अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 28 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 28/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - मेधातिथिः देवता - वेदः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - स्वस्ति सूक्त
    पदार्थ -

    (वेदः) वेद [ईश्वरीय ज्ञान] (स्वस्तिः) मङ्गलकारी हो, (द्रुघणः) मुद्गर [मोगरी] (स्वस्तिः) मङ्गलकारी हो, (वेदिः) वेदी [यज्ञभूमि, हवनकुण्ड आदि], (परशुः) फरसा [वा गड़ासी] और (परशुः) कुल्हाड़ी (नः) हमें (स्वस्ति) मङ्गलकारी हो। (हविष्कृतः) देने लेने योग्य व्यवहार करनेवाले, (यज्ञियाः) पूजनीय, (यज्ञकामाः) मिलाप चाहनेवाले (ते) वे (देवासः) विद्वान् लोग (इमम्) इस (यज्ञम्) यज्ञ [पूजनीय कर्म को] (जुषन्ताम्) स्वीकार करें ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य वेदज्ञान द्वारा सब उचित सामग्री लेकर विद्वानों के सत्सङ्ग से अग्नि में हवन तथा शिल्प सम्बन्धी संयोग-वियोग आदि क्रिया करके आनन्दित रहें ॥१॥

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