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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 77 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - मरुद्गणः छन्दः - त्रिपदा गायत्री सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    54

    सांत॑पना इ॒दं ह॒विर्मरु॑त॒स्तज्जु॑जुष्टन। अ॒स्माको॒ती रि॑शादसः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    साम्ऽत॑पना: । इ॒दम् । ह॒वि: । मरु॑त: । तत् । जु॒जु॒ष्ट॒न॒ । अ॒स्माक॑ । ऊ॒ती । रि॒शा॒द॒स॒: ॥८२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सांतपना इदं हविर्मरुतस्तज्जुजुष्टन। अस्माकोती रिशादसः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    साम्ऽतपना: । इदम् । हवि: । मरुत: । तत् । जुजुष्टन । अस्माक । ऊती । रिशादस: ॥८२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 77; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वीरों के कर्त्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (सांतपनाः) हे बड़े ऐश्वर्य में रहनेवाले ! (रिशादसः) हे हिंसकों के मारनेवाले (मरुतः) शूर विद्वान् मनुष्यो ! (अस्माक) हमारी (ऊती) रक्षा के लिये (इदम्) इस और (तत्) उस (हविः) ग्रहणयोग्य योग्य कर्म को (जुजुष्टन) स्वीकार करो ॥१॥

    भावार्थ

    पराक्रमी विद्वान् मनुष्य प्रजा की पुकार को सब प्रकार सुनकर रक्षा करें ॥१॥ इस सूक्त का मिलान अ० १।२०।१। से करो ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−७।५९।९।

    टिप्पणी

    १−(सांतपनाः) सम्+तप ऐश्वर्ये-ल्युट्। तत्र भवः। पा० ४।३।५३। अण्। संतपने पूर्णैश्वर्ये भवा वर्तमानाः (इदम्) समीपस्थम् (हविः) ग्राह्यं कर्म (मरुतः) अ० १।२०।१। शूराः। विद्वांसः। ऋत्विजः-निघ० ३।१८। (तत्) दूरस्थम् (जुजुष्ठन) जुषतेः शपः श्लुः, तस्य तनादेशश्च। स्वीकुरुत (अस्माक) अस्माकम् (ऊती) चतुर्थ्याः पूर्वसवर्णदीर्घः। ऊतये रक्षार्थम् (रिशादसः) अ० २।२८।२। हिंसकानां हिंसकाः ॥

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    विषय

    'सान्तपना: रिशादसः' मरुतः

    पदार्थ

    १. हे (मरुतः) = प्राणो! आप (सान्तपना:) = ज्ञानज्योति को सन्दीप्त करनेवाले हो। (इदं हवि:) = यह दानपूर्वक अदन सामग्री है, यज्ञ करके यज्ञावशिष्ट पदार्थ है, (तत् जुजुष्टन) = इसका तुम सेवन करो। सदा यज्ञशेष को ही खानेवाले बनो। २. (अस्माक ऊती) = हमारे रक्षण के उद्देश्य से आप (रिशादस:) = [रिशन्ति हिंसन्ति इति रिश्यः] शत्रुओं के उपक्षपयिता [दस् उपक्षये] हो अथवा इन शत्रुओं के खा जानेवाले [अद् भक्षणे] हो।

    भावार्थ

    प्राणसाधना से ज्ञानज्योति दीस होती है तथा काम-क्रोध आदि हिंसक शत्रुओं का विनाश होता है। यज्ञशेष का सेवन करते हुए ये प्राण हमारा रक्षण करते हैं -

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    भाषार्थ

    (सांतपनाः) संतप्त सूर्य के सदृश [अस्त्र-शस्त्रों द्वारा] द्योतमान (मरुतः) हे सैनिको! (इदम्) यह तुम्हारा सैन्य (हविः) युद्धयज्ञ में हविरूप है, (तत्) उस हवि का (जुजुष्टन) प्रीतिपूर्वक सेवन करो। और (अस्माकोती) हम प्रजाजनों की रक्षा के लिये (रिशादसः) हिंसाकारी शत्रुओं का क्षय करो।

    टिप्पणी

    [संतपन: सूर्यः, तत्सदृशाः मरुतः, स्वार्थे, या "तस्येदम्" द्वारा अण्। हविः पद द्वारा राष्ट्रनिमित्त युद्ध को यज्ञ कहा है। मरुतः= मारने में शुर वीर सैनिक। मन्त्र (३) में मरुतः को "मानुषासः" अर्थात् मनुष्य कहा है, अतः मरुतः सैनिक प्रतीत होते हैं। "मरुत् मारयतीति वा मनुष्यजातिः" (उणा० २।९५, दयानन्द)। तथा "मरुतः मितरोचिनो वा" (निरुक्त ११।२।१३)। तथा यजु० (१७।४०)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Enmity

    Meaning

    Austere but burning and blazing as fire and sun, O Maruts, vibrant warriors, teachers and pioneers, dedicated to life unto death, destroyers of hate and violence, pray accept this homage for our protection against all negative forces without and within.

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    Subject

    Marutah

    Translation

    O storm-troopers, full of fiery heat, this is the offering; accept and enjoy it. O destroyers of the enemy, be our protection.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.82.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    May learned men who are accomplished with austerity and who for our protection destroy the evils, accept this eatable preparation and eat that.

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    Translation

    O austere, sacrificing learned persons here is this food in abundance for you. Accept this offering gladly. Ye, slayers of foe, stay here for our protection!

    Footnote

    See Rig, 7-59-9.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(सांतपनाः) सम्+तप ऐश्वर्ये-ल्युट्। तत्र भवः। पा० ४।३।५३। अण्। संतपने पूर्णैश्वर्ये भवा वर्तमानाः (इदम्) समीपस्थम् (हविः) ग्राह्यं कर्म (मरुतः) अ० १।२०।१। शूराः। विद्वांसः। ऋत्विजः-निघ० ३।१८। (तत्) दूरस्थम् (जुजुष्ठन) जुषतेः शपः श्लुः, तस्य तनादेशश्च। स्वीकुरुत (अस्माक) अस्माकम् (ऊती) चतुर्थ्याः पूर्वसवर्णदीर्घः। ऊतये रक्षार्थम् (रिशादसः) अ० २।२८।२। हिंसकानां हिंसकाः ॥

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