अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 114/ मन्त्र 1
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - विश्वे देवाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - उन्मोचन सूक्त
97
यद्दे॑वा देव॒हेड॑नं॒ देवा॑सश्चकृमा व॒यम्। आदि॑त्या॒स्तस्मा॑न्नो यू॒यमृ॒तस्य॒र्तेन॑ मुञ्चत ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । दे॒वा॒: । दे॒व॒ऽहेड॑नम् ।देवा॑स: । च॒कृ॒म: । व॒यम् । आदि॑त्या: । तस्मा॑त् । न॒: । यू॒यम् । ऋ॒तस्य॑ । ऋ॒तेन॑ । मु॒ञ्च॒त॒ ॥११४.१॥
स्वर रहित मन्त्र
यद्देवा देवहेडनं देवासश्चकृमा वयम्। आदित्यास्तस्मान्नो यूयमृतस्यर्तेन मुञ्चत ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । देवा: । देवऽहेडनम् ।देवास: । चकृम: । वयम् । आदित्या: । तस्मात् । न: । यूयम् । ऋतस्य । ऋतेन । मुञ्चत ॥११४.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पाप से मुक्ति का उपदेश।
पदार्थ
(देवाः) हे विद्वानो ! (देवासः) खेल करते हुए (वयम्) हम लोगों ने (यत्) जो (देवहेडनम्) विद्वानों का अनादर (चकृम) किया है। (आदित्याः) सूर्यसमान तेजस्वी ! (यूयम्) तुम लोग (तस्मात्) उस [पाप] से (नः) हमको (ऋतस्य) धर्म के (ऋतेन) सत्य व्यवहार द्वारा (मुञ्चत) छुड़ाओ ॥१॥
भावार्थ
यदि मनुष्यों से प्रमाद के कारण विद्वानों का अनादर हो जाये तो उनको योग्य है कि वे धार्मिक व्यवहार करके विद्वानों को प्रसन्न करें ॥१॥
टिप्पणी
१−(यत्) (देवाः) हे विद्वांसः (देवहेडनम्) हेडृ अनादरे−ल्युट्। विदुषामनादरम् (देवासः) देवाः क्रीडकाः (चकृम) कृतवन्तः (वयम्) मनुष्याः (आदित्याः) अ० १।९।१। सूर्यवत्तेजस्विनः (तस्मात्) पापात् (यूयम्) (ऋतस्य) धर्मस्य (ऋतेन) सत्यव्यवहारेण ॥
विषय
ऋतस्य ऋतेन
पदार्थ
१. हे (देवा:) = माता, पिता, आचार्य आदि देवो! (यत् देवहेडनम्) = देवों के निरादररूप जिस पाप को (देवास:) = [देवास: देवनशीला इन्द्रियपरवशाः सन्त:-सा०] व्यर्थ की क्रीड़ा में फंसे हुए इन्द्रियों के परवश (वयम्) = हम लोग (चकृम) = कर बैठते हैं। इन्द्रिय परवशता में पाप हो ही जाता है, उस समय देवों के प्रति अपने कर्तव्यों को हम नहीं कर पाते । २. हे (आदित्या:) = अदिति के पुत्रो! स्वस्थ ज्ञानी पुरुषो! (यूयम्) = आप (तस्मात्) = उस पाप से (ऋतस्य ऋतेन) = यज्ञ-सम्बन्धी सत्य के द्वारा [ऋतम्-यज्ञ, सत्य] (न मुञ्चत) = हमें छुड़ाओ। हम यज्ञ-सम्बन्धी सत्य कर्मों को करते हुए 'देवहेडन' की वृत्ति से मुक्त हों।
भावार्थ
इन्द्रिय परवशता से मनुष्य पाप कर बैठता है। स्वस्थ ज्ञानी पुरुष यज्ञ-सम्बन्धी सत्य-कर्मों में प्रवृत्त करके मनुष्यों को उस पाप से मुक्त करें।
भाषार्थ
(देवा:) हे विद्वानों ! (देवासः वयम्) हम विद्वानों ने (यत्) जो (देवहेडनम्) परस्पर देवों, अर्थात् विद्वानों का अनादर (चकृम) किया है, या हम करते हैं, (आदित्या:) हे आदित्य कोटि के विद्वानों! (यूयम्) तुम (नः) हमें (तस्मात्) उस अनादर कर्म से (ऋतस्य ऋतेन) सत्य अर्थात् सदा सत्ता वाले वेद के सत्य ज्ञान द्वारा (मुञ्चत) मुक्त करो, छुड़ाओ।
टिप्पणी
[देवाः = विद्वांसः। हेडनम्= अनादर; हेडृ अनादरे (भ्वादिः)। ऋतस्य= ऋतम् सत्यनाम (निघं० ३।१०)। मन्त्ररूप वेद सत्य है, सदा सत्तावान् है, नित्य है। उस द्वारा प्रतिपादित ज्ञान भी सत्य है, यथार्थ है, अत्य नहीं। "ऋतम् सत्यं परं ब्रह्म तत्सम्बन्धिना प्रणवादिरूपेण मन्त्रेण साधनेन नः अस्मान् मुञ्चत वियौजयत" (सायण)। आदित्या =आदित्य कोटि के ब्रह्मचारी चारों वेदों के विद्वान् होते, तथा सदाचार के विज्ञ और स्वयम् सदाचारी होते हैं, अतः विद्वानों ने उन से प्रार्थना की है।]
विषय
पाप त्याग और मुक्ति का उपाय।
भावार्थ
पाप त्याग करने का प्रकार बतलाते हैं—हे (देवाः) विद्वान् पुरुषो ! (वयम्) हम (देवासः) देव, स्वतः विद्वान्, इन्द्रिय क्रीड़ा के व्यसनी होकर भी (यद्) जो (देव-हेडनं) देव, विद्वानों के अनादर और क्रोधजनक कार्य (चकृम) करें तो (हे आदित्या:) सूर्य के समान तेजस्वी या पापात्माओं को पकड़ने वाले पुरुषो ! (तस्मात्) उस पाप से (यूयम्) आप लोग (नः) हमें (ऋतस्य) सत्यमय ईश्वर के (ऋतेन) सत्यज्ञान, वेद-व्यवस्था न्याय के अनुसार (मुञ्चत) मुक्त करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। विश्वे देवा देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Redemption by Yajna
Meaning
O noble sages and scholars of divinity, whatever offence we might have committed against the divinities of nature and humanity, even though we are ourselves dedicated and enlightened, may you, brilliant sages of top Aditya order, redeem us from that by our yajnic performance according to the laws of Dharma.
Subject
Visvedevah
Translation
O enlightened ones, whatever disregard we, being ourselves enlightened, have shown to you, from that, O old sages (adityas), may you absolve us with the eternal law of the sacrifice.
Translation
Whatever disrespectful act we, the learned men and enlightened persons may commit against the enlightened persons. Keep away from us, you, O men of Continence and wisdom by the truth of law eternal.
Translation
O learned persons, whatever wrong, we learned people have committed to disgrace the learned and provoke their wrath; may ye O persons brilliant like the Sun, deliver us from that sin, through the knowledge of the Vedas, the word of God!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१−(यत्) (देवाः) हे विद्वांसः (देवहेडनम्) हेडृ अनादरे−ल्युट्। विदुषामनादरम् (देवासः) देवाः क्रीडकाः (चकृम) कृतवन्तः (वयम्) मनुष्याः (आदित्याः) अ० १।९।१। सूर्यवत्तेजस्विनः (तस्मात्) पापात् (यूयम्) (ऋतस्य) धर्मस्य (ऋतेन) सत्यव्यवहारेण ॥
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