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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 47/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - कुहूः छन्दः - जगती सूक्तम् - कुहू सूक्त
    171

    कु॒हूं दे॒वीं सु॒कृतं॑ विद्म॒नाप॑सम॒स्मिन्य॒ज्ञे सु॒हवा॑ जोहवीमि। सा नो॑ र॒यिं वि॒श्ववा॑रं॒ नि य॑च्छा॒द्ददा॑तु वी॒रं श॒तदा॑यमु॒क्थ्यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कु॒हूम् । दे॒वीम् । सु॒ऽकृत॑म् । वि॒द्म॒नाऽअ॑पसम् । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । सु॒ऽहवा॑ । जो॒ह॒वी॒मि॒ । सा । न॒: । र॒यिम् । वि॒श्वऽवार॑म् । नि । य॒च्छा॒त् । ददा॑तु । वी॒रम् । श॒तऽदा॑यम् । उ॒क्थ्य᳡म् ॥४९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कुहूं देवीं सुकृतं विद्मनापसमस्मिन्यज्ञे सुहवा जोहवीमि। सा नो रयिं विश्ववारं नि यच्छाद्ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कुहूम् । देवीम् । सुऽकृतम् । विद्मनाऽअपसम् । अस्मिन् । यज्ञे । सुऽहवा । जोहवीमि । सा । न: । रयिम् । विश्वऽवारम् । नि । यच्छात् । ददातु । वीरम् । शतऽदायम् । उक्थ्यम् ॥४९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 47; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    स्त्रियों के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (सुकृतम्) सुन्दर काम करनेवाली, (विद्मनापसम्) कर्तव्यों को जाननेवाली, (देवीम्) दिव्यगुणवाली (कुहूम्) कुहू, अर्थात् अद्भुत स्वभाववाली स्त्री को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) यज्ञ में (सुहवा) विनीत बुलावे के साथ (जोहवीमि) मैं बुलाता हूँ। (सा) वह (नः) हमें (विश्ववारम्) सब उत्तम व्यवहारवाले (रयिम्) धन को (नि) नित्य (यच्छात्) देती रहे और (शतदायम्) असंख्य धनवाला, (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (वीरम्) वीर सन्तान (ददातु) देवे ॥१॥

    भावार्थ

    गुणवती, समझदार स्त्री गृहकार्य में परिमित व्यय कर धनवती होकर अपने सन्तानों को उत्तम वीर बनावें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से-निरु० ११।३३। में व्याख्यात है ॥

    टिप्पणी

    १−(कुहूम्) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। कुह विस्मापने-कु, ऊङ्। सिनीवाली कुहूरिति देवपत्न्यौ-निरु० ११।३१। कुहूर्गूहतेः क्वाभूदिति वा क्व सती हूयत इति वा। क्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा-निरु० ११-३२। कुहूः पदनाम-निघ० ५।५। विस्मापनशीलाम्। अद्भुतस्वभावां स्त्रियम् (देवीम्) दिव्यगुणाम् (सुकृतम्) सुकर्माणम् (विद्मनापसम्) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति विद ज्ञाने-मक्। विद्मो वेदनम्, तद्वत् विद्मनम्, पामादिलक्षणो न प्रत्ययः, अपः कर्म। विद्मनानि विदितान्यपांसि कर्माणि यस्यास्ताम्। विदितकर्माणम्-निरु० ११।३३। (अस्मिन्) (यज्ञे) पूजनीये कर्मणि (सुहवा) विभक्तेराकारः। सुहवेन। शोभनाह्वानेन (जोहवीमि) भृशमाह्वयामि (सा) कुहूः (नः) अस्मभ्यम् (रयिम्) धनम् (विश्ववारम्) सर्ववर्णनीयव्यवहारयुक्तम् (नि) नित्यम् (यच्छात्) दद्यात् (ददातु) (वीरम्) वीरसन्तानम् (शतदायम्) ददातेर्घञ्, युक्। बहुधनम् (उक्थ्यम्) प्रशस्यम् ॥

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    विषय

    कुहू देवी

    पदार्थ

    १. (कुहम्) = [कुह विस्मापने] अद्भुत क्रियाशीलता व कार्यकुशलता से विस्मापनशीला, [कुहूर्ताहते, सती हूयते इति वा-नि०११।३२] घर की बातों को संवृत रखनेवाली व 'कहाँ हो?' इसप्रकार पति से पुकारी जानेवाली (देवीम्) = प्रकाशमय जीवनवाली (सुक्तम्) = शोभन कोवाली, वियना (अपसम्) = ज्ञानपूर्वक कर्म करनेवाली पत्नी को (अस्मिन् यज्ञे) = इस गृहस्थ-यज्ञ में (जोहवीमि) = पुकारता हूँ। २. (सुहवा सा) = उत्तमता से पुकारने योग्य वह पत्नी (न:) = हमारे लिए (विश्ववारं रयिम्) = सबसे वरण के योग्य ऐश्वर्य को (नियच्छात्) = प्रास कराए व उस धन का सम्यक् नियमन करे और हमारे लिए (वीरम्) = वीर (शतदायम्) = सैकड़ों धनों का दान करनेवाले (उक्थ्यम्) = प्रशस्त जीवनवाले सन्तान को (ददातु) = प्राप्त कराए।

    भावार्थ

    अद्भुतरूप से कार्यकुशल, ज्ञानपूर्वक कर्मों को करनेवाली पत्नी इस गृहस्थ-यज्ञ में धन का ठीक प्रकार से नियमन करती हुई, हमें वीर सन्तानों को प्राप्त कराये।

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    भाषार्थ

    (कुहूम्) पृथिवी में शब्दनीया, कथनीया (सुकृतम्) सुकर्मों वाली (विद्मनापसम्) गृह्यकृत्यों को जानने वाली, (सुहवाम्) सुगमता से बुलाई जा सकने वाली (देवीम्) कुहू-देवी को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) यज्ञ में (जोहवीमि) मैं पति बार-बार बुलाता हूं। (सा) वह तु (नः) हम [पारिवारिक जनों] को (रयिम्) धन (नियच्छात्) दे, अर्थात् ऐसा पुत्र दे जो कि (विश्ववारम्) सब द्वारा वरणीय हो, चाहने योग्य हो, और (शतदायम्) सैकड़ों को दान देने वाला (उक्थ्यम्) और प्रशंसनीय हो, (वीरम्) ऐसा वीर पुत्र (ददातु) हमें दे।

    टिप्पणी

    [कु= पृथिवी; कु= earth (आप्टे) + ह्वेञ् स्पर्धायां शब्दे च (भ्वादिः)। विद्मनापसम्= विद्मन (गृह्य) + अपः कर्मनाम (निघं० २।१)। कुहू= पृथिवी में कथनीय, सद्गुणों में प्रशंसनीय। यज्ञे= गृहस्थयज्ञे। कुहू पत्नी सुहवा है, हठीली नहीं। शेषगुण मन्त्रार्य में स्पष्ट हैं। जोहवीमि= ह्वयतेरिदं रूप जुहोतेर्वा (सायण)। निरुक्त के अनुसार जूहू देवपत्नी है, अतः स्वयं देवी है। याज्ञिकों के अनुसार कुहू "नष्टचन्द्र अमावास्या है।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Life Partner

    Meaning

    I invoke and invite ‘Kuhu’, adorable lady of sweet word and voice, divine of mien and noble in manners, enlightened and wise in action, to join me in this holy home yajna of conjugality, and pray may she give us the progeny of noble wealth of character and universal value, admirable, brave and creative in a hundred ways.

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    Subject

    Kuhuh - New Moon

    Translation

    I invoke at this sacrifice the divine moonless night (kuhi- New Moon), skilled in pious deeds, acting with appropriate knowledge, and easy to call. May she confirm in us the riches desired by all. May she bless us with a son, donor of abundant wealth, and praise-worthy.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.49.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    In this sacrifice I describe the advantages of Kuhu, the last phase of dark-night which is the occasion of performing good acts, which bears many good performances of yajna etc; and which has many praises. Let it give us the wealth possessed of all boons and praiseworthy progeny having the power to give gift to many others.

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    Translation

    O woman, who nourishes children, possesses definite, positive knowledge, is praised in manifold ways, and travels in different directions, attains to supremacy. O consort of a hero, thou art offered all nice objects. O woman urge thy husband to bounty.

    Footnote

    In this sacrifice (Yajna) with favored cry I call the woman, the doer of noble deeds, the knower of duties, the master of fine traits, and the possessor of extraordinary nature. May she always vouchsafe us highly serviceable wealth, and a charitable praiseworthy heroic son.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(कुहूम्) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। कुह विस्मापने-कु, ऊङ्। सिनीवाली कुहूरिति देवपत्न्यौ-निरु० ११।३१। कुहूर्गूहतेः क्वाभूदिति वा क्व सती हूयत इति वा। क्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा-निरु० ११-३२। कुहूः पदनाम-निघ० ५।५। विस्मापनशीलाम्। अद्भुतस्वभावां स्त्रियम् (देवीम्) दिव्यगुणाम् (सुकृतम्) सुकर्माणम् (विद्मनापसम्) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति विद ज्ञाने-मक्। विद्मो वेदनम्, तद्वत् विद्मनम्, पामादिलक्षणो न प्रत्ययः, अपः कर्म। विद्मनानि विदितान्यपांसि कर्माणि यस्यास्ताम्। विदितकर्माणम्-निरु० ११।३३। (अस्मिन्) (यज्ञे) पूजनीये कर्मणि (सुहवा) विभक्तेराकारः। सुहवेन। शोभनाह्वानेन (जोहवीमि) भृशमाह्वयामि (सा) कुहूः (नः) अस्मभ्यम् (रयिम्) धनम् (विश्ववारम्) सर्ववर्णनीयव्यवहारयुक्तम् (नि) नित्यम् (यच्छात्) दद्यात् (ददातु) (वीरम्) वीरसन्तानम् (शतदायम्) ददातेर्घञ्, युक्। बहुधनम् (उक्थ्यम्) प्रशस्यम् ॥

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