अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 56 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 56/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शन्ताति देवता - विश्वे देवाः छन्दः - उष्णिग्गर्भा पथ्यापङ्क्तिः सूक्तम् - सर्परक्षण सूक्त
    पदार्थ -

    (देवाः) हे विद्वानो ! (सतोकान्) सन्तानों सहित और (सहपूरुषान्) पुरुषों सहित (नः) हमको (अहिः) चोट देनेवाला सर्प [सर्प तुल्य अपना दोष] (मा वधीत्) न काटे। वह (संयतम्) मुँदे हुए मुख को (न)(वि स्परत्) खोले और (व्यात्तम्) खुले मुख को (न)(सम् यमत्) मूँदे। (देवजनेभ्यः) विद्वान् जनों को (नमः) नमस्कार है ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य विद्वान् महात्माओं से शिक्षा पाकर अपने और अपने सन्तानों और बान्धव भृत्य आदि पुरुषों के दोषों को इस प्रकार निर्बल करदें जैसे दुष्ट सर्प को मार-मार कर निर्बल कर देते हैं ॥१॥

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