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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वा देवता - जातवेदाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सपत्नीनाशन सूक्त
    66

    इ॒मा यास्ते॑ श॒तं हि॒राः स॒हस्रं॑ ध॒मनी॑रु॒त। तासां॑ ते॒ सर्वा॑साम॒हमश्म॑ना॒ बिल॒मप्य॑धाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒मा: । या: । ते॒ । श॒तम् । हि॒रा: । स॒हस्र॑म् । ध॒मनी॑: । उ॒त । तासा॑म् । ते॒ । सर्वा॑साम् । अ॒हम् । अश्म॑ना । बिल॑म् । अपि॑ । अ॒धा॒म् ॥३६.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इमा यास्ते शतं हिराः सहस्रं धमनीरुत। तासां ते सर्वासामहमश्मना बिलमप्यधाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इमा: । या: । ते । शतम् । हिरा: । सहस्रम् । धमनी: । उत । तासाम् । ते । सर्वासाम् । अहम् । अश्मना । बिलम् । अपि । अधाम् ॥३६.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 35; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे राजन् !] (ते) तेरी (इमाः) यह (याः) जो (शतम्) सौ [बहुत] (हिराः) सूक्ष्म नाड़ियाँ (उत) और (सहस्रम्) सहस्र [अनेक] (धमनीः) स्थूल नाड़ियाँ हैं। (ते) तेरी (तासाम्) उन (सर्वासाम्) सब [नाड़ियों] के (बिलम्) छिद्र को (अहम्) मैं [प्रजागण] ने (अश्मना) व्यापक [अथवा पाषाण समान दृढ़] उपाय से (अपि) निश्चय करके (अधाम्) पुष्ट किया है ॥२॥

    भावार्थ

    प्रजागण राजा की शारीरिक और आत्मिक शक्ति बढ़ा कर उसे सदा प्रसन्न रक्खें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(इमाः) शरीरस्थाः (याः) (ते) त्वदीयाः (शतम्) बहुसंख्याकाः (हिराः) अ० १।१७।१। सूक्ष्मा नाड्यः (सहस्रम्) अनेकाः (धमनीः) अ० १।१७।२। स्थूला नाड्यः (उत) अपि (तासाम्) (ते) त्वदीयानाम् (सर्वासाम्) नाडीनाम् (अहम्) प्रजागणः (अश्मना) अ० १।२।२। व्यापकेनोपायेन। यद्वा पाषाणवद्दृढोपायेन (बिलम्) बिल भेदने-क। बिलं भरं भवति बिभर्त्तेः-निरु० २।१७। छिद्रम् (अपि) निश्चयेन (अधाम्) धाञो लुङ्। पोषितवानस्मि ॥

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    विषय

    पत्नी के रुधिर-स्त्राव का निरोध

    पदार्थ

    १.हे स्त्रि! (इमाः) = ये (या:) = जो (ते) = तेरी (शतं हिरा:) = सैकड़ों नाडियाँ-गर्भधारण के लिए अन्दर स्थित सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, (ते) = तेरी (तासां सर्वासाम्) = उन सब नाड़ियों के (बिलम्) = छेद को रुधिर-नाव के कारणभूत विच्छेद को (अश्मना) = पाषाणविशेष से-फिटकरी से अपि अधाम् आच्छादित करता हूँ। विच्छेद को रोककर स्नाव को बन्द करता हूँ।

    भावार्थ

    नाड़ी-विच्छेद के कारण स्त्राव प्रारम्भ होने पर स्वास्थ्य के विकृत होने की आशंका बढ़ती ही जाएगी और गर्भस्थ सन्तान पर भी उसका परिणाम अशुभ होगा। एवं, यह विच्छेद शीघ्रातिशीघ्र चिकित्स्य है ही।

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    भाषार्थ

    [हे स्त्री!] (इमाः याः ते) ये जो तेरी (शतम्, हिराः) सौ सिराएं हैं (उत) और (सहस्रम् धमनीः) हजार धमनियां हैं, (ते) तेरी (तासाम् सर्वासाम्) उन सब सिराओं और धमनियों के (बिलम्) मुखों को (अहम् अपि अधाम्= पि अधाम्) मैंने बन्द कर दिया है, जैसे कि (अश्मना) पत्थर द्वारा (बिलम्) बिल को बन्द कर दिया जाता है।

    टिप्पणी

    [हिराः का अर्थ है गर्भाशय की सिराएं, नीले रक्त की नाड़ियां। और धमनीः का अर्थ है धम-धम शब्द करती हुई शुद्धरक्त की गर्भस्थ नाड़ियां। इन्हें Veins and Arteries कहते हैं। शतम्, सहस्रम् शब्द अज्ञात संख्या के निर्देशक हैं। इन्हें बन्द करने का प्रयोजन यह है ताकि इन में रक्त का प्रवाह न हो, और न "रजःकणों" का ही प्रवाह हो। रजःकणों के अभाव में गर्भस्थिति नहीं होती]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Noble Social Order

    Meaning

    These veins of your system which are in hundreds and the nerves and arteries which are in thousands I watch, and the loophole or leakage of them all I have close up with innviolable cover.

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    Translation

    Of the hundred veins (hira) that you have, -and of the thousand arteries (dhamani), the holes in all of them, I cover up with a stone-plaster (asmana).

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.36.2AS PER THE BOOK

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    Translation

    O ailing King! the physician close the holes of all the small and large nerves of your body which are hundreds and thousands in number respectively to stop the blood flow by the use Of ashman, the calcium product of Ashman.

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    Translation

    O King thou hast got hundreds of subtle and thousands of gross veins. I stop the defects of all of thy veins, with measures strong like a stone.

    Footnote

    The king has got various sources of acquiring power and sucking the blood of the subjects, which the people should stop. I: the leader of the public.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(इमाः) शरीरस्थाः (याः) (ते) त्वदीयाः (शतम्) बहुसंख्याकाः (हिराः) अ० १।१७।१। सूक्ष्मा नाड्यः (सहस्रम्) अनेकाः (धमनीः) अ० १।१७।२। स्थूला नाड्यः (उत) अपि (तासाम्) (ते) त्वदीयानाम् (सर्वासाम्) नाडीनाम् (अहम्) प्रजागणः (अश्मना) अ० १।२।२। व्यापकेनोपायेन। यद्वा पाषाणवद्दृढोपायेन (बिलम्) बिल भेदने-क। बिलं भरं भवति बिभर्त्तेः-निरु० २।१७। छिद्रम् (अपि) निश्चयेन (अधाम्) धाञो लुङ्। पोषितवानस्मि ॥

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