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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 75 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 75/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कबन्ध देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सपत्नक्षयण सूक्त
    47

    प॑र॒मां तं प॑रा॒वत॒मिन्द्रो॑ नुदतु वृत्र॒हा। यतो॒ न पुन॒राय॑ति शश्व॒तीभ्यः॒ समा॑भ्यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒र॒माम् । तम् । प॒रा॒ऽवत॑म् । इन्द्र॑: । नु॒द॒तु॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । यत॑: । न । पुन॑: । आ॒ऽअय॑ति । श॒श्व॒तीभ्य॑: । समा॑भ्य: ॥७५.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परमां तं परावतमिन्द्रो नुदतु वृत्रहा। यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परमाम् । तम् । पराऽवतम् । इन्द्र: । नुदतु । वृत्रऽहा । यत: । न । पुन: । आऽअयति । शश्वतीभ्य: । समाभ्य: ॥७५.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 75; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रु के हटाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (वृत्रहा) शत्रुओं वा अन्धकार का नाश करनेवाला (इन्द्रः) प्रतापी राजा (तम्) चोर को (परमाम्) अतिशय (परावतम्) दूर भूमि में (नुदतु) भेज देवे। (यतः) जहाँ से वह (शश्वतीभ्यः) बहुत (समाभ्यः) बरसों तक (पुनः) फिर (न)(आयति) आवे ॥२॥

    भावार्थ

    राजा दुराचारी लोगों को दूर स्थान में कारागार के भीतर रक्खे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(परमाम्) अतिशयिताम् (तम्) तर्द हिंसने ड। तर्दकं चोरम् (परावतम्) अ० ३।४।५। दूरगतां भूमिम्। (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (यतः) यस्या दूरभूमेः सकाशात् (न) निषेधे (पुनः) द्वितीयवारम् (आयति) आवर्तते (शश्वतीभ्यः) बहुभ्यः−निघ० ३।१। (समाभ्यः) संवत्सरेभ्यः ॥

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    विषय

    दूर-से-दूर धकेलना

    पदार्थ

    १. (वृत्रहा) = राष्ट्र को घेरनेवाले शत्रुओं को नष्ट करनेवाला यह (इन्द्रः) = शत्रुविद्रावक राजा (तम्) = उस शत्रु को (परमां परावतम्) = अतिशयित दूर देश में (नुदतु) = धकेल दे कि (यतः) = जहाँ से वह (शश्वतीभ्यः समाभ्यः)   = अनेक वर्षों तक भी (पुनः न आयति) = फिर हमारे राष्ट्र पर चढ़ने के लिए न आ पाये।

    भावार्थ

    शत्रु को इसप्रकार दूर देश में धकेला जाए कि वह फिर वर्षों तक हमारे राष्ट्र पर आक्रमण का स्वप्न भी न ले।

     

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    भाषार्थ

    (वृत्रहा) आवरण अर्थात् घेरा डालने वाले शत्रुदल का हनन करने वाला (इन्द्रः) सम्राट् (तम्) उसे (परमां परावतम्) दूर से दूर (नुदतु) धकेल दे, (यतः) जहां से (शश्वतीभ्यः समाभ्यः) शाश्वतकालसम्बन्धी वर्षों से भी (पुनः) घिर लोट कर (न आयति) न आये।

    टिप्पणी

    [अभिप्राय यह कि इन्द्र उसे मार डाले, जहां से लौटकर आना नहीं होता। मन्त्र में 'तम्' द्वारा शत्रु-राजा का निर्देश हुआ है। परावतः दूरनाम (निघं० ३।२६)।]

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    विषय

    शत्रु को मार भगाने का उपदेश।

    भावार्थ

    (वृत्रहा इन्द्रः) वृत्र—नगर को घेरने वाले शत्रु को मारने वाला इन्द्र = राजा सेनापति (तम्) उस शत्रु को (परमां परावतम्) खूब दूर तक (नुदतु) खदेड़ आवे। इतती दूर तक खदेड़ दे कि (यतः) जहां से (शश्वतीभ्यः समाभ्यः) अनन्त वर्षों तक (पुन:) फिर (न आयति) लौट कर न आवे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सपत्नक्षयकामः कबन्ध ऋषिः। मन्त्रोक्ता इन्द्रश्च देवताः। १-२ अनुष्टुभौ, ३ षट्पदा जगती। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Drive off the Enemy

    Meaning

    Let Indra, destroyer of darkness and demonic enmity, drive off that enemy to the farthest place so that for all times to come he can never come back again.

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    Translation

    May the resplendent army-chief, slayer of the evil, drive him ' away to the remotest distance, from where he may not retum ever in years to come.

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    Translation

    Let the King who is destroyer of foes drive away him into such a remotest distance whence he shall never return in all the years that are to come.

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    Translation

    May king, the Foe-slayer, drive him forth into the most remote place, whence never more shall he return in all the years that are to come.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(परमाम्) अतिशयिताम् (तम्) तर्द हिंसने ड। तर्दकं चोरम् (परावतम्) अ० ३।४।५। दूरगतां भूमिम्। (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (यतः) यस्या दूरभूमेः सकाशात् (न) निषेधे (पुनः) द्वितीयवारम् (आयति) आवर्तते (शश्वतीभ्यः) बहुभ्यः−निघ० ३।१। (समाभ्यः) संवत्सरेभ्यः ॥

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