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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 53 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 53/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - आयुः, बृहस्पतिः, अश्विनौ छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    37

    अ॑मुत्र॒भूया॒दधि॒ यद्य॒मस्य॒ बृह॑स्पतेर॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चः। प्रत्यौ॑हताम॒श्विना॑ मृ॒त्युम॒स्मद्दे॒वाना॑मग्ने भि॒षजा॒ शची॑भिः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒मु॒त्र॒ऽभूया॑त् । अधि॑ । यत् । य॒मस्य॑ । बृह॑स्पते: । अ॒भिऽश॑स्ते: । अमु॑ञ्च: । प्रति॑ । औ॒ह॒ता॒म् । अ॒श्विना॑ । मृ॒त्युम् । अ॒स्मत् ।दे॒वाना॑म् । अ॒ग्ने॒ । भि॒षजा॑ । शची॑भि: ॥५५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमुत्रभूयादधि यद्यमस्य बृहस्पतेरभिशस्तेरमुञ्चः। प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद्देवानामग्ने भिषजा शचीभिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अमुत्रऽभूयात् । अधि । यत् । यमस्य । बृहस्पते: । अभिऽशस्ते: । अमुञ्च: । प्रति । औहताम् । अश्विना । मृत्युम् । अस्मत् ।देवानाम् । अग्ने । भिषजा । शचीभि: ॥५५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 53; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! (यत्) जिस कारण से (अमुत्रभूयात्) परलोक में होनेवाले भय से और (बृहस्पतेः) बड़ों के रक्षक (यमस्य) नियमकर्त्ता राजा के [सम्बन्धी] (अभिशस्तेः) अपराध से (अधि) अधिकारपूर्वक (अमुञ्चः) तूने छुड़ाया है। (देवानाम्) विद्वानों में (भिषजा) वैद्यरूप (अश्विना) माता-पिता [वा अध्यापक, उपदेशक] ने (मृत्युम्) मृत्यु [मरण के कारण दुःख] को (अस्मत्) हम से (शचीभिः) कर्मों द्वारा (प्रति) प्रतिकूल (औहताम्) हटाया है ॥१॥

    भावार्थ - परमेश्वर ने वेद द्वारा बताया है कि मनुष्य गुप्त मानसिक कुविचार छोड़कर परलोक में नरकपतन से, और प्रकट शारीरिक पाप छोड़ कर राजा के दण्ड से बचकर आनन्दित रहें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है−२७।९ ॥


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    Meaning -
    O Agni, lord of life and light, and since you have saved us from the possible malediction of Yama, lord of life and death, and his justice beyond there in the other world, and from the justice of Brhaspati, Spirit of expansive nature’s dynamics of change, now, O Lord, we pray, may the Ashvins, physicians of divinities, prana and apana energies, with their power and acts, ward off death from us before fullness and achievement of fulfilment.


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