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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 24 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 24/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - सविता छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सविता सूक्त
    89

    यन्न॒ इन्द्रो॒ अख॑न॒द्यद॒ग्निर्विश्वे॑ दे॒वा म॒रुतो॒ यत्स्व॒र्काः। तद॒स्मभ्यं॑ सवि॒ता स॒त्यध॑र्मा प्र॒जाप॑ति॒रनु॑मति॒र्नि य॑च्छात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । न॒: । इन्द्र॑: । अख॑नत् । यत् । अ॒ग्नि: । विश्वे॑ । दे॒वा: । म॒रुत॑: । यत् । सु॒ऽअ॒र्का: । तत् । अ॒स्मभ्य॑म् । स॒वि॒ता । स॒त्यऽध॑र्मा । प्र॒जाऽप॑ति: । अनु॑ऽपति: । नि । य॒च्छा॒त् ॥२५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यन्न इन्द्रो अखनद्यदग्निर्विश्वे देवा मरुतो यत्स्वर्काः। तदस्मभ्यं सविता सत्यधर्मा प्रजापतिरनुमतिर्नि यच्छात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । न: । इन्द्र: । अखनत् । यत् । अग्नि: । विश्वे । देवा: । मरुत: । यत् । सुऽअर्का: । तत् । अस्मभ्यम् । सविता । सत्यऽधर्मा । प्रजाऽपति: । अनुऽपति: । नि । यच्छात् ॥२५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 24; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ऐश्वर्य पाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जो [ऐश्वर्य] (नः) हमारे लिये (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष ने और (यत्) जो (अग्निः) अग्निसमान तेजस्वी पुरुष ने (अखनत्) खोदा है, और (यत्) जो (विश्वे) सब (देवाः) व्यवहारकुशल, (स्वर्काः) बड़े वज्रवाले (मरुतः) शूर लोगों ने [खोदा है]। (तत्) वह [वैसा ही ऐश्वर्य] (अस्मभ्यम्) हमें (सत्यधर्म्मा) सत्यधर्मी, (प्रजापतिः) प्रजापालक, (अनुमतिः) अनुकूल बुद्धिवाला (सविता) सृष्टिकर्ता परमेश्वर (नि) नियमपूर्वक (यच्छात्) देता रहे ॥१॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार ऐश्वर्यवान्, प्रतापी, व्यवहारनिपुण, शूरवीर पुरुषों ने ऐश्वर्य पाया है, उसी प्रकार विज्ञानी सत्यपराक्रमी पुरुष परमेश्वर के अनन्त कोश से ऐश्वर्य पाते रहें ॥१॥ (मरुतः) शब्द का विशेष विवरण अ० १।२०।१। में देखो ॥

    टिप्पणी

    १−(यत्) ऐश्वर्यम् (नः) अस्मभ्यम् (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्तो मनुष्यः (अखनत्) खननेन प्राप्तवान् (यत्) (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी (विश्वे) सर्वे (देवाः) व्यवहारकुशलाः (मरुतः) अ० १।२०।१। शूराः (यत्) ऐश्वर्यम् (स्वर्काः) कृदाधारार्चिकलिभ्यः कः। उ० ३।४०। अर्च पूजायां क, चस्य कः। अर्कः=अन्नम्-निघ० २।७। वज्रः−२।२०। अर्को देवो भवति यदेनमर्चन्त्यर्को मन्त्रो भवति यदनेनार्चन्त्यर्कमन्नं भवत्यर्चति भूतान्यर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना०-निरु० ५।४। शोभनान्नाः। सुवज्रिणः। सुपण्डिताः। सुमन्त्रिणः (तत्) ऐश्वर्यम् (अस्मभ्यम्) (सविता) सर्वस्रष्टा (सत्यधर्मा) सत्यानि धर्माणि धारणसामर्थ्यानि यस्य सः (प्रजापतिः) प्रजापालकः (अनुमतिः) अनुकूलो मतिर्बुद्धिर्यस्य सः (नि) नियमेन (यच्छात्) दद्यात् ॥

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    विषय

    इन्द्र+अग्नि

    पदार्थ

    १. (न:) =  हमारे लिए (यत्) = जिस धन को (इन्द्रः अखनत्) = इन्द्र खोदता है, अर्थात् जिस गुप्त धन को हमारे लिए इन्द्र प्राप्त कराता है, (यत् अग्नि:) = जिसे अग्नि तथा (विश्वेदेवाः) = सब देव प्रात कराते हैं। (यत्) = जिसे (मरुतः स्वर्का:) = [सु अर्च] उत्तमता से पूजन करनेवाले प्राण प्राप्त कराते हैं, (तत्) = उस धन को (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (सविता) = सर्वप्रेरक (सत्यधर्मा) = सत्य का धारण करनेवाला (प्रजापति:) = प्रजाओं का रक्षक (अनुमति:) = अनुकूल मति को प्राप्त करानेवाला प्रभु (नियच्छात्) = प्राप्त कराए। २. जितेन्द्रिय [इन्द्र] आगे बढ़ने की भावनावाले [अग्नि], दिव्य गुण सम्पन्न [विश्वेदेवा] तथा प्राणसाधना के साथ प्रभु की अर्चना में प्रवृत्त होकर [स्वर्का: मरुतः] हम जिस बल व ज्ञान के ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं, वह सब हमें प्रभु ही प्राप्त कराते हैं। उस समय हम प्रभु-प्रेरणा को सुनते हुए [सविता] सत्य को धारण करनेवाले बनते है [सत्यधर्मा], और प्रजाओं के रक्षक बनकर शास्त्रानुकूल कर्मों के करने की प्रवृत्तिबाले होते हैं।

    भावार्थ

    हम जितेन्द्रिय, आगे बढ़नेवाली वृत्तिवाले, दिव्यगणों को धारण करनेवाले व प्राणसाधना कसाब प्रमु-अर्चन म प्र लोपा हों। ए एनार, सानो भा ज नागों के रक्षक, अनुकूल मतिदाता प्रभु उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त कराएंगे।

    उल्लिखित मन्त्र में निर्दिष्ट मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति ही 'मेधातिथि' है, बुद्धि के साथ चलनेवाला। यह मेधातिथि अगले पाँच सूक्तों का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (नः) हमारे (इन्द्रः) सम्राट् ने (यत्) जो खनिज पदार्थ (अखनत्) खोदा, (यत्) जो (अग्निः) अग्रणी प्रधानमन्त्री ने, (यत्) जो (विश्वे देवाः) वैश्य प्रजा ने (स्वर्काः) चमकीले वस्त्रों वाले या चमकीले वस्त्रधारी (मरुतः) सैनिकों ने खोदा, (तत्) उस सब को– (सविता) प्रेरक, (सत्यधर्मा) सत्य-धर्म वाला (प्रजापतिः) प्रजाओं का पति राजा (अनुमतिः) हम प्रजाओं के अनुकूल मति वाला हो कर (अस्मभ्यम्) हम प्रजाजनों को (नियच्छात्) नियम पूर्वक प्रदान कर दे।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में राष्ट्र की खनिज सम्पत्ति का वर्णन हुआ है। राष्ट्र में कोई भी खनिज सम्पत्ति को खोदे, उस पर स्वामित्व राष्ट्र की प्रजा का है। राजा वह सम्पत्ति नियम पूर्वक प्रजा को प्रदान, करता रहे। फिर प्रजा के निर्णय पर सम्पत्ति का वितरण किया जाय। विश्वे देवाः = विड् [वैश्य], विश्वेदेवाः (श० ब्रा० १०।४।१।९)। मरुतः = "देवसेनानामभि भञ्जतीनां मरुतो यन्त्वग्रम्,” (यजु० १७।४०)। स्वर्काः= सु + अर्कः (तपने चुरादिः) अर्कः वज्रनाम (निघं० २।२०)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Social Wealth

    Meaning

    That wealth, honour, knowledge and glory which Indra, mighty ruler, discovered and dug out, what Agni, the leading scholar, Vishvedeva, all brilliant men of the world, Maruts, vibrant citizens, and thunderous warriors discovered, created and achieved, may Savita, brilliant and inspiring Prajapati, sustainer of the people dedicated to Dharma in unison with the noble will of the people may give to us.

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    Subject

    Savitr

    Translation

    What the resplendent and the adorable Lord, all the bounties of Nature and the mighty cloud-bearing winds (Maruts) have dugu p for us, may the impeller Lord of true ordinances, the Lord of creatures, the accorder of assent assign that to us.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.25.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    May All-creating Prajapati, the Lord of the universe whose laws are true and faithful and whose working is accepted by all bestow upon us that mineral-wealth which is dug out by the King, which is dug out by learned man, which is dug out by all the scientists and which is dug out by the army-men and the men of excavation.

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    Translation

    Whatever supremacy the King, the Acharya, all the learned ministers of the state, valiant persons, and scientists bestow on us, that is really granted us by God, the Embodiment of Truth, the Nourisher of mankind, the Creator of all, and the Commander of all.

    Footnote

    Acharya means the preceptor, the instructor.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यत्) ऐश्वर्यम् (नः) अस्मभ्यम् (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्तो मनुष्यः (अखनत्) खननेन प्राप्तवान् (यत्) (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी (विश्वे) सर्वे (देवाः) व्यवहारकुशलाः (मरुतः) अ० १।२०।१। शूराः (यत्) ऐश्वर्यम् (स्वर्काः) कृदाधारार्चिकलिभ्यः कः। उ० ३।४०। अर्च पूजायां क, चस्य कः। अर्कः=अन्नम्-निघ० २।७। वज्रः−२।२०। अर्को देवो भवति यदेनमर्चन्त्यर्को मन्त्रो भवति यदनेनार्चन्त्यर्कमन्नं भवत्यर्चति भूतान्यर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना०-निरु० ५।४। शोभनान्नाः। सुवज्रिणः। सुपण्डिताः। सुमन्त्रिणः (तत्) ऐश्वर्यम् (अस्मभ्यम्) (सविता) सर्वस्रष्टा (सत्यधर्मा) सत्यानि धर्माणि धारणसामर्थ्यानि यस्य सः (प्रजापतिः) प्रजापालकः (अनुमतिः) अनुकूलो मतिर्बुद्धिर्यस्य सः (नि) नियमेन (यच्छात्) दद्यात् ॥

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