अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 11 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 11/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शौनकः देवता - सरस्वती छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - राष्ट्रसभा सूक्त
    पदार्थ -

    (देव) हे जलदाता मेघ ! (यः) जो (ते) तेरा (पृथुः) विस्तीर्ण और (यः) जो (ऋष्वः) इधर-उधर चलनेवाला वा बड़ा, (दैवः) आकाश में रहनेवाला, (केतुः) जतानेवाला झण्डा रूप (स्तनयित्नुः) गर्जन (इदम् विश्वम्) इस सब स्थान में (आभूषति) व्यापता है। (नः) हमारे (सस्यम्) धान्य को (विद्युता) चमचमाती बिजुली से (मा वधीः) मत नाश कर, और (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों से (उत) भी (मा वधीः) मत सुखा ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि दैवी विपत्तियों का विचार रख कर पहिले से अन्न आदि के संचय से रक्षा का उपाय कर लेवें ॥१॥

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