अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 76/ मन्त्र 4
ऋषिः - अथर्वा
देवता - अपचिद् भैषज्यम्
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
51
प॒क्षी जा॒यान्यः॑ पतति॒ स आ वि॑शति॒ पूरु॑षम्। तदक्षि॑तस्य भेष॒जमु॒भयोः॒ सुक्ष॑तस्य च ॥
स्वर सहित पद पाठप॒क्षी । जा॒यान्य॑: । प॒त॒ति॒ । स: । आ । वि॒श॒ति॒ । पुरु॑षम् । तत् । अक्षि॑तस्य । भे॒ष॒जम् । उ॒भयो॑: । सुऽक्ष॑तस्य । च॒ ॥८०.४॥
स्वर रहित मन्त्र
पक्षी जायान्यः पतति स आ विशति पूरुषम्। तदक्षितस्य भेषजमुभयोः सुक्षतस्य च ॥
स्वर रहित पद पाठपक्षी । जायान्य: । पतति । स: । आ । विशति । पुरुषम् । तत् । अक्षितस्य । भेषजम् । उभयो: । सुऽक्षतस्य । च ॥८०.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
१-५ रोगनाश
पदार्थ
(पक्षी) पंखवाला [उड़ाऊ] (जायान्यः) क्षयरोग (पतति) उड़ता है, (सः) वह (पूरुषम्) पुरुष में (आ विशति) प्रवेश कर जाता है। (तत्) यह (अक्षितस्य) भीतर व्यापे हुए (च) और (सुक्षतस्य) बहुत फोड़ोंवाले, (उभयोः) दोनों प्रकार के [क्षयरोग] की (भेषजम्) ओषधि है ॥४॥
भावार्थ
सद्वैद्य भीतरी और बाहिरी लक्षणों से रोग की पहिचान कर निवृत्ति करे ॥४॥
टिप्पणी
४−(पक्षी) पक्षवान्। शीघ्रगतिः (जायान्यः) म० ३। क्षयरोगः (पतति) शीघ्रं गच्छति (सः) (आविशति) प्रविशति (पूरुषम्) पुरुषम्। शरीरम् (तत्) (अक्षितस्य) अक्षू व्याप्तौ-क्त। अन्तर्व्याप्तस्य क्षयस्य (भेषजम्) औषधम् (उभयोः) अक्षितसुक्षतयोः (सुक्षतस्य) क्षणु हिंसायाम्-क्त। बहुव्रणयुक्तस्य ॥
पदार्थ
१. (जायान्यः) = जाया-संभोग से उत्पन्न होनेवाला क्षयरोग (पक्षी) = पक्षवाला-पक्षी बनकर (पतति) = सब जगह पहुँचता है, फैल जाता है। (सः पुरुषम् आविशति) = यह रोग पुरुष के सम्पूर्ण शरीर में प्रविष्ट [व्यास] हो जाता है। २. (तत) = अगले [पाँचवें] मन्त्र में वर्णित हवि (अक्षितस्य) = जो शरीर में चिरकाल से अवस्थित नहीं हुआ, (च) = और जो (सुक्षतस्य) = शरीरगत सब धातुओं का हिंसन करनेवाला है, उन (उभयो:) = दोनों क्षयरोगों [अक्षित और सुक्षत] की (भेषजम्) = औषध है।
भावार्थ
क्षयरोग के बीज सर्वत्र उड़ते-से हैं, वे पुरुष में प्रवेश करके उसे पीड़ित करते हैं। हवि के द्वारा इनका निवारण सम्भव है।
भाषार्थ
(जायान्यः पक्षी) जाया से उत्पन्न रोग अर्थात् यक्ष्मा या क्षयरोग (पतति) मानो उड़ता है, (सः) वह मानो उड़कर (पुरुषम्) पुरुष में (प्रविशति) आकर प्रविष्ट हो जाता है। (तत्) वह (भेषजम्) औषध है (उभयोः) दोनों का (अक्षितस्य) अल्पक्षयरोग का (सुक्षतस्य च) और समुन्नत क्षय रोग का।
टिप्पणी
[अक्षितस्य = अ (नञ् अल्पार्थे, यथा अनुदरी कन्या = अल्पोदरी कन्या) + क्षित (क्षि क्षये, भ्वादिः) भेषजम् (मन्त्र ५ देखो)]।
विषय
गण्डमाला की चिकित्सा और सुसाध्य के लक्षण।
भावार्थ
(जायान्यः) स्त्रियों के अतिभोग से प्राप्त होने वाला क्षय, शोष आदि रोग (पक्षी) पक्षी के समान (पतति) एक शरीर से दूसरे शरीर में संचार कर जाता है। (स) वही (पूरुषम्) भोग के समय पुरुष के शरीर में (आ विशति) पहले थोड़ी मात्रा में ही या शनैः शनैः प्रवेश कर जाता है। (तत्) वह निम्नलिखित उपचार (अक्षितस्य) प्रथम—अभी जिसने चिरकाल से जड़ न पकड़ी हो और (सुक्षतस्य=सु-क्षितस्य) द्रितीय—जिसने खूब जड़ पकड़ भी ली हो (उभयोः) दोनों की (भेषजम्) उत्तम चिकित्सा है। अथवा (अक्षतस्य उभयोः भेषजम्) अक्षत—जिसमें छाती का खून न आता हो, दूसरा जिसमें छाती से कटकट कर खून आने लग गया हो, दोनों की वही चिकित्सा है। अर्थात् शरीर में प्रवेश होने वाले विषैले कीडों को दूर भगा देना ही इस रोग से बचने का उत्तम उपाय है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अपचित-भिषग् देवता। १ विराड् अनुष्टुप्। ३, ४ अनुष्टुप्। २ परा उष्णिक्। ५ भुरिग् अनुष्टुप्। ६ त्रिष्टुप्। षडर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cure of Excrescences
Meaning
The sexual contagion spreads like a flying bird and infects the man, and whether it is recent or chronic, O physician, the cure is there for both.
Translation
The winged consumptive disease flies. That enters a man. That renowned one is a remedy for both, the one of short duration and the chronic.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.80.4AS PER THE BOOK
Translation
Scrafula flies like a bird possessed of wings. This penetrate the man. Here is the cure of cither kind of scrapula—the chronic and the transient.
Translation
The germ of consumption, arising from excessive cohabitation, flies like a bird from one place to the other, and enters the body of a man. There is remedy for both kinds, the chronic and the transient.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(पक्षी) पक्षवान्। शीघ्रगतिः (जायान्यः) म० ३। क्षयरोगः (पतति) शीघ्रं गच्छति (सः) (आविशति) प्रविशति (पूरुषम्) पुरुषम्। शरीरम् (तत्) (अक्षितस्य) अक्षू व्याप्तौ-क्त। अन्तर्व्याप्तस्य क्षयस्य (भेषजम्) औषधम् (उभयोः) अक्षितसुक्षतयोः (सुक्षतस्य) क्षणु हिंसायाम्-क्त। बहुव्रणयुक्तस्य ॥
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