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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 87 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 87/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - ध्रुवः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - राज्ञः संवरण सूक्त
    139

    आ त्वा॑हार्षम॒न्तर॑भूर्ध्रु॒वस्ति॒ष्ठावि॑चाचलत्। विश॑स्त्वा॒ सर्वा॑ वाञ्छन्तु॒ मा त्वद्रा॒ष्ट्रमधि॑ भ्रशत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ ।त्वा॒ । अ॒हा॒र्ष॒म् । अ॒न्त: । अ॒भू॒: । ध्रु॒व: । ति॒ष्ठ॒ । अवि॑ऽचाचलत् । विश॑: । त्वा॒ । सर्वा॑: । वा॒ञ्छ॒न्तु॒ । मा । त्वत् । रा॒ष्ट्रम् । अधि॑ । भ्र॒श॒त् ॥८७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्। विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ ।त्वा । अहार्षम् । अन्त: । अभू: । ध्रुव: । तिष्ठ । अविऽचाचलत् । विश: । त्वा । सर्वा: । वाञ्छन्तु । मा । त्वत् । राष्ट्रम् । अधि । भ्रशत् ॥८७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 87; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजतिलक यज्ञ के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    [हे राजन् !] (त्वा) तुझको (आ=आनीय) लाकर (अहार्षम्) मैंने स्वीकार किया है। (अन्तः) सभा के मध्य (अभूः) तू वर्त्तमान हुआ है। (ध्रुवः) निश्चित बुद्धि और (अविचाचलत्) निश्चलस्वभाव होकर (तिष्ठ) स्थिर हो (सर्वाः) सब (विशः) प्रजायें (त्वा वाञ्छन्तु) तेरी कामना करें, (राष्ट्रम्) राज्य (त्वत्) तुझसे (मा अधिभ्रशत्) कभी भ्रष्ट न होवे ॥१॥

    भावार्थ

    प्रजागण सबसे उत्तम पुरुष को राजा बना कर उपदेश करें, जिससे वह सदा धार्मिक पुरुषार्थी रहे और बुरे आचरण से राज्य नष्ट न होवे ॥१॥ यह सूक्त ऋग्वेद में है−१०।१७३।१-३। और यह मन्त्र यजुर्वेद में है−१२।—११ ॥

    टिप्पणी

    १−(आ) आनीय (त्वा) त्वां राजानम् (अहार्षम्) स्वीकृतवानस्मि (अन्तः) सभामध्ये (अभूः) विराजमानोऽभवः (ध्रुवः) स्रुवः क। उ० २।६१। इति ध्रु स्थैर्य्ये−क। निश्चितबुद्धिः (तिष्ठ) स्थिरो भव (अविचाचलत्) चल गतौ−यङ्लुगन्तात्, शतृ। नाभ्यस्ताच्छतुः। पा–० ७।१।७८। इति नुम्प्रतिषेधः। निश्चलस्वभावः (विशः) प्रजाः। मनुष्याः−निघ० २।३। (सर्वाः) अखिलाः (त्वा) (वाञ्छन्तु) वाछि इच्छायाम्। कामयन्तु (त्वत्) त्वत्तः (राष्ट्रम्) राज्यम् (अधि) अधिकम्। कदापि (मा भ्रशत्) भ्रशु अधःपतने माङि लुङि पुषादित्वात् च्लेरङादेशः। मा नष्टं स्यात् ॥

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    विषय

    प्रजाप्रिय राजा

    पदार्थ

    १. पुरोहित राज्याभिषेक करता हुआ राजा से कहता है कि हे राजन्! (त्वा आहार्षम्) = तुझे मैं इस सिंहासन पर लाया हूँ, (अन्तः अभूः) = तू सदा राष्ट्र में निवास करनेवाला हो, अविचाचलत् मार्ग से विचलित न होता हुआ तू धुवः तिष्ठ-स्थिररूप से सिंहासन पर स्थित हो। २. सर्वा: विश:-सब प्रजाएँ त्वा वाञ्छन्तु-तुझे चाहें। तू प्रजाओं का प्रिय हो। त्वत्-तुझसे राष्ट्रम्-यह राष्ट्र मा अधिभ्रशत्-कभी भी नष्ट न हो।

    भावार्थ

    राजा प्रजाओं में ही विचरनेवाला हो। वह इधर-उधर शिकार ही न खेलता रहे। स्थिरवृत्ति का बनकर राज्य करे। प्रजाओं का प्रिय हो। उसे कभी राज्य से पृथक न होना पड़े।



     

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    भाषार्थ

    (त्वा) तुझे (आहार्षम्) मैं लाया हूं, (अन्तः अभूः) तू राष्ट्र के अन्दर का निवासी हुआ है। [राष्ट्र का असना प्रजाजन हुआ है], (ध्रुवः तिष्ठ) तू स्थिर रूप में [राजासन पर] स्थित हो, (अविचाचलत्) विना विचलित हुए। (सर्वाः विशः) सब प्रजाएं (त्वा) तुझे (वाञ्छन्तु) चाहें, (राष्ट्रम्) राष्ट्र (त्वत् अधि) तुझ से (मा)(भ्रशत्) अधःपतित हो, पतनोन्मुख न हो, अथवा छीना न जाय।

    टिप्पणी

    [वेदानुसार वंशपरम्परागत व्यक्ति राजा नहीं होता। किसी योग्य व्यक्ति का नाम प्रस्तावित होना चाहिये। मन्त्र प्रस्तावक के मुख से कहलाया है। भ्रशत् = भ्रंशु अधःपतने]।

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    विषय

    राजा को स्थायी और दृढ़ शासक होने का उपदेश।

    भावार्थ

    राजा को प्रजा का स्थायी शासक होने का उपदेश करते हैं। हे राजन् ! मैं समस्त प्रजाजनों का प्रतिनिधि, पुरोहित (त्वा) तुझको (आहार्षम्) यहां राजसभा के मुख्य पद पर लाता हूं। तू (अन्तः अभूः) हम सब के बीच में शक्तिमान् होकर रह। तू (ध्रुवः) स्थिर (अविचाचलत्) कभी भी प्रलोभन, भय और स्वार्थ के झंकोरों से भी न डिगता हुआ (तिष्ठ) इस आसन, राज्य-सिंहासन पर बैठ। (त्वा) तुझको (सर्वाः विशः) समस्त नगर में बसने वाली प्रजाएं (वाञ्छन्तु) हृदय से चाहें। देख, कहीं तेरे किसी दोष से यह (राष्ट्रम्) तेरा राष्ट्र (त्वत्) तेरे अधिकार से (मा अधि भ्रशत्) न फिसल जाय। अर्थात् जब तक प्रजा तुझको चाहेगी तब तक ही तू इस पद पर राष्ट्र का शासन कर पायेगा और जब यह प्रजाएं न चाहेंगी तो यह राष्ट्र तेरे शासन से निकल जायगा।

    टिप्पणी

    ‘अन्तरेधि’ (द्वि०) ‘चाचलिः’ इति ऋ० (च०) ‘अस्मिन् राष्ट्रमधिश्रय’ इति तै० सं०। ‘अस्मे राष्ट्राणि धारय’ इति तै० सं०। ऋग्येदे ध्रुव ऋषिः। राज्ञः स्तुतिर्देवता।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। ध्रुवो देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Ruler’s Selection and Stability

    Meaning

    O Ruler, I conduct you to the seat of governance in the council. Take it at the centre of the Rashtra, be firm, never vascillate. Let all people love and honour you. Let not the Rashtra fall foul of you nor you swerve from the Rashtra and its honour.

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    Subject

    Dhruvah

    Translation

    O king, I have brought you here. Now you have entered inside. May you remain here firm and unremovable. May all the subjects be like you. May Your kingship never fail. (Also Yv. XII. 11)

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    Translation

    O ruler! Here you gain power, I, the priest have chosen you for this office and you stand here steadfast and immovable. Let all the subjects desire you and let not your Kingdom fall away.

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    Translation

    O King, I bring thee here to the Assembly. Stay in our midst as a ruler. Stand steadfast and immovable. Let all thy subjects desire thee. Let not thy kingdom slip away from thy control!

    Footnote

    I Priest, who anoints the king. See Yajur, 12-11, Rig, 10-173-1.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(आ) आनीय (त्वा) त्वां राजानम् (अहार्षम्) स्वीकृतवानस्मि (अन्तः) सभामध्ये (अभूः) विराजमानोऽभवः (ध्रुवः) स्रुवः क। उ० २।६१। इति ध्रु स्थैर्य्ये−क। निश्चितबुद्धिः (तिष्ठ) स्थिरो भव (अविचाचलत्) चल गतौ−यङ्लुगन्तात्, शतृ। नाभ्यस्ताच्छतुः। पा–० ७।१।७८। इति नुम्प्रतिषेधः। निश्चलस्वभावः (विशः) प्रजाः। मनुष्याः−निघ० २।३। (सर्वाः) अखिलाः (त्वा) (वाञ्छन्तु) वाछि इच्छायाम्। कामयन्तु (त्वत्) त्वत्तः (राष्ट्रम्) राज्यम् (अधि) अधिकम्। कदापि (मा भ्रशत्) भ्रशु अधःपतने माङि लुङि पुषादित्वात् च्लेरङादेशः। मा नष्टं स्यात् ॥

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