द्य) बधान। पाशयन्त्रेण गृहाण (त्वम्) ॥
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