अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 142/ मन्त्र 2
ऋषिः - विश्वामित्र
देवता - वायुः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - अन्नसमृद्धि सूक्त
56
आ॑शृ॒ण्वन्तं॒ यवं॑ दे॒वं यत्र॑ त्वाच्छा॒वदा॑मसि। तदुच्छ्र॑यस्व॒ द्यौरि॑व समु॒द्र इ॑वै॒ध्यक्षि॑तः ॥
स्वर सहित पद पाठआ॒ऽशृ॒ण्वन्त॑म् । यव॑म् । दे॒वम् । यत्र॑ । त्वा॒ । अ॒च्छ॒ऽआ॒वदा॑मसि । तत् । उत् । श्र॒य॒स्व॒ । द्यौ:ऽइ॑व । स॒मु॒द्र:ऽइ॑व । ए॒धि॒ । अक्षि॑त: ॥१४२.२॥
स्वर रहित मन्त्र
आशृण्वन्तं यवं देवं यत्र त्वाच्छावदामसि। तदुच्छ्रयस्व द्यौरिव समुद्र इवैध्यक्षितः ॥
स्वर रहित पद पाठआऽशृण्वन्तम् । यवम् । देवम् । यत्र । त्वा । अच्छऽआवदामसि । तत् । उत् । श्रयस्व । द्यौ:ऽइव । समुद्र:ऽइव । एधि । अक्षित: ॥१४२.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अन्न की वृद्धि का उपदेश।
पदार्थ
(आशृण्वन्तम्) [हमें] अङ्गीकार करनेवाले (त्वा) तुझ (देवम्) दिव्यगुणवाले (यवम्) जौ आदि अन्न को (यत्र) जहाँ पर (अच्छावदामसि) हम अच्छे प्रकार चाहें, (तत्) वहाँ पर (द्यौः इव) सूर्य के समान (उत् श्रयस्व) ऊँचा आश्रय ले और (समुद्रः इव) अन्तरिक्ष के समान (अक्षितः) क्षयरहित (एधि) हो ॥२॥
भावार्थ
जहाँ पर किसान लोग खेती की अच्छे प्रकार देख-भाल करते हैं, वहाँ जौ अन्न के वृक्ष ऊँचे होते और उपज में अच्छी बढ़ती होती है ॥२॥
टिप्पणी
२−(आशृण्वन्तम्) आङ्+श्रु अङ्गीकारे। अङ्गीकुर्वन्तम् (यवम्) (देवम्) दिव्यगुणम् (यत्र) यस्यां भूमौ (त्वा) (अच्छ−आवदामसि) आभिमुख्येन वदामः प्रार्थयामहे (तत्) तत्र भूम्याम् (उच्छ्रयस्व) (द्यौः इव) प्रकाशमानः सूर्यो यथा (समुद्रः इव) अन्तरिक्षं यथा (एधि) भव (अक्षितः) क्षयरहितः ॥
विषय
समुद्र के समान अक्षीण
पदार्थ
१. यह 'यव' देव हमारी प्रार्थना को सुनता है। (आशृण्वन्तम्) = हमारी प्रार्थना को सुनते हुए (यवं देवम्) = इस 'यव' देव को (यत्र त्वा अच्छ आवदामसि) = जिस भूमि पर तुझे लक्ष्य करके प्रार्थना करते हैं कि (तत्) = वह तू (द्यौ इव उच्छ्य स्व) = आकाश की भाँति उन्नत हो, समस्यावस्था में खूब फूल-फलवाला और फलावस्था में (समुद्रइव अक्षितः एधि) = समुद्र के समान क्षयरहित हो।
भावार्थ
ये देवयव-दिव्य गुणयुक्त जी-रोगों को पराजित करनेवाले जौ-क्षेत्रों में खुब उन्नत हों-आकाश में खूब ऊपर उठे और इनका फल समुद्र के समान अक्षीण हो।
भाषार्थ
(आशृण्वन्तम्) सब की वार्ताओं को सुनते हुए, जिस (यवम्) मिश्रण तथा अमिश्रण करने वाले, (यत्र) जिस किसी हृदय में प्रकट होने वाले, (त्वा देवम्) तुझ देव को (अच्छा वदामसि) अभिमुख होकर हम कहते हैं कि (तत्= तत्र) वहां अर्थात् हृदय में (उत् श्रयस्व) उत्कृष्टरूप में तू हमारा आश्रय बन। (द्यौः१ इव) द्युलोक की तरह, (अक्षितः) अक्षीण प्रकाश वाला हुआ (एधि) तू हो, तथा (समुद्रः इव) समुद्र की तरह (अक्षितः) अक्षीण सम्पत्ति वाला हो।
टिप्पणी
[परमेश्वर सब की वार्ताओं को सुनता है, यथा "द्वौ निषद्य यम्मन्त्रयेते राजा तद् वेद वरुणस्तृतीयः" (अथर्व० ४।१६।३) अर्थात् दो बैठकर जो मन्त्रणा करते हैं राजा वरुण उसे जानता है तीसरा हो कर। तथा "पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ःण" (उपनिषद्)। द्यौः प्रकाश की दृष्टि से अक्षीण है, और समुद्र जल की दृष्टि से अक्षीण है। परमेश्वर निज प्रकाश और सब सम्पतियों की दृष्टि से अक्षीण है।] [(१) जैसे प्रकाश की दृष्टि से अक्षीण है, वैसे हे परमेश्वर तू हमारे हृदयों में अक्षीण प्रकाशमान हो।]
विषय
सन्तान के प्रति उपदेश।
भावार्थ
(आ शृण्वन्तम्) माता पिता तथा आचार्य आदि की आज्ञाओं को सुनने वाले, (यवम्) जौ आदि ओषधियों की न्याईं बढ़ने तथा फलने फूलने वाले (देवम्) तुझ क्रीड़ाशील तथा दिव्य गुणों वाली सन्तान को (अच्छा-आवदामसि) हम उत्तम प्रकार से उपदेश देते हैं, (तद्) तो तू (द्यौरिव) द्युलोक की भांति (उच्छ्रयस्व) ऊंचे उठ, और (समुद्रः इव) समुद्र की न्याई (अक्षितः एधि) अक्षय बन।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः। वायुर्देवता। अनुष्टुभः। तृचं सुक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Growth of Food
Meaning
O yava, O food, where we praise and exalt you as divine, there listening and sustaining us, grow and rise like the light of heaven, expand and roll like the ocean, unbounded, unviolated.
Translation
Where we praise you, the divine barley, that listens to us, there may you grow up just like heaven, like the ocean, may you be inexhaustible.
Translation
Let this barley crop which is a good eatable cooked nicely responsive to cooking Process grow up there we find soil of which we speak highly. Let it spring up like the sun and be inexhaustible like ocean or space.
Translation
As we invite and call to thee, O nutritious barley, that heareth us, so raise thyself up like heaven on high, and be exhaustless like the sea!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(आशृण्वन्तम्) आङ्+श्रु अङ्गीकारे। अङ्गीकुर्वन्तम् (यवम्) (देवम्) दिव्यगुणम् (यत्र) यस्यां भूमौ (त्वा) (अच्छ−आवदामसि) आभिमुख्येन वदामः प्रार्थयामहे (तत्) तत्र भूम्याम् (उच्छ्रयस्व) (द्यौः इव) प्रकाशमानः सूर्यो यथा (समुद्रः इव) अन्तरिक्षं यथा (एधि) भव (अक्षितः) क्षयरहितः ॥
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