अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 21 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 21/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शन्ताति देवता - चन्द्रमाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - केशवर्धनी ओषधि सूक्त
    पदार्थ -

    (इमाः) यह (याः) जो (तिस्रः) तीन [सूर्य, पृथिवी और अन्तरिक्ष] (पृथिवीः) विस्तृत लोक हैं, (तासाम्) उन में (ह) निश्चय करके (भूमिः) भूमि, सब का आधार परमेश्वर (उत्तमा) उत्तम है। (तासाम्) उन [लोकों] के (त्वचः अधि) विस्तार के ऊपर (भेषजम्) भयनाशक ब्रह्म को (उ) अवश्य (अहम्) मैंने (सम् जग्रभम्) यथावत् ग्रहण किया ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के रचे लोक-लोकान्तरों के सम्बन्ध और गुणों को जान कर परस्पर उपकार करें ॥१॥

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