अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 99 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 99/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कल्याण के लिए यत्न
    पदार्थ -

    (इन्द्र) हे संपूर्ण ऐश्वर्यवाले इन्द्र जगदीश्वर ! (त्वा त्वाम्) तुझको, तुझको (वरिमतः) तेरे विस्तार के कारण (अंहूरणात्) पापवाले कर्म से (पुरा) पहिले (अभि) सब ओर से (हुवे) मैं बुलाता हूँ। (उग्रम्) तेजस्वी, (चेत्तारम्) सत्य और असत्य के जाननेवाले, (पुरुनामानम्) अनेक उत्तम नामवाले, (एकजम्) अकेले उत्पन्न [अद्वितीय, तुझ प्रभु] को (ह्वयामि) मैं पुकारता हूँ ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्यों को उचित है कि उस जगदीश्वर को सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् जान कर पाप कर्म को छोड़ कर शुभ कर्म करते रहें ॥१॥

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