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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 26 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 26/ मन्त्र 3
    ऋषिः - मेधातिथिः देवता - विष्णुः छन्दः - त्र्यवसाना षट्पदा विराट्शक्वरी सूक्तम् - विष्णु सूक्त
    94

    यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। उ॒रु वि॑ष्णो॒ वि क्र॑मस्वो॒रु क्षया॑य नस्कृधि। घृ॒तं घृ॑तयोने पिब॒ प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यस्य॑ । उ॒रुषु॑ । त्रि॒षु । वि॒ऽक्रम॑णेषु । अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्त‍ि । भुव॑नान‍ि । विश्वा॑ । उ॒रु । वि॒ष्णो॒ इति॑ । वि । क्र॒म॒स्व॒ । उ॒रु । क्षया॑य । न॒: । कृ॒धि॒ । घृ॒तम् । घृ॒त॒ऽयो॒ने॒ । पि॒ब॒ । प्रऽप्र॑ । य॒ज्ञऽप॑तिम् । ति॒र॒ ॥२७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा। उरु विष्णो वि क्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि। घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यस्य । उरुषु । त्रिषु । विऽक्रमणेषु । अधिऽक्षियन्त‍ि । भुवनान‍ि । विश्वा । उरु । विष्णो इति । वि । क्रमस्व । उरु । क्षयाय । न: । कृधि । घृतम् । घृतऽयोने । पिब । प्रऽप्र । यज्ञऽपतिम् । तिर ॥२७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 26; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (यस्य) जिसके (उरुषु) विस्तीर्ण [उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय रूप] (त्रिषु) तीन (विक्रमणेषु) विविध क्रमों [नियमों] में (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक-लोकान्तर (अधिक्षियन्ति) भले प्रकार रहते हैं। [वही] (विष्णो) हे सर्वव्यापक विष्णु ! तू (उरु) विस्तार से (वि क्रमस्व) विक्रमी हो, और (नः) हमें (क्षयाय) ज्ञान वा ऐश्वर्य के लिये (उरु) विस्तार के साथ (कृधि) कर। (घृतयोने) हे प्रकाश के घर ! (घृतम्) घृत के समान तत्त्वरस (पिब=पायय) [हमें] पान करा और (यज्ञपतिम्) पूजनीय कर्म के रक्षक मनुष्य को (प्र प्र) अच्छे प्रकार (तिर) पार लगा ॥३॥

    भावार्थ

    जो सर्वव्यापक परमेश्वर सब लोक-लोकान्तरों का स्वामी है, सब मनुष्य उसकी उपासना से ऐश्वर्य प्राप्त करें ॥३॥ (यस्य उरुषु....) यह पाद ऋग्वेद में है-१।१५४।२। और यजु० ५।२०। (उरु विष्णो....) यह मन्त्र यजुर्वेद में है−५।३८,४१ ॥

    टिप्पणी

    ३−(यस्य) विष्णोः (उरुषु) विस्तृतेषु (त्रिषु) उत्पत्तिस्थितिप्रलयरूपेषु (विक्रमणेषु) विविधेषु क्रमेषु नियतविधानेषु (अधिक्षियन्ति) अधिकं निवसन्ति (भुवनानि) जगति (विश्वा) सर्वाणि (उरु) यथा तथा। विस्तारेण (विक्रमस्व) विक्रमी पराक्रमी भव (क्षयाय) क्षि निवासगतिहिंसैश्वर्येषु-अच्। विज्ञानस्य ऐश्वर्यस्य वोन्नतये (नः) अस्मान् (कृधि) कुरु (घृतम्) घृतवत्तत्त्वरसम् (घृतयोने) योनिर्गृहम्-निघ० ३।४। हे घृतस्य प्रकाशस्य योने गृह (पिब) अन्तर्गतणिच्। अस्मान् पायय (प्र प्र) अधिकं प्रकर्षेण (यज्ञपतिम्) पूजनीयकर्मणां पातारं पुरुषम् (तिर) तारय। पारय ॥

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    विषय

    धन ज्ञान+यज्ञशीलता

    पदार्थ

    १. (यस्य) = जिस विष्णु के (उरुषु) = विशाल (त्रिषु विक्रमणेषु) = तीन विक्रमणों-अभिप्राय: पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोक में (विश्वा भुवनानि अधिक्षियन्ति) = सब प्राणियों का निवास है, हे (विष्णो) = सर्वव्यापक प्रभो! वे आप (उरु विक्रमस्व) = इन लोकों में खूब ही विक्रमवाले होओ। कण-कण में आपका विक्रम दृष्टिगोचर हो। २. हे प्रभो! (न:) = हमारे लिए भी (क्षयाय) = निवास के लिए (उरु कृधि) = प्रभूत धनादि प्राप्त कराइए। हे (घृतयोने) = सम्पूर्ण ज्ञानदीप्ति के आधारभूत प्रभो! (घृतं पिब) = [पायय] हमें भी ज्ञानदीप्ति प्राप्त कराइए और (यज्ञपतिम्) = यज्ञशील व्यक्ति को प्रप्रतिर खूब ही बढ़ानेवाले होओ [तिरति: वर्धनार्थः]

    भावार्थ

    सम्पूर्ण लोक प्रभु के तीन विक्रमणों में स्थित हैं। प्रभु हमें निवास के लिए आवश्यक धन प्राप्त कराएँ। हमें ज्ञान दें और हम यज्ञशील लोगों का वर्धन करें। [धन के साथ ज्ञान होने पर मनुष्य विलास में न फँसकर, यज्ञशील बनता है]।

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    भाषार्थ

    (यस्य) जिस के (उरुषु) विस्तृत (त्रिषु विक्रमणेषु) तीन विक्रमणों में (विश्वा भुवनानि) सब भुवन (अधिक्षियन्ति) वसते हैं, (विष्णो) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! (ऊर) और विस्तृत (विक्रमस्व) विक्रम कर, (नः क्षयाय) हमारे निवास के लिये (ऊरु) विस्तृत (कृधि) कर। (घृतयोने) हे घृतोत्पत्ति के कारणरूप विष्णु ! (घृतं पिब) हमारी घृताहुतियों का पान कर, और (यज्ञपतिम्) यज्ञ के पति यजमान को (प्रतिर) बढ़ा, (प्र) और अधिक बढ़ा।

    टिप्पणी

    [तीन विक्रमण हैं, पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक, और ये हैं भी विस्तृत। प्रार्थी इन तीनों से परे और विस्तार चाहता है। परमेश्वर तो है भी सर्वव्यापक। प्रार्थी मोक्षावस्था पाकर तीन विस्तृत लोकों से भी परे विहरण चाहता है, जहां-जहां कि विष्णु विद्यमान है, अतः विष्णु की सत्ता सर्वत्र हो यह अभिलाषा प्रकट की गई है। जिस विष्णु ने घृतादि भोज्य पदार्थ उत्पन्न किये उस के प्रति पूर्वाहुतियां देने के पश्चात् ही व्यक्ति को उसका उपभोग करना विहित है। घृत का नाम यह दर्शाने के लिये पठित है कि "आयुर्वे घृतम्" घृत आयुवर्धक है।

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    विषय

    व्यापक प्रभु की स्तुति।

    भावार्थ

    (यस्य) जिस परमेश्वर के (उरुषु) विशाल (त्रिषु) तीनों (विक्रमणेषु) विक्रमों में या नाना प्रकार के क्रमों, सर्गों वाले तीनों प्रकार के जगतों में, ईश्वर की पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ इन तीनों प्रकार की रचनाओं में (विश्वा) समस्त (भुवना) वस्तुएं (अधि-क्षियन्ति) निवास करती हैं उस विशाल जगत् में हे (विष्णो) व्यापक परमेश्वर ! आप (उरु) उनका आच्छादन करते हुए (विक्रमस्व) नाना प्रकार से व्यापक हो रहे हो, आप (नः) हम जीवों के (क्षयाय) निवास के लिये ही (उरु) इन विशाल लोकों की (कृधि) रचना करते हो। हे (घृत-योने) क्षरणशील इस संसार के उत्पत्तिस्थान ! आश्रय ! और आदिकारण !, अथवा घृत=तेजोमय सूर्यादि लोकों के आश्रय ! आप (घृतम्) इस समस्त तेजोराशि अथवा इस क्षरणशील विश्व संसार को (पिब) पान करते हो, प्रलय काल में इसे ग्रस लेते हो, (यज्ञ-पतिं) आप यज्ञ = जीवनमय यज्ञ या देह में क्रतुमय इस जीव को (प्र प्र तिर) पार करो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मेधातिथिर्ऋषिः। विष्णुर्देवता। १ त्रिष्टुप्। २ त्रिपदा विराड् गायत्री। ३ त्र्यवसाना षट्पदा विराट् शक्करी। ४-७ गायत्र्यः। ८ त्रिष्टुप्। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Omnipresent Vishnu

    Meaning

    In your three boundless steps of creative evolution, Sattva-rajas-tamas, Mind-energy-matter, heaven-sky-earth, are contained, comprehended and sustained the entire worlds of the universe. May you, O Vishnu, come from the farthest, let your infinite presence arise, and let our spirit too arise into awareness of Infinity. O Ghrtayoni, treasure-hold of nectar-grace, accept the soma of our yajnic adoration and let the yajnapati cross over the seas of mortality to immortal bliss.

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    Translation

    Within whose three-extended paces, all these beings are covered, O sacrifice, spend far and wide. Make ample space for our living. O fire, born of melted butter -(ghrtayone), consume melted butter to your heart’s- desire. Make the sacrificer prosper, (Also Rg. X.154.2 and Yv. V.38)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.27.3AS PER THE BOOK

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    Translation

    He is the All-pervading Divinity in whose three grand arrangements all the worlds and creatures have their habitation. O All-pervading Lord! Thou pervadest everything and makes the worlds for my stay and habitation. O All-supporting Lord! thou art the prima! cause of light and thou protects the light of knowledge. Please promote the performer of yajna more and more.

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    Translation

    O God, Thou within whose three-fold vast creation all worlds and creatures have their habitation, pervadest them in extenso. Thou createst for our dwelling all these worlds. O support of luminous bodies like the Sun, Thou devourest the resplendest world at the time of dissolution. Promote this active soul more and more.

    Footnote

    See Yajur, 5-19. Threefold creation: Earth, Space, Sky. It may also mean Creation, Sustenance and Dissolution. At the time of Dissolution God engulfs the whole universe, by resolving Matter into atoms.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(यस्य) विष्णोः (उरुषु) विस्तृतेषु (त्रिषु) उत्पत्तिस्थितिप्रलयरूपेषु (विक्रमणेषु) विविधेषु क्रमेषु नियतविधानेषु (अधिक्षियन्ति) अधिकं निवसन्ति (भुवनानि) जगति (विश्वा) सर्वाणि (उरु) यथा तथा। विस्तारेण (विक्रमस्व) विक्रमी पराक्रमी भव (क्षयाय) क्षि निवासगतिहिंसैश्वर्येषु-अच्। विज्ञानस्य ऐश्वर्यस्य वोन्नतये (नः) अस्मान् (कृधि) कुरु (घृतम्) घृतवत्तत्त्वरसम् (घृतयोने) योनिर्गृहम्-निघ० ३।४। हे घृतस्य प्रकाशस्य योने गृह (पिब) अन्तर्गतणिच्। अस्मान् पायय (प्र प्र) अधिकं प्रकर्षेण (यज्ञपतिम्) पूजनीयकर्मणां पातारं पुरुषम् (तिर) तारय। पारय ॥

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