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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - इन्द्रापूषणौ, अदितिः, मरुद्गणः, अपांनपात्, सिन्धुसमूहः, विष्णुः, द्यौः छन्दः - पथ्याबृहती सूक्तम् - आत्मगोपन सूक्त
    112

    पा॒तं न॑ इन्द्रापूष॒णादि॑तिः पान्तु म॒रुतः॑। अपां॑ नपात्सिन्धवः स॒प्त पा॑तन॒ पातु॑ नो॒ विष्णु॑रु॒त द्यौः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पा॒तम् । न॒: । इ॒न्द्रा॒पू॒ष॒णा॒ । अदि॑ति: । पान्तु॑ । म॒रुत॑: । अपा॑म् । न॒पा॒त् । सि॒न्ध॒व॒: । स॒प्त । पा॒त॒न॒ । पातु॑ । न॒: । विष्णु॑: । उ॒त। द्यौ: ॥३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पातं न इन्द्रापूषणादितिः पान्तु मरुतः। अपां नपात्सिन्धवः सप्त पातन पातु नो विष्णुरुत द्यौः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पातम् । न: । इन्द्रापूषणा । अदिति: । पान्तु । मरुत: । अपाम् । नपात् । सिन्धव: । सप्त । पातन । पातु । न: । विष्णु: । उत। द्यौ: ॥३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वृद्धि करने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्रापूषणा) हे बिजुली और वायु (नः) हमें (पातम्) बचाओ। (अदितिः) अदीन प्रकृति और (मरुतः) विद्वान् लोग (पान्तु) बचावें। (अपाम्) हे जीवों के (नपात्) न गिरानेवाले, अग्नि [शरीर बल] और (सप्त) हे नित्य सम्बन्धवाले वा सात (सिन्धवः) गतिशील [त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] (पातन) बचाओ (विष्णुः) सर्वव्यापक परमेश्वर (उत) और (द्यौ) प्रकाशमान बुद्धि (नः) हमें (पातु) बचावे ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर के उपकारों को विचारता हुआ बिजुली आदि पदार्थों से उपकार लेकर रक्षा करें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(पातम्) रक्षतम् (नः) अस्मान् (इन्द्रापूषणा) इन्द्रश्च पूषा च। देवताद्वन्द्वे च। पा० ६।३।२६। इति पूर्वपदस्य आनड्। हे विद्युद्वायू (अदितिः) अ० २।२८।४। अदीना प्रकृतिः (पान्तु) रक्षन्तु (मरुतः) अ० १।२०।१। ऋत्विजः−निघ–० ३।३८। विद्वांसः (अगम्) जीवानाम्−दयानन्दभाष्ये, य० १७।३०। (नपात्) अ० १।१३।२। न पातयिता। अग्निः। शारीरिकबलमित्यर्थः (सिन्धवः) अ० ४।३।१। स्यन्दनशीलाः। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी−निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धयः (सप्त) अ० ४।११।९। समवेताः। संख्यावाचको वा। (पातन) तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१।४५। इति मध्यमपुरुषस्य तशब्दस्य तन आदेशः। पात। रक्षत (पातु) रक्षतु (नः) अस्मान् (विष्णुः) अ० ३।२०।४। सर्वव्यापकः परमेश्वरः (उत) अपि च (द्यौः) प्रकाशमाना बुद्धिः ॥

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    विषय

    इन्द्रापूषणा, विष्णुः उत द्यौः

    पदार्थ

    १. (न:) = हमें (इन्द्रापूषणा पातम्) = इन्द्र और पूषा रक्षित करें। इन्द्र' जितेन्द्रिया का प्रतीक है और 'पूषा' का भाव है-अङ्ग-प्रत्यङ्ग का पोषण। हम जितेन्द्रिय बनकर सर्वाङ्ग सम्पुष्ट हों। (अदितिः मरुतः पान्तु) = अदिति और मरुत् हमारा रक्षण करें। 'अदिति' [अ-दिति] स्वास्थ्य की देवता है और 'मरुत्' प्राण हैं। हम प्राणसाधना करते हुए पूर्ण स्वस्थ होने का प्रयल करें। २. (अपां न पात्) = रेत:कणरूप जलों का न गिरने देनेवाला देव तथा (सप्त सिन्धवः) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सात ऋषियों से प्रवाहित होनेवाले सात ज्ञान-जलों के प्रवाह (पातन) = हमारा रक्षण करें। वीर्य-रक्षण द्वारा ज्ञानग्नि को दीत करके हम उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करें। (न:) = हमें (विष्णुः) = व्यापकता का देव (उत) = और (द्यौः) = प्रकाश (पातु) = रक्षित करें। हमारा हृदय विशाल हो और मस्तिष्करूप धुलोक ज्ञानसूर्य से दीप्त बने।

    भावार्थ

    हम जितेन्द्रिय बनकर सब अङ्गों की पुष्टि प्राप्त करें। हमारा हृदय विशाल हो और मस्तिष्क दीप्त।

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    भाषार्थ

    (इन्द्रापूषणा) विद्युत् और मेघ (न:) हमारी (पातम्) रक्षा करें, (अदितिः) पृथिवी और (मरुतः) मानसून वायुएं (पान्तु) रक्षा करें। (अपांनपात्) चमकती विद्युत् (सप्तसिन्धवः) सप्तविध नदियां (पातन) रक्षा करें, (विष्णुः) किरणों से व्याप्त सूर्य (उत) तथा ( द्यौः) द्युलोक (नः) हमारी (पातु) रक्षा करे ।

    टिप्पणी

    [सूक्त १ और २ में परमेश्वर का वर्णन हुआ है, और सूक्त २ में उसे "जेता और ईशान" कह कर समग्र ब्रह्माण्ड पर उसका प्रभुत्व दर्शाया है। अतः उसी से इन्द्र आदि द्वारा रक्षा की प्रार्थना की गई है। निरुक्त में इन्द्र को अन्तरिक्षस्थानी देवता माना है। अत: इन्द्र है विद्युत्। एतत्सम्बन्धी पूषा है पुष्टिकारक मेघ। मेघ वर्षा द्वारा जलप्रदान कर, और तद्-द्वारा अन्नत्पादन कर पुष्टि देता है। अदिति है पृथिवी, अदितिः पृथिवीनाम" (निघं० १।१)। पृथिवी अन्नप्रदान द्वारा रक्षा करती है। मरुतः हैं मानसून वायुएं। यथा 'उदीरयत मरुतः समुद्रात्" (अथर्व० ४।१५।५), "हे मरुतो ! तुम समुद्र से ऊपर की ओर गति करो"। तथा (अथर्व० ४।२७।४,५)। अपांनपात् =यह है मेघ में चमकती तथा गर्जतो विद्युत्। जल से मेघोत्पत्ति, मेघ से इस विद्युत् की उत्पत्ति। अतः यह विद्युत् अपांनपात् है। नपात्= पोती। विष्णुः =सूर्य (निरक्त १२।२।१८। पद १२)। इस प्रकार इन्द्र आदि का सम्बन्ध वर्षा के साथ है, मन्त्र में परमेश्वर से वर्षा के साधनों द्वारा रक्षा की प्रार्थना हुई है]। [विशेषः इन्द्र और अपांनपात् दोनों विद्युत् हैं। इन्द्र है अन्तरिक्ष व्यापिनी अनभिव्यक्तरूपा विद्युत्, और अपांनपात् है व्यक्तरूपा मेघीय विद्युत्।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prayer for Protection

    Meaning

    May Indra and Pusha, electric and wind energy of the world, protect us. May Aditi, inviolable Prakrti, protect us. May the Maruts, vibrant scholars and sages protect us. May the never exhausting waters and the seven seas protect us. May all pervasive Vishnu and the light of heaven protect us all.

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    Subject

    Indra- Pusan Pair

    Translation

    May the Lord resplendent and nourisher protect us; may the existence indivisible (earth - aditi) and the cloud-bearing winds (maruts) protect. May the grandson of waters (i.e., apam napat or fire) and seven rivers (sindhavah ) protect us. May the sacrifice (visu) and the sky protect us. (Yajno vai visnuh - visnu - yajna = sacrifice)

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    Translation

    May the powerful electricity and wind by the grace of God guard us, may the material cause of the universe, the matter and the various kinds of airs protect us, may the fire and seven kinds of water-currents guard us and may the sun and the heavenly light protect us.

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    Translation

    May lightning and air guard us. May Matter and the learned guard us. May physical strength that lets not the souls decay, guard us. May the seven ever active forces guard us. May God and intellect guard us.

    Footnote

    Seven forces: skin, eye, ear, tongue, nose, mind, knowledge.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(पातम्) रक्षतम् (नः) अस्मान् (इन्द्रापूषणा) इन्द्रश्च पूषा च। देवताद्वन्द्वे च। पा० ६।३।२६। इति पूर्वपदस्य आनड्। हे विद्युद्वायू (अदितिः) अ० २।२८।४। अदीना प्रकृतिः (पान्तु) रक्षन्तु (मरुतः) अ० १।२०।१। ऋत्विजः−निघ–० ३।३८। विद्वांसः (अगम्) जीवानाम्−दयानन्दभाष्ये, य० १७।३०। (नपात्) अ० १।१३।२। न पातयिता। अग्निः। शारीरिकबलमित्यर्थः (सिन्धवः) अ० ४।३।१। स्यन्दनशीलाः। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी−निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धयः (सप्त) अ० ४।११।९। समवेताः। संख्यावाचको वा। (पातन) तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१।४५। इति मध्यमपुरुषस्य तशब्दस्य तन आदेशः। पात। रक्षत (पातु) रक्षतु (नः) अस्मान् (विष्णुः) अ० ३।२०।४। सर्वव्यापकः परमेश्वरः (उत) अपि च (द्यौः) प्रकाशमाना बुद्धिः ॥

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