Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 73 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - वास्तोष्पतिः छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
    55

    इ॒हैव स्त॒ माप॑ या॒ताध्य॒स्मत्पू॒षा प॒रस्ता॒दप॑थं वः कृणोतु। वास्तो॒ष्पति॒रनु॑ वो जोहवीतु॒ मयि॑ सजाता र॒मति॑र्वो अस्तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒ह । ए॒व । स्त॒ । मा । अप॑ । या॒त॒ । अधि॑ । अ॒स्मत् । पू॒षा । प॒रस्ता॑त् । अप॑थम् । व॒: । कृ॒णो॒तु॒ । वास्तो॑: । पति॑: । अनु॑ । व॒: । जो॒ह॒वी॒तु॒ । मयि॑ । स॒ऽजा॒ता॒: । र॒मति॑: । व॒: । अ॒स्तु॒ ॥७३.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इहैव स्त माप याताध्यस्मत्पूषा परस्तादपथं वः कृणोतु। वास्तोष्पतिरनु वो जोहवीतु मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इह । एव । स्त । मा । अप । यात । अधि । अस्मत् । पूषा । परस्तात् । अपथम् । व: । कृणोतु । वास्तो: । पति: । अनु । व: । जोहवीतु । मयि । सऽजाता: । रमति: । व: । अस्तु ॥७३.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 73; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    विद्वानों से समागम का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे विद्वानो !] (इह) यहाँ पर (एव) ही (स्त) रहो (अस्मत् अधि) हम से (मा अप यात) हट कर न जाओ, (पूषा) पोषण करनेवाला गृहस्थ (परस्तात्) उत्तर-उत्तर काल में (वः) तुम्हारे लिये (अपथम्) अभय (कृणोतु) करे। (वास्तोः) घर का (पतिः) स्वामी [गृहस्थ] (वः) तुमको (अनु) निरन्तर (जोहवीतु) बुलाता रहे। (सजाताः) हे समान जन्मवाले बान्धवो ! (वः) तुम्हारे (रमतिः) क्रीड़ा [प्रसन्नता] (मयि) मुझ में (अस्तु) होवे ॥३॥

    भावार्थ

    जो धार्मिक गृहस्थ विद्वानों को अभय ज्ञान दान करके आदरपूर्वक गुणग्रहण करते हैं, वे संसार में आनन्द भोगते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(इह) अस्मिन् समाजे (एव) निश्चयेन (स्त) वर्त्तध्वम् (मा अपयात) दूरे मा गच्छत (अधि) पञ्चम्यर्थानुवादी (अस्मत्) अस्मत्तः (पूषा) पोषको गृहस्थः (परस्तात्) अ० ४।१६।४। पर−अस्ताति। परस्मिन् पश्चात्काले (अपथम्) अपथम्। थुड संवरणे−ड। थं भयम्। अपगतं च तत् थं च तत्। अभयम् (वः) युष्मभ्यम् (कृणोतु) करोतुं (वास्तोः) वसेरगारे णिच्च। उ० १।७०। इति वस निवासे तुन् स च णित्। वास्तुर्वसतेर्निवासकर्मणः−निरु० १२।१६। गृहस्य (पतिः) स्वामी (अनु) अनन्तरम् (वः) युष्मान् (जोहवीतु) अ० –२।१२।३। ह्वयतेर्यङ्लुकि लोट्। पुनः पुनराह्वयतु। अन्यत् पूर्ववत्−म० २ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    आचार्य-सान्निध्य

    पदार्थ

    १. हे विद्यार्थी ! (इह एव स्त) = यहाँ आचार्यकुल में ही रहो। (अस्मत् अधि मा अपयात) = हमसे दर मत होओ। 'अन्त:वासी' को तो सदा आचार्य के समीप ही रहना है। आचार्य विद्यार्थी को वस्तुतः अपने गर्भ में धारण करता है। (पूषा) = वह पोषक प्रभु (परस्तात्) = हमसे दूर (व:) = तुम्हारे लिए (अपथं कृणोतु) = मार्ग का अभाव करे, अर्थात् प्रभु के अनुग्रह से हमसे दूर जाने के लिए तुम्हें मार्ग ही न मिले। २. (वास्तोष्यतिः) = गृहपालक देव (व:) = तुम्हें (अनुजोहवीतु) = अनुकूलता से पुकारे [आह्वयतु], अर्थात् जब तुम भिक्षा के लिए जाओ तो गृहपतियों को अच्छा ही प्रतीत हो। तुम्हारा शान्त स्वभाव उन्हें प्रिय लगे और वे प्रेम से तुम्हें भिक्षा दें। गृहस्थों को तुम असभ्य प्रतीत न होओ, और यहाँ (मयि) = मुझमें है (सजात:) = समान विकासवाले विद्यार्थियो! (वः) = तुम्हारा (रमति:) = रमण (अस्तु) = हो। तुम मिलकर प्रेम से अध्ययन करनेवाले बनो।

     

    भावार्थ

    विद्यार्थी आचार्य के समीप ही रहें-कभी उससे दूर न हों। गृहपति उन्हें प्रेम से भिक्षा दें। आचार्यकुल में विद्यार्थी प्रेमपूर्वक रहते हुए समानरूप से विकासवाले बनें।



     

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    [हे अभ्यागतो !] (इह एव) यहां ही [मेरे आतिथ्य में] (स्त) होओ रहो, (मा अपयात) हम से जुदा न होओ। (पूषा) अन्नादि द्वारा पोषक अधिकारी (परस्तात्) हम से परे जाने में (वः) तुम्हारा (अपथम्) मार्गरोध (कृणोतु) करे। (वास्तोष्पतिः) राजकीय गृहों का स्वामी (अनु) निरन्तर (वः) तुम्हारा (जोहवीतु) बार-बार आह्वान करता रहे (सजाताः) ताकि हे साम्राज्य में उत्पन्न हुए साम्राज्य के पुत्रों! (मयि) मुझ में (वः) तुम्हारी (रमति:) प्रेमासक्ति (अस्तु) हो, बनी रहे ।

    टिप्पणी

    [सम्राट् का भाषण है अभ्यागतों के प्रति, जो कि सम्राट् के दरबार में उपस्थित हुए हैं। सम्राट् कहता है कि साम्राज्य का पोषक-अधिकारी पोषकसामग्री द्वारा तुम्हारी इतनी सेवा करे कि वापिस जाने का तुम्हारा मार्ग और अधिक काल तक रुका रहे। तथा साम्राज्य का वास्तोष्पति तुम्हें पुनः-पुनः आने का आह्वान करता रहे, तुम्हें आमन्त्रित करता रहे। इस प्रकार तुम्हारी प्रेमासक्ति को मैं प्राप्त करता रहूं।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    United Humanity

    Meaning

    Be here, stay here together, go not away from us. Let Pusha, the spirit of life, sustenance and growth together, rule out separation from our united system and declare it out of bounds. Let the architect of the universal home of humanity keep you joined together and maintain the cohesive pressure from within with constant sense of urgency. O people of the world, all equal in brotherhood, let all your love, interests and ambitions be united and centred into me, heart of the Samrat Purusha.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Do stay here. Do not go away from us. May the nourisher Lord make your way, which leads away from us, unfit for travel. May the master of house-hold recall you again and again. O kinsmen, in me Jet your affection rest.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O Kinsmen! stay here in my kingdom, do not go away forsaking me, may not defensive unit give way anywhere else, let the unit of home department recall you frequently for your advice and let your pleasure and sympathy be in me.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O ministers, remain here forsake me not, otherwise I, the king shall make your path unfit to travel. May God incessantly recall you for my service. O Kinsmen, may ye be kind and loving unto me!

    Footnote

    Vastospati: Lord of habitations, i.e., God.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(इह) अस्मिन् समाजे (एव) निश्चयेन (स्त) वर्त्तध्वम् (मा अपयात) दूरे मा गच्छत (अधि) पञ्चम्यर्थानुवादी (अस्मत्) अस्मत्तः (पूषा) पोषको गृहस्थः (परस्तात्) अ० ४।१६।४। पर−अस्ताति। परस्मिन् पश्चात्काले (अपथम्) अपथम्। थुड संवरणे−ड। थं भयम्। अपगतं च तत् थं च तत्। अभयम् (वः) युष्मभ्यम् (कृणोतु) करोतुं (वास्तोः) वसेरगारे णिच्च। उ० १।७०। इति वस निवासे तुन् स च णित्। वास्तुर्वसतेर्निवासकर्मणः−निरु० १२।१६। गृहस्य (पतिः) स्वामी (अनु) अनन्तरम् (वः) युष्मान् (जोहवीतु) अ० –२।१२।३। ह्वयतेर्यङ्लुकि लोट्। पुनः पुनराह्वयतु। अन्यत् पूर्ववत्−म० २ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top