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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 26 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 26/ मन्त्र 8
    ऋषिः - मेधातिथिः देवता - विष्णुः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - विष्णु सूक्त
    78

    दि॒वो वि॑ष्ण उ॒त वा॑ पृ॑थि॒व्या म॒हो वि॑ष्ण उ॒रोर॒न्तरि॑क्षात्। हस्तौ॑ पृणस्व ब॒हुभि॑र्वस॒व्यैरा॒प्रय॑च्छ॒ दक्षि॑णा॒दोत स॒व्यात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दि॒व: । वि॒ष्णो॒ इति॑ । उ॒त । वा॒ । पृ॒थि॒व्या: । म॒ह: । वि॒ष्णो॒ इति॑ । उ॒रो: । अ॒न्तरि॑क्षात् । हस्तौ॑ । पृ॒ण॒स्व॒ । ब॒हुऽभि॑: । व॒स॒व्यै᳡: । आ॒ऽप्रय॑च्छ । दक्षि॑णात् । आ । उ॒त । स॒व्यात् ॥२७.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दिवो विष्ण उत वा पृथिव्या महो विष्ण उरोरन्तरिक्षात्। हस्तौ पृणस्व बहुभिर्वसव्यैराप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दिव: । विष्णो इति । उत । वा । पृथिव्या: । मह: । विष्णो इति । उरो: । अन्तरिक्षात् । हस्तौ । पृणस्व । बहुऽभि: । वसव्यै: । आऽप्रयच्छ । दक्षिणात् । आ । उत । सव्यात् ॥२७.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 26; मन्त्र » 8
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    हिन्दी (4)

    विषय

    व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (विष्णो) हे सर्वव्यापक विष्णु ! (दिवः) सूर्य लोक से (उत) और (पृथिव्याः) पृथिवी लोक से, (वा) अथवा, (विष्णो) हे विष्णु ! (महः) बड़े (उरोः) चौड़े (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष लोक से (बहुभिः) बहुत से (वसव्यैः) धनसमूहों से (हस्तौ) दोनों हाथों को (पृणस्व) भर (उत) और (दक्षिणात्) दाहिने (उत) और (सव्यात्) बायें हाथ से (आप्रयच्छ) अच्छे प्रकार से दान कर ॥८॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वररचित सूर्य, पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि लोक-लोकान्तर और सब पदार्थों से विज्ञानपूर्वक उपकार लेकर धन आदि की प्राप्ति से आनन्द भोगें ॥८॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजु० में है−५।१९ ॥

    टिप्पणी

    ८−(दिवः) प्रकाशमानात् सूर्यात् (विष्णो) हे सर्वव्यापक ! (उत) अपि (वा) अथवा (पृथिव्याः) भूलोकात् (महः) मह-क्विप्। विशालात् (उरोः) उरुणः। विस्तीर्णात् (अन्तरिक्षात्) आकाशात् (हस्तौ) करौ (पृणस्व) पूरय (बहुभिः) अधिकैः (वसव्यैः) वसोः समूहे च। पा० ४।४।१४०। वसु-यत्। वसूनां धनानां समूहैः (आप्रयच्छ) समन्ताद् देहि (दक्षिणात्) दक्षिणहस्तात् (आ) चार्थे (उत) अपि (सव्यात्) वामहस्तात् ॥

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    विषय

    प्रकाश, विशालता, दृढ़ता

    पदार्थ

    १. हे (विष्णो) = व्यापक प्रभो! (दिवः) = द्युलोक से (उत वा) = और (पृथिव्याः) = इस पृथिवीलोक से और हे विष्णो व्यापक प्रभो! इस( महः उरो: अन्तरिक्षात्) = महान् विशाल अन्तरिक्ष से (बहुभिः वसव्यैः) = बहुत वसुओं के [निवास के लिए आवश्यक धनों के] समूहों से (हस्तौ प्रणस्व) = अपने हाथों को पूरित कीजिए और उस प्रभूत धनराशि को (दक्षिणात्) = दाहिने हाथ से (उत) = और (सव्यात्) = बायें हाथ से (आप्रयच्छ) = हमारे लिए सभी ओर से प्राप्त कराइए।

    भावार्थ

    प्रभु हमें तीनों लोकों के धनों को प्राप्त करानेवाले हों। प्रभु हमें घलोक से 'प्रकाश', अन्तरिक्ष से 'विशालता' व पृथिवी से 'दृढ़ता' प्राप्त कराएँ। हमारा मस्तिष्क दीस हो, हृदय विशाल हो तथा शरीर दृढ़ हो।

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    भाषार्थ

    (विष्णो) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! (दिवः) द्युलोक से, (उत वा) अथवा (पृथिव्याः) पृथिवी से, (विष्णो) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! (महः, उरोः) महाविस्तृत (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से, (बहुभिः, वसव्यैः) बहुत धनराशि द्वारा (हस्तौ१) दोनों हाथ (पृणस्व) भर ले, और (दक्षिणात्) दाएं हाथ से (आ प्रयच्छ) दे, (उत) तथा (सव्यात्) बाएं से (आ प्रयच्छ) दे।

    टिप्पणी

    [वसव्यैः = वसूनां समूहैः “वसोः समूहे च" (अष्टा० ४।४।१४०) इति यत्प्रत्ययः। परमेश्वर के हाथ कविता में है, क्योंकि हाथों से दिया जाता है। अथवा "दे उतना धन जितना कि कोई दाएं-बाएं हाथों द्वारा अञ्जलि भर कर देता है"]। [१. अथवा "हमारे दोनों हाथ भर दे, और इस निमित्त हमारे दाहिने तथा बाएं पार्श्वो से हमें प्रदान कर"।]

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    विषय

    व्यापक प्रभु की स्तुति।

    भावार्थ

    हे (विष्णो) व्यापक परमेश्वर ! आप (दिवः) द्युलोक से (उत वा) और (पृथिव्याः) पृथिवी लोक से और (महः) बड़े (उरोः) विशाल (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष लोक से प्राप्त होने योग्य (बहुभिः) बहुत से (वसव्यैः) धनों द्वारा (हस्तों) अपने ज्ञान और कर्म के दोनों हस्तों को (पृणस्व) भर ले और (दक्षिणात्) दायें (उत) और (सव्यात्) बायें, दोनों हाथों से, (आ प्र यच्छ) हमें प्रदान करे।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘दिवोवा विष्णा’ (द्वि०) ‘महोवा’ इति यजु०। ‘उभा हि माता वसुना पृणस्व’ इति यजु०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मेधातिथिर्ऋषिः। विष्णुर्देवता। १ त्रिष्टुप्। २ त्रिपदा विराड् गायत्री। ३ त्र्यवसाना षट्पदा विराट् शक्करी। ४-७ गायत्र्यः। ८ त्रिष्टुप्। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Omnipresent Vishnu

    Meaning

    O Vishnu, Lord omnipresent, all commanding, we pray: From the regions of heaven give us light, from the vast sky give us energy, from the earth give us food and plenty with peace and joy, and from the womb of nature, Mahat form of the creative mode, bless us and fill our life to the full with both hands right and left, from both sides, right and left.

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    Translation

    O sun-divine, whether from heaven, or from earth, or from the vast and wide-spread interspace, fill your two hands, O sun-divine, with plentiful treasures and grant to us with your right hand and with the left as well (daksinat-savyat). (Also Yu. V19)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.27.8AS PER THE BOOK

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    Translation

    O All-pervading Divinity! from heavenly region, O Omnipresent one! from the grand earth and from the vast middle region fill my both hands with various wealth and make me give (it to others) from my right hand and from my left hand.

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    Translation

    O Omnipresent God, fill both of our hands with riches derived from all sources like electricity, earth, and vast wide air's mid-region. Grant us pleasures from the right and the left.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(दिवः) प्रकाशमानात् सूर्यात् (विष्णो) हे सर्वव्यापक ! (उत) अपि (वा) अथवा (पृथिव्याः) भूलोकात् (महः) मह-क्विप्। विशालात् (उरोः) उरुणः। विस्तीर्णात् (अन्तरिक्षात्) आकाशात् (हस्तौ) करौ (पृणस्व) पूरय (बहुभिः) अधिकैः (वसव्यैः) वसोः समूहे च। पा० ४।४।१४०। वसु-यत्। वसूनां धनानां समूहैः (आप्रयच्छ) समन्ताद् देहि (दक्षिणात्) दक्षिणहस्तात् (आ) चार्थे (उत) अपि (सव्यात्) वामहस्तात् ॥

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