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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 62 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 62/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - रुद्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पावमान सूक्त
    111

    वै॑श्वान॒रो र॒श्मिभि॑र्नः पुनातु॒ वातः॑ प्रा॒णेने॑षि॒रो नभो॑भिः। द्यावा॑पृथि॒वी पय॑सा॒ पय॑स्वती ऋ॒ताव॑री यज्ञिये नः पुनीताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वै॒श्वा॒न॒र: । र॒श्मिऽभि:॑ । न॒: । पु॒ना॒तु॒ । वात॑: । प्रा॒णेन॑ । इ॒षि॒र: । नभ॑:ऽभि: । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । पय॑सा । पय॑स्वती॒ इति॑ । ऋ॒तव॑री॒ इत्यृ॒तऽव॑री । य॒ज्ञिये॒ इति॑ । न॒: । पु॒नी॒ता॒म् ॥६२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वैश्वानरो रश्मिभिर्नः पुनातु वातः प्राणेनेषिरो नभोभिः। द्यावापृथिवी पयसा पयस्वती ऋतावरी यज्ञिये नः पुनीताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वैश्वानर: । रश्मिऽभि: । न: । पुनातु । वात: । प्राणेन । इषिर: । नभ:ऽभि: । द्यावापृथिवी इति । पयसा । पयस्वती इति । ऋतवरी इत्यृतऽवरी । यज्ञिये इति । न: । पुनीताम् ॥६२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 62; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    धन और नीरोगता का उपदेश।

    पदार्थ

    (वैश्वानरः) सब नरों का हितकारी परमेश्वर (रश्मिभिः) विद्याप्रकाशों से और (इषिरः) शीघ्रगामी (वातः) पवन (प्राणेन) प्राण से और (नभोभिः) मेघों से (नः) हमें (पुनातु) पवित्र करे। (पयस्वती) रसवाली (ऋतावरी) सत्यशील और (यज्ञिये) संगति करने योग्य (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी लोक (पयसा) अपने रस से (नः) हमें (पुनीताम्) शुद्ध करें ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य विज्ञानपूर्वक सूर्य, वायु, मेघ, पृथिवी, आदि पदार्थों से शिल्प आदि और शरीररक्षण आदि में उपकार लेकर सुखी हों ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(वैश्वानरः) सर्वनरहितः परमेश्वरः (रश्मिभिः) विद्याप्रकाशैः (नः) अस्मान् (पुनातु) शोधयतु (वातः) वायुः (प्राणेन) श्वासप्रश्वासव्यापारेण (इषिरः) अ० ५।१।९। गमनशीलः (नभोभिः) अ० ४।१५।३। मेघैः (द्यावापृथिवी) सूर्यभूलोकौ (पयसा) रसेन (पयस्वती) रसवत्यौ (ऋतावरी) अ० ३।१३।७। सत्ययुक्ते (यज्ञिये) संगतिकरणयोग्ये (नः) (पुनीताम्) शोधयताम् ॥

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    विषय

    _ 'सूर्य, वायु, मेष, द्यावापृथिवी' द्वारा पवित्रता

    पदार्थ

    १. (वैश्वानरः) = सब प्राणियों का हित करनेवाला सूर्य (रश्मिभिः) = अपनी किरणों से (नः पुनातु) = हमें पवित्र करे। (वात:) = देहमध्य में विचरण करता हुआ वायु (प्राणेन) = श्वासोच्छवासादिरूप से हमें पवित्र करें। (इषिर:) = यह गमनशील-अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाला वायु (नभोभिः) अन्तरिक्ष-प्रदेशस्थ मेघों से हमें पवित्र करे। २. (द्यावापृथिवी) = धुलोक व पृथिवीलोक (न:) = हमें (पुनीताम्) = पवित्र करें। जो द्यावापृथिवी (पयसा पयस्वती) = सारभूत रस से सारवाले हैं, (ऋतावरी) = उदकवाले हैं और (यज्ञिये) = यज्ञों के निष्पादन में समर्थ हैं, अथवा संगतिकरण योग्य हैं। हमें इन द्यावापृथिवी को मिलाकर ही चलना चाहिए। अपने जीवन में शरीर [पृथिवी] व मस्तिष्क [युलोक] दोनों का ही ध्यान रखना चाहिए।

     

    भावार्थ

    सूर्य, वायु, मेघ व द्यावापृथिवी-सभी हमें पवित्र करनेवाले हों।

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    भाषार्थ

    (वैश्वानरः) सब नर-नारियों का हितकारी सूर्य (रश्मिभिः) रश्मियों द्वारा (नः) हमें (पुनातु) पवित्र करे; (वातः) वायु (प्राणेन) प्राण द्वारा, श्वासोच्छ्वास द्वारा; (इषिर:) और वेगवान् मानसून वायु (नभोभिः) मेघों द्वारा पवित्र करे। (पयस्वती) जलवाली, (ऋतावरी) सत्यनियमों वाली, (यज्ञिये) यज्ञों में साधनरूप (द्यावापृथिवी) द्यौ और पृथिवी (पयसा) जल द्वारा (नः) हमें (पुनीताम्) पवित्र करें ।

    टिप्पणी

    [वैश्वानरः = अथासावादित्यः इति पूर्वे याज्ञिकाः (निरुक्त ७।६।२३)। इषिरः= इष् गतौ (दिवादिः)+ किरच् (उणा० १।५१)। नभोभि:= नभस् (cloud, आप्टे)। ऋतावरी = ऋतम् नियमः, तद्वत्यौ। द्यौ और पृथिवी परमेश्वरीय नियमों द्वारा नियन्त्रित हैं। यज्ञिये= ये दोनों यज्ञ सम्पादन में सहायक हो कर वर्षा द्वारा, पयस् प्रदान करती हैं]।

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    विषय

    आभ्यन्तर शुद्धि का उपदेश।

    भावार्थ

    (वैश्वानरः) वैश्वानर, सूर्य और अग्नि (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (नः) हमें (पुनातु) पवित्र करे। और (वातः प्राणेन) वात, वायु और प्राण क्रिया द्वारा हमारे शरीर को पवित्र करे। और (इषिरः) सबका प्रेरक वायु अपने (नभोमिः) अन्तरिक्ष प्रदेशस्थ वायुगत मेघों द्वारा हमें पवित्र करें। और (ऋतावरीः) जल से पूर्ण (पयस्वतीः) पुष्टिकारक रस से पूर्ण (द्यावापृथिवी) द्यौ और पृथिवी, आस्मान और जमीन दोनों (यज्ञिये) यज्ञ = दान क्रिया में या परस्पर संगत होकर उपकार करने में समर्थ होकर (नः) हमें (पुनीतम्) पवित्र करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। रुद्र उत मन्त्रोक्ता देवता। त्रिष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Purity

    Meaning

    May Vaishvanara, universal lord of humanity, the sun and the cosmic heat of vitality, benefactor of humanity, purify us with the rays of light and divine knowledge. May the winds inspiring with pranic energy and the cool of clouds purify and rejuvenate us. May adorable heaven and earth dedicated to the truth of cosmic law and overflowing with nutriments of living energy rejuvenate and purify us.

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    Subject

    Vaisvanara etc, (Cosmic man)

    Translation

    May the fire, benefactor of all men, purify us with his rays; may the wind quickened with clouds (purify us) with breath. May the heaven and earth, rich in water, righteous and engaged in selfless actions, purify us.

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    Translation

    Let the sun cleanse us with its rays, let the quickening air cleanse us with breath and clouds, let the heaven and earth which are wet with dews, moistened with vapors and full of rains cleanse us with water.

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    Translation

    Let Sun purify us with its rays of splendor. Let quickening air cleanse us with breath and clouds. Let Earth and Heaven, rich in milky rain, worshipful, holy, purify us with their water.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(वैश्वानरः) सर्वनरहितः परमेश्वरः (रश्मिभिः) विद्याप्रकाशैः (नः) अस्मान् (पुनातु) शोधयतु (वातः) वायुः (प्राणेन) श्वासप्रश्वासव्यापारेण (इषिरः) अ० ५।१।९। गमनशीलः (नभोभिः) अ० ४।१५।३। मेघैः (द्यावापृथिवी) सूर्यभूलोकौ (पयसा) रसेन (पयस्वती) रसवत्यौ (ऋतावरी) अ० ३।१३।७। सत्ययुक्ते (यज्ञिये) संगतिकरणयोग्ये (नः) (पुनीताम्) शोधयताम् ॥

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