अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 94/ मन्त्र 1
ऋषिः - अथर्वाङ्गिरा
देवता - सरस्वती
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
135
सं वो॒ मनां॑सि॒ सं व्र॒ता समाकू॑तीर्नमामसि। अ॒मी ये विव्र॑ता॒ स्थन॒ तान्वः॒ सं न॑मयामसि ॥
स्वर सहित पद पाठसम् । व॒: । मनां॑सि॒ । सम् । व्र॒ता । सम् । आऽकू॑ती: । न॒मा॒म॒सि॒ । अ॒मी इति॑ । ये । विऽव्र॑ता: । स्थन॑ । तान् । व॒: । सम् । न॒म॒या॒म॒सि॒ ॥९४.१॥
स्वर रहित मन्त्र
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि। अमी ये विव्रता स्थन तान्वः सं नमयामसि ॥
स्वर रहित पद पाठसम् । व: । मनांसि । सम् । व्रता । सम् । आऽकूती: । नमामसि । अमी इति । ये । विऽव्रता: । स्थन । तान् । व: । सम् । नमयामसि ॥९४.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
शान्ति करने के लिये उपदेश।
पदार्थ
[हे मनुष्यो !] (वः) तुम्हारे (मनांसि) मनों को (सम्) ठीक रीति से, (व्रता=व्रतानि) कर्मों को (सम्) ठीक रीति से (आकूतीः) संकल्प को (सम्) ठीक रीति से (नमामसि=०−मः) हम झुकते हैं। (अमी ये) यह जो तुम (विव्रताः) विरुद्धकर्मी (स्थन) हो, (तान् वः) उन तुमको (सम्) ठीक रीति से (नमयामसि=०−मः) हम झुकाते हैं ॥१॥
भावार्थ
प्रधान पुरुष सब के उत्तम विचारों, उत्तम कर्मों और उत्तम मनोरथों का माने और धर्मपथ में विरुद्ध मतवालों को भी सहमत कर लेवे ॥१॥ यह मन्त्र आ चुका है−अ० ३।८।५ ॥
टिप्पणी
१−पूर्ववद् व्याख्येयः−अ० ३।८।५ ॥
भाषार्थ
(वः) तुम्हारे (मनांसि) मनों को (सं नमामसि) परस्पर के प्रति हम नत करते हैं, झुकाते हैं, (व्रता=व्रतानि) व्रतों, कर्मों को (सम्) परस्यर के प्रति नत करते हैं, झुकाते हैं, (आकूतीः) संकल्पों को (सम् नमामसि) परसर के प्रति नत करते हैं, झुकाते हैं। (अमी) ये (ये) जो (विव्रताः) परस्पर विरोधी व्रतों, कर्मों वाले हो (तान् वः) उन तुम को (सं नमयामसि) परस्पर के प्रति हम नत करते हैं, झुकवाते हैं।
विषय
एकचित्त रहने का उपदेश।
भावार्थ
व्याख्या देखो ३। ८। ५।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाङ्गिरा ऋषिः। सरस्वती देवता। १,३ अनुष्टुभौ। २ विराड् जगती। तृचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Union at Heart
Meaning
We bring your minds together, we bring your vows and values, your thoughts and resolutions together. Those of you that stand apart in ideals and resolutions, all those of you we bring to agreement and unite you together.
Subject
Sarasvati
Translation
We mould together your minds, together your courses and designs. So far you have been of conflicting courses (vivrati), we make you bend them in harmony.
Translation
We bind your minds in concordance, we bend your hopes and plans in harmony and we bend and bow in unison to all those of you who turn to sundered ways.
Translation
We bend your minds in unison, bend in harmony your acts and resolves. You there, who think and act differently, we bend and bow in unison.
Footnote
We: Learned person. You: Common persons. See Atharva, 3-8-5.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१−पूर्ववद् व्याख्येयः−अ० ३।८।५ ॥
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