अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 87 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 87/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - ध्रुवः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - राज्ञः संवरण सूक्त
    पदार्थ -

    [हे राजन् !] (त्वा) तुझको (आ=आनीय) लाकर (अहार्षम्) मैंने स्वीकार किया है। (अन्तः) सभा के मध्य (अभूः) तू वर्त्तमान हुआ है। (ध्रुवः) निश्चित बुद्धि और (अविचाचलत्) निश्चलस्वभाव होकर (तिष्ठ) स्थिर हो (सर्वाः) सब (विशः) प्रजायें (त्वा वाञ्छन्तु) तेरी कामना करें, (राष्ट्रम्) राज्य (त्वत्) तुझसे (मा अधिभ्रशत्) कभी भ्रष्ट न होवे ॥१॥

    भावार्थ -

    प्रजागण सबसे उत्तम पुरुष को राजा बना कर उपदेश करें, जिससे वह सदा धार्मिक पुरुषार्थी रहे और बुरे आचरण से राज्य नष्ट न होवे ॥१॥ यह सूक्त ऋग्वेद में है−१०।१७३।१-३। और यह मन्त्र यजुर्वेद में है−१२।—११ ॥

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