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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 7 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 7/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - अदितिः छन्दः - आर्षी जगती सूक्तम् - आदित्यगण सूक्त
    14

    दितेः॑ पु॒त्राणा॒मदि॑तेरकारिष॒मव॑ दे॒वानां॑ बृह॒ताम॑न॒र्मणा॑म्। तेषां॒ हि धाम॑ गभि॒षक्स॑मु॒द्रियं॒ नैना॒न्नम॑सा प॒रो अ॑स्ति॒ कश्च॒न ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दिते॑: । पु॒त्राणा॑म् । अदि॑ते: । अ॒का॒रि॒ष॒म् । अव॑ । दे॒वाना॑म् । बृ॒ह॒ताम् । अ॒न॒र्मणा॑म् । तेषा॑म् । हि । धाम॑ । ग॒भि॒ऽसक् । स॒मु॒द्रिय॑म् । न । ए॒ना॒न् । नम॑सा । प॒र: । अ॒स्ति॒ । क: । च॒न ॥८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दितेः पुत्राणामदितेरकारिषमव देवानां बृहतामनर्मणाम्। तेषां हि धाम गभिषक्समुद्रियं नैनान्नमसा परो अस्ति कश्चन ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दिते: । पुत्राणाम् । अदिते: । अकारिषम् । अव । देवानाम् । बृहताम् । अनर्मणाम् । तेषाम् । हि । धाम । गभिऽसक् । समुद्रियम् । न । एनान् । नमसा । पर: । अस्ति । क: । चन ॥८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 7; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (दितेः) दीनता से (पुत्राणाम्) शुद्ध करनेवाले वा बहुत बचानेवाले, (अदितेः) अदीनता के (देवानाम्) देनेवाले वा प्रकाश करनेवाले, (बृहताम्) बड़े गुणवाले, (अनर्मणाम्) हिंसा न करनेवाले वा अजेय (तेषाम्) उन पुरुषों के (धाम) धारण सामर्थ्य को (हि) ही (गभिषक्) गहराई से युक्त, (समुद्रियम्) [पार्थिव और अन्तरिक्ष] समुद्र में रहनेवाला (अव) निश्चय करके (अकारिषम्) मैंने जाना है, (कः चन) कोई भी (परः) शत्रु (एनान्) इनको (नमसा) [उनके] अन्न वा सत्कार के कारण (न) नहीं (अस्ति) पाता है ॥१॥

    भावार्थ - जो धर्मात्मा मनुष्य दीनता छोड़ कर संसार में आत्मा और शरीर की अदीनता का दान करते हैं, वे पृथ्वी और आकाश में यान विमान आदि द्वारा अधिकार जमाते और शत्रुओं को जीतते हैं ॥१॥


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    Meaning -
    I have diversified the forms, functions and places of the children, i.e., effectual forms, of Aditi, integrate primordial Prakrti, into Sattva, Rajas and Tamas, i.e., thought, energy and matter, and of the effectual forms of Did, disintegrate form of Aditi, into discrete forms of elements and energies, all of them divine, expansive, inviolate and inviolable. Deep is their identity and value in the cosmic context, unfathomable like the ocean’s, and there is none who can comprehend them, whatever the effort and investment one may provide. (8, 1) (This looks like the voice of the divine spirit of creative evolution of the multitudinous variety of things from one basic root of nature.)


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