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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 44 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 44/ मन्त्र 1
    ऋषिः - प्रस्कण्वः देवता - इन्द्रः, विष्णुः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - इन्द्राविष्णु सूक्त
    68

    उ॒भा जि॑ग्यथु॒र्न परा॑ जयेथे॒ न परा॑ जिग्ये कत॒रश्च॒नैन॑योः। इन्द्र॑श्च विष्णो॒ यदप॑स्पृधेथां त्रे॒धा स॒हस्रं॒ वि तदै॑रयेथाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒भा । जि॒ग्य॒थु॒: । न । परा॑ । ज॒ये॒थे॒ इति॑ । न । परा॑ । जि॒ग्ये॒ । क॒त॒र: । च॒न । ए॒न॒यो॒: । इन्द्र॑: । च॒ । वि॒ष्णो॒ इति॑ । यत् । अप॑स्पृधेथाम् । त्रे॒धा । स॒हस्र॑म् । वि । तत् । ऐ॒र॒ये॒था॒म् ॥४५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनयोः। इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उभा । जिग्यथु: । न । परा । जयेथे इति । न । परा । जिग्ये । कतर: । चन । एनयो: । इन्द्र: । च । विष्णो इति । यत् । अपस्पृधेथाम् । त्रेधा । सहस्रम् । वि । तत् । ऐरयेथाम् ॥४५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 44; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    सभा और सेना के स्वामी के कर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (विष्णो) हे बिजुली [के समान व्याप्त होनेवाले सभापति !] (च) और (इन्द्रः) हे वायु [के समान ऐश्वर्यवान् सेनापति !] (उभा) तुम दोनों ने [शत्रुओं को] (जिग्यथुः) जीता है, और तुम दोनों (न) कभी नहीं (परा जयेथे) हारते हो, (एनयोः) इन [तुम] दोनों में से (कतरः चन) कोई भी (न) नहीं (परा जिग्ये) हारा है। (यत्) जब (अपस्पृधेथाम्) तुम दोनों ललकारे हो, (तत्) तब (सहस्रम्) असंख्य [शत्रु सेनादल] को (त्रेधा) तीन विधि पर [ऊँचे, नीचे और मध्य स्थान में] (वि) विविध प्रकार से (ऐरयेथाम्) तुम दोनों ने निकाल दिया है ॥१॥

    भावार्थ

    जहाँ पर सभापति और सेनापति पराक्रमी, प्रतापी और नीतिमान् होते हैं, वहाँ शत्रु लोग नहीं ठहरते ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-६।६९।८। इसका भाष्य यहाँ महर्षि दयानन्द के आशय पर किया गया है ॥

    टिप्पणी

    १−(उभा) इन्द्राविष्णू। सभासेनेशौ (जिग्यथुः) लिटि रूपम्। युवां जितवन्तौ शत्रून् (न) निषेधे (परा जयेथे) लटि रूपम्। पराजयं प्राप्नुथः (न) (पराजिग्ये) पराजितो बभूव (कतरः) द्वयोर्मध्य एकतरः (चन) अपि (एनयोः) अनयोर्मध्ये (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् वायुवद्वर्तमानः सेनापतिस्त्वम् (विष्णो) विद्युद्वद्व्यापनशील सभापते (यत्) यदा (अपस्पृधेथाम्) अपस्पृधेथामानृचुरा०। पा० ६।१।३६। स्पर्धतेर्लङि द्विर्वचनं सम्प्रसारणं च। अस्पर्धेथाम् शत्रुभिः सह (त्रेधा) त्रिप्रकारेण, उच्चनीचमध्यस्थानेन (सहस्रम्) असंख्यं शत्रुसैन्यम् (वि) विशेषेण (तत्) तदा (ऐरयेथाम्) ईर-लङ्। बहिष्कृतवन्तौ ॥

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    विषय

    इन्द्राविष्णू

    पदार्थ

    १. 'इन्द्र' जितेन्द्रिय पुरुष है-इन्द्रियों का अधिष्ठाता। 'विष्णु' विष् व्याप्ती, व्यापक व उदार हृदयवाला है। इन्द्र और विष्णु ये उभा दोनों ही जिग्यथ:-विजयी होते हैं, न पराजयेथे-ये कभी पराजित नहीं होते। एनयो:-इन दोनों में से कतरः चन-कोई भी न पराजिग्ये-पराजित नहीं होता। 'जितेन्द्रियता व उदारता' विजय-ही-विजय का साधन हैं। २. हे विष्णो-विष्णो! तू इन्द्रः च-और इन्द्र यत् अपस्पृधेथाम्-जब परस्पर एक-दूसरे से बढ़कर विजय की स्पर्धावाले होते हो, तत्-तब सहस्त्रम्-[सहस् शक्ति] बड़ी प्रबलता के साथ त्रेधा वि ऐरयेथाम्-तीन प्रकार से शत्रुओं को कम्पित करके दूर भगानेवाले होते हो। 'काम' को दूर भगाकर आप इस पृथिवीरूप शरीर का रक्षण करते हो। क्रोध को दूर करके हृदयान्तरिक्ष को शान्त बनाते हो तथा लोभ के बिनाश से अनावृत्त मस्तिष्क-गगन में ज्ञानसूर्य को दीप्त करते हो। 'स्वास्थ्य, शान्ति व दीप्ति' की प्राप्ति हो त्रेधा विक्रमण है।

    भावार्थ

    हम जितेन्द्रिय व उदारहृदय बनकर विजयी बनें। काम-क्रोध-लोभ को पराजित करके हम स्वस्थ, शान्त व दीस जीवनवाले हों।

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    भाषार्थ

    (विष्णो) हे विष्णु (इन्द्रः च) और इन्द्र तुम (उभा) दोनों (जिग्यथुः) विजयी होते हो, (न पराजयेथे) पराजित नहीं होते, (एनयोः) इन दोनों में से (कतरः चन) कोई एक [अकेला] भी (न पराजिग्ये) कभी पराजित नहीं हुआ या होता। (यत्) जब (अपस्पृधेथाम्१) दोनों किसी के साथ स्पर्धा करते हैं (तत्) तब (त्रेधा) तीन प्रकार से (सहस्रम्) हजारों शत्रु-सैनिकों को (व्यैरयेथाम्) ये तितर-बितर कर देते हैं।

    टिप्पणी

    [व्यैरयेथाम्= वि + ईर गतौ कम्पने च (अदादिः)। इन्द्र= सम्राट्, साम्राज्याधिपति। "इन्द्रश्च सम्राट" (यजु० ८।३७)। विष्णु [सम्भवतः मुख्य सेनापति ? ]। त्रेधा= स्थल, जल और अन्तरिक्ष में तीन प्रकार के युद्धों में, या जल स्थल और पर्वतीय युद्धों में। "इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्" (ऋ० १।२२।१७) में विष्णु अर्थात् सूर्य के [आधिदैविकार्थ में] "त्रेधा विक्रमों" और "त्रेधा पदनिधानों" का वर्णन हुआ है। राजनैतिक [आधिभौतिक] [अर्थ में विष्णु, सम्भवतः मुख्य सेनापति द्वारा तीन स्थानों पर "त्रेधा" द्वारा युद्ध का वर्णन अभिप्रेत हो। सायणाचार्य ने ७।४२।३ की व्याख्या में "विष्णो" का अर्थ सूर्य न कर "व्यापनशीलस्य इन्द्रस्य वा" अर्थ किया है। इस प्रकार प्रकरणानुसार कहीं-कहीं यौगिक पद्धति का प्राश्रय लेना पड़ता है]। [१ "स्पर्धा" यतः चेतनधर्म है, साथ ही मन्त्र में जय-पराजय का कथन हुआ है, इसलिये इन्द्र अर्थात् सम्राट् का सहयोगी विष्णु सेनापति समझा जा सकता है। अथवा आधिदैविक दृष्टि में इन्द्र द्वारा अन्तरिक्षस्थ विद्युत् समझी जा सकती है। यथा "वायुर्वा, इन्द्रो वा, अन्तरिक्षस्थानः" (निरुक्त ७।२।५), और विष्णु तो प्रसिद्ध सूर्य ही है। "स्पर्धा" आदि के सम्बन्ध में निरुक्तकार का कथन है कि "यथो एतच्चेतनावद्धि स्तुतयो भवन्तीति, अचेतनान्यप्येवं स्तूयन्ते" (७।२।७) समाधानरूप हो सकता है। "सहस्रम्" पद द्वारा हजारों रोगकीटाणु समझने चाहिये जिनका कि विनाश सूर्य करता है। यथा 'उद्यन् सूर्यः क्रिमीन् हन्तु निम्रोचन हन्तु रश्मिभिः" (अथर्व० २।३२।१)। उदित तथा अस्त होते सूर्य की लाल रश्मियों में रोगकीटाणुओं के हनन करने का निर्देश मन्त्र ने किया है। सूर्यरश्मि-चिकित्सा द्वारा भी हनन सम्भव है। वेदों में अन्तरिक्षस्थ विद्युत् और मेघरूपी वृत्रासुरों के युद्धों का भी वर्णन होता है। वर्षर्तु में भिन्न-भिन्न स्थानों की दृष्टि से मेघ-वृत्रासुरों की संख्या कई हजार होती ही है। सम्भवतः मन्त्र में विद्युत्-चिकित्सा का निर्देश भी हो जिस द्वारा हजारों रोगकीटाणुओं का हनन हो सके।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Presence and Power Divine

    Meaning

    Vishnu, omnipresent Divinity, Indra, omnipotent force of Divinity, you are always victorious, you are never defeated, no one can subdue you. When you both challenge, you subdue the enemy you fight thousands and three-ways disperse them. (Indra and Vishnu have been interpreted by Swami Dayananda as commander of the forces and ruler of a Rashtra. On the cosmic level, Vishnu may be interpreted as the omnipresent creator, and Indra, as his cosmic will, and the battles as the dynamics of evolution three-ways: Sattva, Rajas and Tamas modes of Prakrti. In the spiritual sense, Vishnu may be interpreted as the divine presence, and Indra as as the human soul. When the human being acts under the umbrella of God, all adversarial negativities are subdued.)

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    Subject

    Indrah and Visnuh (Pair)

    Translation

    Both of them win; they two are never defeated. Neither of them has ever been vanquished. O resplendent Lord (Indra) and O sacrifice (Visnu), when you complete, you scatter thousands in three (tredha) directions.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.45.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    Both of the air and electricity come out victorious in their operations, they are never conquered by anyone, either of these two is not ever defeated, if these air and electricity come in rivalry they produce this world in three division.

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    Translation

    O man, some words uttered for thee are full of praise, and some of calumny. Listen to them all with an unperturbed mind. In this soul are laid three speeches, one of them comes out in various ways, in the form of words.

    Footnote

    One should gladly listen to praise and abuse, without losing his balance of mind. Three speeches: (1) परा (Para) which remains nascent in the soul. (2) पस्यन्ती (Pashyantt) which conies in the mind of a speaker in the form of resolve (3) मध्यमा (Madhyama) which remains hidden in a man’s resolves and gives him pain and pleasure. The fourth kind of speech is वैखरी (Vaikheri) which comes out of the mouth in -the form of utterances. The first three remain hidden. Some commentators are of the view that परा resides in the navel,पश्यन्ती in the heart मध्यमा in the upper part of the chest.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(उभा) इन्द्राविष्णू। सभासेनेशौ (जिग्यथुः) लिटि रूपम्। युवां जितवन्तौ शत्रून् (न) निषेधे (परा जयेथे) लटि रूपम्। पराजयं प्राप्नुथः (न) (पराजिग्ये) पराजितो बभूव (कतरः) द्वयोर्मध्य एकतरः (चन) अपि (एनयोः) अनयोर्मध्ये (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् वायुवद्वर्तमानः सेनापतिस्त्वम् (विष्णो) विद्युद्वद्व्यापनशील सभापते (यत्) यदा (अपस्पृधेथाम्) अपस्पृधेथामानृचुरा०। पा० ६।१।३६। स्पर्धतेर्लङि द्विर्वचनं सम्प्रसारणं च। अस्पर्धेथाम् शत्रुभिः सह (त्रेधा) त्रिप्रकारेण, उच्चनीचमध्यस्थानेन (सहस्रम्) असंख्यं शत्रुसैन्यम् (वि) विशेषेण (तत्) तदा (ऐरयेथाम्) ईर-लङ्। बहिष्कृतवन्तौ ॥

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