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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 86 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 86/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - एकवृषः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वृषकामना सूक्त
    33

    स॒म्राड॒स्यसु॑राणां क॒कुन्म॑नु॒ष्याणाम्। दे॒वाना॑मर्ध॒भाग॑सि॒ त्वमे॑कवृ॒षो भ॑व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒म्ऽराट् । अ॒सि॒ । असु॑राणाम् । क॒कुत् । म॒नुष्या᳡णाम् । दे॒वाना॑म्। अ॒र्ध॒ऽभाक् । अ॒सि॒ । त्वम् । ए॒क॒ऽवृ॒ष: । भ॒व॒ ॥८६.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सम्राडस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम्। देवानामर्धभागसि त्वमेकवृषो भव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽराट् । असि । असुराणाम् । ककुत् । मनुष्याणाम् । देवानाम्। अर्धऽभाक् । असि । त्वम् । एकऽवृष: । भव ॥८६.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 86; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    साम्राज्य पाने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे पुरुष !] (असुराणाम्) बुद्धिमानों का (सम्राट्) सम्राट्, और (मनुष्याणाम्) मननशील मनुष्यों का (ककुत्) शिखा (असि) है। (देवानाम्) जय चाहनेवालों की (अर्धभाक्) वृद्धि का बाँटनेवाला (असि) है, [हे पुरुष !] (त्वम्) तू (एकवृषः) अकेला स्वामी (भव) हो ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य सब से अधिक गुणी होकर चक्रवर्त्ती राजा बने ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(सम्राट्) अ० ४।१।५। सम्यग्राजमानः। चक्रवर्ती (असि) वर्तसे (असुराणाम्) असुरत्वं प्रज्ञावत्वम्, असुरिति प्रज्ञानाम−निरु० १०।३४। रो मत्वर्थीयः प्रज्ञावताम् (ककुत्) अ० ३।४।२। शिखररूपी। प्रधानः (मनुष्याणाम्) मननशीलानाम् (देवानाम्) विजिगीषूणाम् (अर्धभाक्) ऋधु वृद्धौ भावे−घञ्। अर्ध+भाज पृथक्कर्मणि−क्विप्। अर्धस्य वर्धनस्य भागी। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    उत्तम पुरुष लक्षण

    पदार्थ

    १. हे उत्तम पुरुष ! तू (असुराणाम्) = [असुरम्] प्राणशक्ति-सम्पन्न बलवान् पुरुषों का (सम्राट असि) = सम्राट् है। (मनुष्यणाम्) = मननशील पुरुषों का (ककुत्) = शिखर-शिरोमणि है। (देवानाम्) = दिव्य वृत्तिवाले सब मनुष्यों की (अर्धभाग् असि) = [अर्ध-Increase] वृद्धि का सेवन करनेवाला है। इसप्रकार (त्वम्) = तू (एकवृषः भव) = अद्वितीय श्रेष्ठतावाला हो।

    भावार्थ

    हम शक्तिशालियों के सम्राट्, ज्ञानियों के शिरोमणि व देवों की समृद्धिवाले बनकर-दिव्य गुणोंवाले बनकर अद्वितीय श्रेष्ठता को प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (असुराणाम्) असुरों का (सम्राट असि) सम्राट् तू है, (मनुष्याणाम्) मनुष्यों में (ककुद्) सर्वोच्च तथा सर्वश्रेष्ठ है। (देवानाम्) देवों का (अर्धभाग् असि) अर्धभागी है, (त्वम्, एकवृषो भव) पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    [सम्राट् असुरों का भी सम्राट् है और मनुष्यों का भी। असुरों, मनुष्यों के संयुक्त साम्राज्य का वह सम्राट् है। बृहदारण्योपनिषद् के अनुसार प्रजापति के तीन पुत्र है देव, मनुष्य और असुर। और तीनों ही मिल कर प्रजापति के आश्रम में ब्रह्मचारी रहे और विद्याध्ययन करते रहे (अध्याय ५। आह्मण २)। अत: इन तीनों का संयुक्त साम्राज्य भी सम्भव है और एक सम्राट् भी। अतः देव, असुर ओर मनुष्य गुणकर्मकृत है। जातिपरक नहीं। देवानाम्, अर्धभाग्= इस के नाना अथ हैं। (१) देवकोटि१ के ऋषि-मुनियों के आसन में एकासन के अर्धभाग का अधिकारी। (२) 'देवानाम्' के दो अभिप्राय हैं, विजिगीषु सैनिक, तथा व्यवहारी अर्थात् व्यापारी। 'दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहार' आदि (दिवादिः)। विजिगीषु सेना को देवसेना अथवा देवानां सेना कहा भी है। यथा देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्' (यजु० १७।४०)। ये देवसेनाएं शत्रुसेनाओं को परास्त कर जब उन्हें 'नैर्हस्तम्' (अथर्व० ६ ६५।२,३) कर दें, तो युद्धस्थल में शत्रुसेनाओं को जो सम्पत्ति उपलब्ध हो, उस को आधी सम्पत्ति सम्राट् की, और शेष आधो सैनिकों की हो। इसी प्रकार व्यापारियों को व्यापार में जो लाभ हो उस का आधा-आधा सम्राट् और व्यापारियों का हो। यह आधा हिस्सा 'राजकर' अर्थात् टैक्स रूप में है। व्यापारियों के लाभ को 'उत्थितम्' कहा है, और मूलधन को 'चरितम्'२ (अथर्व० ३।१५।४)]। [१. यथा "देवाः = साध्याऽऋषयश्च" (यजु० ३१।९)। साध्या: = योगसाधनासम्पन्नाः। ऋषयः=मन्त्रद्रष्टारः, या मन्त्रार्थद्रष्टार:। २. चरित है मूलधन, जिसे कि व्यापार में लगाया है, और उस द्वारा प्राप्त लाभ है "उत्थित"। इस लाभ का आधा "कर" रूप है।]

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    विषय

    सर्वश्रेष्ठ होने का उपदेश।

    भावार्थ

    हे उत्तम पुरुष ! तू (असुराणाम्) बलवान् पुरुषों का भी (सम्राट् असि) सम्राट् है। (मनुष्याणाम्) साधारण मनुष्यों अथवा मननशील पुरुषों में भी (ककुत्) सबके ऊपर विराजमान है। (देवानाम्) दिव्य शक्तियों के धारण करने वाले विज्ञानी पुरुषों में (अर्धभाक् असि) श्रेष्ठ पद को पाने वाला है। अतः (त्वम्) तू ही (एकवृषः भव) एकमात्र सर्वश्रेष्ठ हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वृषकामोऽथर्वा ऋषिः। एकवृषो देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The One Supreme

    Meaning

    You are the refulgent ruler of life energies, you are on top of the entire humanity, you are half way up to share the nature of divinities. O ruler, you be the mighty generous one most excellent master over all dedicated to One Supreme.

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    Translation

    You are the sovereign of the life-enjoyers and apex of men you are the part-sharer of the enlightened ones. May you be the one and only powerful lord.

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    Translation

    O man! you are the King of vital airs, you are the top-ranked among men, and you are the partner of the organs in their hunts.

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    Translation

    Thou art the king of the intellectuals, the crown and summit of mankind, the head of scientists, be thou, O man, the one and only lord.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(सम्राट्) अ० ४।१।५। सम्यग्राजमानः। चक्रवर्ती (असि) वर्तसे (असुराणाम्) असुरत्वं प्रज्ञावत्वम्, असुरिति प्रज्ञानाम−निरु० १०।३४। रो मत्वर्थीयः प्रज्ञावताम् (ककुत्) अ० ३।४।२। शिखररूपी। प्रधानः (मनुष्याणाम्) मननशीलानाम् (देवानाम्) विजिगीषूणाम् (अर्धभाक्) ऋधु वृद्धौ भावे−घञ्। अर्ध+भाज पृथक्कर्मणि−क्विप्। अर्धस्य वर्धनस्य भागी। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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