अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 47 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 47/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - कुहूः छन्दः - जगती सूक्तम् - कुहू सूक्त
    पदार्थ -

    (सुकृतम्) सुन्दर काम करनेवाली, (विद्मनापसम्) कर्तव्यों को जाननेवाली, (देवीम्) दिव्यगुणवाली (कुहूम्) कुहू, अर्थात् अद्भुत स्वभाववाली स्त्री को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) यज्ञ में (सुहवा) विनीत बुलावे के साथ (जोहवीमि) मैं बुलाता हूँ। (सा) वह (नः) हमें (विश्ववारम्) सब उत्तम व्यवहारवाले (रयिम्) धन को (नि) नित्य (यच्छात्) देती रहे और (शतदायम्) असंख्य धनवाला, (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (वीरम्) वीर सन्तान (ददातु) देवे ॥१॥

    भावार्थ -

    गुणवती, समझदार स्त्री गृहकार्य में परिमित व्यय कर धनवती होकर अपने सन्तानों को उत्तम वीर बनावें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से-निरु० ११।३३। में व्याख्यात है ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top