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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 70 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 70/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - श्येनः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुदमन सूक्त
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    यत्किं चा॒सौ मन॑सा॒ यच्च॑ वा॒चा य॒ज्ञैर्जु॒होति॑ ह॒विषा॒ यजु॑षा। तन्मृ॒त्युना॒ निरृ॑तिः संविदा॒ना पु॒रा स॒त्यादाहु॑तिं हन्त्वस्य ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । किम् । च॒ । अ॒सौ । मन॑सा । यत् । च॒ । वा॒चा । रा॒ज्ञै: । जु॒होति॑ । ह॒विषा॑ । यजु॑षा । तत् । मृ॒त्युना॑ । नि:ऽऋ॑ति: । स॒म्ऽवि॒दा॒ना । पु॒रा । स॒त्यात् । आऽहु॑तिम् । ह॒न्तु॒ । अ॒स्य॒ ॥७३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा। तन्मृत्युना निरृतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । किम् । च । असौ । मनसा । यत् । च । वाचा । राज्ञै: । जुहोति । हविषा । यजुषा । तत् । मृत्युना । नि:ऽऋति: । सम्ऽविदाना । पुरा । सत्यात् । आऽहुतिम् । हन्तु । अस्य ॥७३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 70; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (असौ) वह [शत्रु] (यत् किम्) जो कुछ (मनसा) मन से, (च च) और (यत्) जो कुछ (वाचा) वाणी से, (यज्ञैः) सङ्गति कर्मों से, (हविषा) भोजन से और (यजुषा) दान से (जुहोति) आहुति करता है। (मृत्युना) मृत्यु के साथ (संविदानाः) मिली हुई (निर्ऋतिः) निर्ऋति, दरिद्रता आदि अलक्ष्मी (सत्यात् पुरा) सफलता से पहिले (अस्य) इसकी (तत्) उस (आहुतिम्) आहुति को (हन्तु) नाश करें ॥१॥

    भावार्थ - जो शत्रु मन, वचन और कर्म से प्रजा को सताने का उपाय करे, निपुण सेनापति शीघ्र ही उसे धनहरण आदि दण्ड देकर रोक देवे ॥१॥


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    Meaning -
    new light of a new day. Shyena, the Eagle in this sukta is a metaphor of defence forces which must pounce upon the enemy before he strikes. Whatever the enemy is able to muster up with intention, thought and planning, whatever with words and propaganda, with all his joint efforts and allies, materials and his tactics of application and execution, all that preparation and plan of his, our deadly defence forces of destruction and deprivation, having known in advance, must counter and destroy before he strikes and accomplishes his object.


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