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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 83 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 83/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अङ्गिरा देवता - सूर्यः, चन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - भैषज्य सूक्त
    51

    अप॑चितः॒ प्र प॑तत सुप॒र्णो व॑स॒तेरि॑व। सूर्यः॑ कृ॒णोतु॑ भेष॒जं च॒न्द्रमा॒ वोऽपो॑च्छतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अप॑ऽचित: । प्र । प॒त॒त॒ । सु॒ऽप॒र्ण: । व॒स॒ते:ऽइ॑व । सूर्य॑: । कृ॒णोतु॑ । भे॒ष॒जम् । च॒न्द्रमा॑: । व॒: । अप॑ । उ॒च्छ॒तु॒ ॥८३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपचितः प्र पतत सुपर्णो वसतेरिव। सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वोऽपोच्छतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपऽचित: । प्र । पतत । सुऽपर्ण: । वसते:ऽइव । सूर्य: । कृणोतु । भेषजम् । चन्द्रमा: । व: । अप । उच्छतु ॥८३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 83; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    रोग नाश करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (अपचितः) हे सुख नाश करनेवाली गण्डमाला आदि पीड़ाओ ! (प्र पतत) चली जाओ, (सुपर्णः इव) जैसे शीघ्रगामी पक्षी [श्येन] (वसतेः) अपनी वसती से। (सूर्यः) प्रेरणा करनेवाला [वैद्य वा सूर्य लोक] (भेषजम्) औषध (कृणोतु) करे, और (चन्द्रमाः) आनन्द देनेवाला [वैद्य वा चन्द्र लोक] (वः) तुम को (अप उच्छतु) निकाल देवे ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे सद्वैद्य गण्डमाला आदि रोगों को सूर्य वा चन्द्रमा की किरणों द्वारा वा अन्य औषधों से अच्छा करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या की प्राप्ति से अविद्या का नाश करके सुखी होवें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अपचितः) अप पूर्वात् चिनोतेः−क्विप्। हे सुखनाशिका गण्डमालादिपीडाः (प्र पतत) प्रकर्षेण निर्गच्छत (सुपर्णः) अ० १।२४।१। शोभनपतनः शीघ्रगामी पक्षी (वसतेः) वहिवस्यर्त्तिभ्यश्चित्। उ० ४।६०। इति वस निवासे−अति। गृहात् नीडात् (इव) यथा (सूर्यः) प्रेरको वैद्यः सूर्यलोको वा स्वकिरणद्वारा (कृणोतु) करोतु (भेषजम्) चिकित्सनम् (चन्द्रमाः) अ० ५।२४।१०। आह्लादकरो वैद्यश्चन्द्रलोको वा स्वकिरणद्वारा (वः) युष्मान् (अपोच्छतु) उच्छी विवासे, अपवासयतु। अपवर्जयतु ॥

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    विषय

    गण्डमाला की चिकित्सा

    पदार्थ

    १. दोषवश गले से लेकर नीचे फैलनेवाली गिलटियाँ गण्डमाला व 'अपचित' कहलाती हैं [अपाकचीयमानाः] हे (अपचित:) = गण्डमालाओ! तुम (प्र पतत) = इस शरीर से इसप्रकार निकल जाओ (इव) = जैसेकि (सुपर्ण: वसते:) = शोभनपतन श्येन अपने निवासस्थानभूत घोंसले से उड़ जाता है। २. (सूर्य:) = सूर्य (व:) = तुम्हारा (भेषजं कृणोतु) = चिकित्सा करे और (चन्द्रमाः) = चन्द्र तुम्हें (अप उच्छतु) = दूर विवासित करनेवाला हो।

    भावार्थ

    एक सद् वैद्य सूर्य व चन्द्र किरणों को सेवन कराके 'गण्डमाला' रोग को हमसे दूर भगा देता है।

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    भाषार्थ

    (अपचित:)१ हे गले से आरम्भ करके नीचे को ओर सञ्चित हुई, फैली हुई गण्डमालाओं ! [सायण], (प्रपतत) शीघ्र उड़ जाओ, (इव) जैसे कि (सुपर्णः) पक्षी (वसते:) अपने निवास स्थान से शीघ्र उड़ जाता है। (सूर्यः) सूर्य [की रश्मियां (भेषजम्) चिकित्सा (कृणोतु) करें, (चन्द्रमाः) चन्द्रमा (वः) तुम्हें (अप उच्छतु) स्थानच्युत करे।

    टिप्पणी

    [अपचितः= अपचयन की हुई गण्डमालाएं; अपचयन = बुरी तरह से चिनी गई या [अपाक्] नीचे की ओर चिनी गई गण्डमालाएं। ये गण्ड मालाएं क्षय रोग की सूचिकाएं हैं। सूर्य की रश्मियां सप्तविध होती हैं, जो कि वर्षा ऋतु में इन्द्रधनुष में दिखाई देती हैं। सूर्य की रश्मियों द्वारा 'रश्मिचिकित्सा' अभिप्रेत है। चन्द्रमा की रश्मियों द्वारा भी गण्डमाला की चिकित्सा सूचित की गई है। अपोच्छतु= अप उछी विवासे]। [१. अपपचितः= "अप" चिञ् चयने, अथवा "अपाक्" चिञ् चयने।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Scrofulous Inflammation

    Meaning

    Apachit is interpreted as Gandamala in Ayurveda: it is pustules or scrofulous inflammation of the glands in the neck area. Get off Apachits like an eagle bird from the habitat. Let the sun be the medicament, or let the moon light root you out.

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    Subject

    Surya etc. (the Sun)

    Translation

    O malignant tumour (eruptious) (apacit), may you fly away like an eagle from its nest. May the sun provide a remedy and the moon dislodge you .

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    Translation

    Let the sun be remedy and let the moon banish them and. all the sores and pustules flee away like the eagle which flies from its nest.

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    Translation

    Hence Sores and Pustules, fly away as the eagle from his nest. Let a goading physician bring a remedy, the pleasant physician banish you.

    Footnote

    There are five kinds of pustules."Them'' refers to sores and pustules.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अपचितः) अप पूर्वात् चिनोतेः−क्विप्। हे सुखनाशिका गण्डमालादिपीडाः (प्र पतत) प्रकर्षेण निर्गच्छत (सुपर्णः) अ० १।२४।१। शोभनपतनः शीघ्रगामी पक्षी (वसतेः) वहिवस्यर्त्तिभ्यश्चित्। उ० ४।६०। इति वस निवासे−अति। गृहात् नीडात् (इव) यथा (सूर्यः) प्रेरको वैद्यः सूर्यलोको वा स्वकिरणद्वारा (कृणोतु) करोतु (भेषजम्) चिकित्सनम् (चन्द्रमाः) अ० ५।२४।१०। आह्लादकरो वैद्यश्चन्द्रलोको वा स्वकिरणद्वारा (वः) युष्मान् (अपोच्छतु) उच्छी विवासे, अपवासयतु। अपवर्जयतु ॥

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