अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 38/ मन्त्र 5
ऋषिः - अथर्वा
देवता - आसुरी वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - केवलपति सूक्त
96
यदि॒ वासि॑ तिरोज॒नं यदि॑ वा न॒द्यस्तिरः। इ॒यं ह॒ मह्यं॒ त्वामोष॑धिर्ब॒द्ध्वेव॒ न्यान॑यत् ॥
स्वर सहित पद पाठयदि॑। वा॒ । असि॑ । ति॒र॒:ऽज॒नम् । यदि॑ । वा॒ । न॒द्य᳡: । ति॒र: । इ॒यम् । ह॒ । मह्य॑म्। त्वाम् । ओष॑धि: । ब॒ध्द्वाऽइ॑व । नि॒ऽआन॑यत् ॥३९.५॥
स्वर रहित मन्त्र
यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः। इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत् ॥
स्वर रहित पद पाठयदि। वा । असि । तिर:ऽजनम् । यदि । वा । नद्य: । तिर: । इयम् । ह । मह्यम्। त्वाम् । ओषधि: । बध्द्वाऽइव । निऽआनयत् ॥३९.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थ
[हे पति !] तू (यदि वा) चाहे (तिरोजनम्) मनुष्यों से अदृष्ट स्थान में (असि) है, (यदि वा) चाहे (नद्यः) नदियाँ (तिरः) बीच में हैं। (इयम्) यह [प्रतिज्ञारूप] (ओषधिः) ओषधि (मह्यम्) मेरे लिये (ह) ही (त्वाम्) तुझको (बध्वा इव) बाँध कर जैसे (न्यानयत्) लेआवे ॥५॥
भावार्थ
मनुष्य वाणिज्य, युद्ध आदि के लिये दूर परदेशों में जाकर अपने देश को लौटा करें ॥५॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी
५−(यदि वा) अथवा (असि) भवसि (तिरोजनम्) क्रियाविशेषणमेतत्। तिरोऽन्तर्हितोऽदृष्टो जनो यस्मिन्स्थाने तस्मिन् (यदि वा) (नद्यः) सरितः (तिरः) तिरोभूत्वा व्यवधानेन वर्तन्ते (इयम्) प्रतिज्ञारूपा (ह) एव (मह्यम्) मदर्थम् (त्वाम्) पतिम् (ओषधिः) (बद्ध्वा) निगृह्य (इव) (न्यानयत्) नयतेर्लेटि, अडागमः। नितरामानयेत् ॥
विषय
वैवाहिक प्रतिज्ञा से पति का पत्नी के प्रति झुकाव
पदार्थ
१. पत्नी कहती है कि हे पते! (यदि वा) = चाहे आप तिरोजनं असि-लोगों से तिरोहित प्रदेश में कहीं हैं, (यदि वा) = अथवा (नद्यः तिर:) = निमगा नदियाँ [आवयोर्व्यवधायिकाः] हममें व्यवधान करनेवाली हैं तो भी (ह) = निश्चय से (इयं ओषधिः) = यह ('प्रेतो मुञ्चतु मा पते: स्वाहा') = इन शब्दों में की गई प्रतिज्ञारूप ओषधि (त्वाम्) = आपको बध्वा (इव) = मानो बाँधकर (महा नि आनयत्) = मरे लिए निरन्तर प्राप्त करानेवाली हो। मेरी यह प्रतिज्ञा आपको मेरे प्रति प्रीतिवाला बनाए।
भावार्थ
पत्नी की पातिव्रत्य की प्रतिज्ञा पति को पत्नी के प्रति प्रेमोन्मुख करनेवाली होती गत मन्त्रों में वर्णित प्रकार से वर्तनवाले पति-पली ही बुद्धिमान हैं। वे 'प्रस्कण्व'-मेधावी हैं। अगले सात सूक्तों का ऋषि यह 'प्रस्कण्व' ही है।
भाषार्थ
[हे पतिः] (यदि वा) यदि (तिरोजनम्) किसी जनता या जनपद द्वारा तू तिरोहित अन्तर्हित (असि) हुआ है, (यदि वा) अथवा (नद्यः) नदियां (तिरः) तेरी तिरोधायक हुई है, तो (इयम्, ओषधिः) यह औषधि (त्वाम्) तुझ को (बद्ध्वा इव) मानों बान्ध कर (मह्यम्) मेरे लिये, (ह) निश्चय से (न्यानयत्) वापिस लाएगी, या लाए।
टिप्पणी
[ओषधि है पत्नी के अन्तःहृदय में पति के प्रति अनुराग। वैमनस्य के कारण पति कहीं चला गया प्रतीत होता है। पत्नी को विश्वास है कि उसका अनुरागाविष्ट सततानुचिन्तन पति को वापिस ले आएगा। सूक्त में भेषज और ओषधि शब्द गौणार्थ में प्रयुक्त हुए हैं। यजुर्वेद में भी भेषज शब्द गौणार्थ में प्रयुक्त हुआ है। यथा- "भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम्। सुखं मेषाय मेष्यै" (३।५९)। इस पर "उवट" लिखते हैं कि "हे रुद्र ! यस्त्वं स्वभावत एव भेषजमौषधं भवसि"। तथा महीधर लिखते हैं कि "हे रुद्र ! त्वं भेषजमसि, औषधवत्सर्वोपद्रवनिवारकोऽसि।" तिरः= अन्तर्धानम्। यथा "तिरोऽन्तधौ" (अष्टा० १।४।७९)। न्यानयत् = नितरां आनमत्]।
विषय
स्वयंवर-विधान।
भावार्थ
हे मेरे अभिलाषी पुरुष ! (यदि वा) चाहे तू (तिरः जनम्) जनों से भी परे, अरण्यों में (यदि वा) और चाहे (नद्यः) नदी के भी (तिरः) पार हो। (इयम्) यह (ओषधिः) ओषधि जिसको मैं स्वयंवरा कन्या धारण करती हूं, (त्वाम्) तुझको (मह्यम्) मेरे लिए, मुझे प्राप्त होने के लिये (बद्ध्वा इव) मानों बांध कर इस जन सभा में (नि आनयत्) अवश्य लायेगी।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। १, २, ४, ५ अनुष्टुप्। ३ चतुष्पादुष्णिक्। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Marriage Vow
Meaning
If you are far away from our people, if you are beyond the rivers, this herbal token of love would draw you back home as the one tied in bond, as you are.
Translation
Even if you are away from men (at some traceable place), or even if you go across the rivers away from me, this herb will bring you, as if tied and bound fast.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.39.5AS PER THE BOOK
Translation
If you, O husband or wife! are far away from the men of family, if you are far away beyond the river, this herb may seem to bind you fast and bring you back to me.
Translation
O husband, if thou are far away beyond the rivers, far away from men, this nuptial vow will seem to bind thee fast and bring thee back to me.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(यदि वा) अथवा (असि) भवसि (तिरोजनम्) क्रियाविशेषणमेतत्। तिरोऽन्तर्हितोऽदृष्टो जनो यस्मिन्स्थाने तस्मिन् (यदि वा) (नद्यः) सरितः (तिरः) तिरोभूत्वा व्यवधानेन वर्तन्ते (इयम्) प्रतिज्ञारूपा (ह) एव (मह्यम्) मदर्थम् (त्वाम्) पतिम् (ओषधिः) (बद्ध्वा) निगृह्य (इव) (न्यानयत्) नयतेर्लेटि, अडागमः। नितरामानयेत् ॥
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