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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 115 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 115/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वाङ्गिराः देवता - सविता, जातवेदाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पापलक्षणनाशन सूक्त
    120

    प्र प॑ते॒तः पा॑पि लक्ष्मि॒ नश्ये॒तः प्रामुतः॑ पत। अ॑य॒स्मये॑ना॒ङ्केन॑ द्विष॒ते त्वा स॑जामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । प॒त॒ । इ॒त: । पा॒पि॒ । ल॒क्ष्मि॒ । नश्य॑ । इ॒त: । प्र । अ॒मुत॑: । प॒त॒ । अ॒य॒स्मये॑न । अ॒ङ्केन॑ । द्वि॒ष॒ते । त्वा॒ । आ । स॒जा॒म॒सि॒ ॥१२०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र पतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रामुतः पत। अयस्मयेनाङ्केन द्विषते त्वा सजामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । पत । इत: । पापि । लक्ष्मि । नश्य । इत: । प्र । अमुत: । पत । अयस्मयेन । अङ्केन । द्विषते । त्वा । आ । सजामसि ॥१२०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 115; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    दुर्लक्षण के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (पापि) हे पापी ! (लक्ष्मि) लक्षण [लक्ष्मी] ! (इतः) यहाँ से (प्र पत) चला जा, (इतः) यहाँ से (नश्य) छिप जा, (अमुतः) वहाँ से (प्र पत) चला जा। (अयस्मयेन) लोहे के (अङ्केन) काँटे से (त्वा) तुझको (द्विषते) वैरी में (आ सजामसि) हम चिपकाते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य दुर्लक्षणों का सर्वथा त्याग करें। दुर्लक्षणों से दुष्ट लोग महादुःख पाते हैं ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(प्र पत) बहिर्गच्छ (इतः) अस्मात् स्थानात् (पापि) केवलमामकभागधेयपापा०। पा० ४।१।३०। पाप-ङीप्, हे दुष्टे (लक्ष्मि) लक्षेर्मुट् च। उ० ३।१६०। लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-ई, मुट् च। हे लक्षण (नश्य) अदृष्टा भव (इतः) (प्र) (अमुतः) दूरदेशात् (पत) (अयस्मयेन) लोहमयेन (अङ्केन) कण्टकेन (द्विषते) शत्रवे (त्वा) त्वाम् (आ) समन्तात् (सजामसि) षञ्ज सङ्गे सम्बन्धे च। सजामः। संबध्नीमः ॥

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    विषय

    'पापी लक्ष्मी' का अदर्शन

    पदार्थ

    १.हे (पापि लक्ष्मि) = पापरूपिणी लक्ष्मी [अर्थात् अलक्ष्मी] अन्याय्य मार्ग से कमाये गये धन! (इतः प्रपत) = यहाँ से दूर हो जा। (इत: नश्य) = इस प्रदेश से अदृष्ट हो जा। (अमुत: प्रपत) = अति दूर देश से भी तू दूर चला जा। अन्याय्य धन का हमारे यहाँ स्थान न हो। २. (अयस्मयेन अंकेन) = लोहे के बने हुए कोटे से (त्वा) = तुझे (द्विषते सजामसि) = शत्रु के लिए सम्बद्ध करते हैं। अन्याय्य मार्ग से अर्जित धन हमारे शत्रुओं के साथ ही सम्बद्ध हो। इस धन को हम अपने से दूर ही रक्खें ।

    भावार्थ

    अन्याय्य मार्ग से प्राप्त होनेवाला धन हमसे दूर हो। इसका स्थान हमारे शत्रुओं में ही हो।

     

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    भाषार्थ

    (पापि लक्ष्मि) हे पापरूपिणी लक्ष्मी ! (इतः) यहां से (पपत) तू उड़ जा (इतः) यहां से (नश्य) अदृष्ट हो जा, (अमृतः) उस दूर देश से भी (प्रपत) चली जा। (द्विषते) जैसे द्विष्ट-शत्रु के पराजय के लिये, (अयस्मयेन अङ्केन) अंकित कर देने वाले लोह निर्मित शल्य द्वारा [उसके शरीर को अंकित कर दिया जाता है, वैसे] हे पापरूपिणी लक्ष्मी ! (त्वा) तुझे (सजामसि) हम शल्य द्वारा सम्बद्ध कर देते हैं। [ताकि तेरा विनाश हो जाय]।

    टिप्पणी

    [दो प्रकार से लक्ष्मी का उपार्जन होता है, सुपथ द्वारा तथा दुष्पथ द्वारा। दुष्पथ द्वारा उपार्जित लक्ष्मी पापरूपिणी है। इसका परित्याग करना चाहिये। वेद में सुपथ द्वारा लक्ष्मी के उपार्जन का निर्देश किया है। यथा- "अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान" (यजु० ४०।१६)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Negative Plenty

    Meaning

    Negative plenty, sinful prosperity, fall off far from here, out of sight hence, disappear, fall off farther than far, over there. We foist you, life’s negativities, hate and enmities, with barbs of iron.

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    Subject

    Savitr and Jatavedah

    Translation

    O evil wealth, flee from here fast. Run away from here; flee away from there too. With an iron-hook (ayasmayena ankena) we fasten you to him, who hates us.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.120.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    Let the evil tendency fly away from here, let it vanish from here and from there. I fix it to the aversive role of the aversion with the bar of iron.

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    Translation

    Hence, Evil Fortune! fly away, vanish from this place and from the distant one. We fix thee with an iron hook unto the man who hateth us.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(प्र पत) बहिर्गच्छ (इतः) अस्मात् स्थानात् (पापि) केवलमामकभागधेयपापा०। पा० ४।१।३०। पाप-ङीप्, हे दुष्टे (लक्ष्मि) लक्षेर्मुट् च। उ० ३।१६०। लक्ष दर्शनाङ्कनयोः-ई, मुट् च। हे लक्षण (नश्य) अदृष्टा भव (इतः) (प्र) (अमुतः) दूरदेशात् (पत) (अयस्मयेन) लोहमयेन (अङ्केन) कण्टकेन (द्विषते) शत्रवे (त्वा) त्वाम् (आ) समन्तात् (सजामसि) षञ्ज सङ्गे सम्बन्धे च। सजामः। संबध्नीमः ॥

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