अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 78/ मन्त्र 2
अ॒स्मै क्ष॒त्राणि॑ धा॒रय॑न्तमग्ने यु॒नज्मि॑ त्वा॒ ब्रह्म॑णा॒ दैव्ये॑न। दी॑दि॒ह्यस्मभ्यं॒ द्रवि॑णे॒ह भ॒द्रं प्रेमं वो॑चो हवि॒र्दां दे॒वता॑सु ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒स्मै । क्ष॒त्राणि॑ । धा॒रय॑न्तम् । अ॒ग्ने॒ । यु॒नज्मि॑ । त्वा॒ । ब्रह्म॑णा । दैव्ये॑न । दी॒दि॒हि । अ॒स्मभ्य॑म् । द्रवि॑णा । इ॒ह । भ॒द्रम् । प्र । इ॒मम् । वो॒च॒: । ह॒वि॒:ऽदाम् । दे॒वता॑सु ॥८३.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्ने युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन। दीदिह्यस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं प्रेमं वोचो हविर्दां देवतासु ॥
स्वर रहित पद पाठअस्मै । क्षत्राणि । धारयन्तम् । अग्ने । युनज्मि । त्वा । ब्रह्मणा । दैव्येन । दीदिहि । अस्मभ्यम् । द्रविणा । इह । भद्रम् । प्र । इमम् । वोच: । हवि:ऽदाम् । देवतासु ॥८३.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थ
(अग्ने) हे अग्नि [तुल्य पराक्रमी आत्मा !] (अस्मै) इस [प्राणी] के लिये (क्षत्राणि) अनेक बलों को (धारयन्तम्) धारण करनेवाले (त्वा) तुझको (दैव्येन) परमेश्वर से पाये हुए (ब्रह्मणा) वेदज्ञान से (युनज्मि) मैं नियुक्त करता हूँ। (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (इह) यहाँ पर (द्रविणा) अनेक धन (भद्रम्) आनन्द से (दीदिहि) प्रकाशित कर, (इमम्) इस [मनुष्य] को (देवतासु) विद्वानों के बीच (हविर्दाम्) देने योग्य पदार्थ का देनेवाला (प्रवोचः) तूने सूचित किया है ॥२॥
भावार्थ
मनुष्य ब्रह्मचर्य योगाभ्यास आदि शुभ गुणों से अपने बलों को बढ़ा कर परोपकारी होकर कीर्त्ति बढ़ावें ॥२॥
टिप्पणी
२−(अस्मै) प्राणिने (क्षत्राणि) अ० २।१५।४। बलानि (धारयन्तम्) धरन्तम् (अग्ने) अग्नितुल्यपराक्रमिन्नात्मन् (युनज्मि) योजयामि (त्वा) त्वाम् (ब्रह्मणा) वेदज्ञानेन (दैव्येन) अ० २।२।२। परमेश्वरसम्बद्धेन (दीदिहि) अ० २।६।१। अन्तर्गतण्यर्थः। संदीपय (अस्मभ्यम्) (द्रविणा) अ० २।२९।३। धनानि (इह) अस्मिन् संसारे (भद्रम्) यथा तथा सुखेन (प्र) प्रकर्षेण (वोचः) लुङि रूपम्। अवोचः। सूचितवानसि (हविर्दाम्) ददातेः-क्विप्। दातव्यस्य दातारम् (देवतासु) विद्वत्सु ॥
विषय
क्षत्राणि द्रविणा भद्रम्
पदार्थ
१. (अस्मै) = इस अपने उपासक के लिए (क्षत्राणि धारयन्तम्) = बलों का धारण करनेवाले (त्वा) = आपको, हे (अग्ने) = प्रभो! (दैव्येन ब्रह्मणा) = देव से प्राप्त ज्ञान के द्वारा, प्रभु को प्रास करनेवाले ज्ञान के द्वारा,(युनज्मि) = अपने साथ जोड़ता हूँ। प्रभु हमें बल प्राप्त कराते हैं, हम ज्ञान के द्वारा प्रभु को प्रास करनेवाले बनें। २. हे प्रभो! आप (इह) = इस जीवन में (द्रविणा) = धनों को (भद्रम्) = कल्याण व सुख को (दीदिहि) = दीजिए अथवा हमारे लिए धन आदि को दीस कीजिए। (इमं हविर्दाम्) = इस हवि देनेवाले यज्ञशील पुरुष को (देवतासु प्रवोच:) = देवों के विषय में प्रकृष्ट ज्ञान दीजिए। इन सूर्य आदि देवों का ज्ञान प्राप्त करके हम उनसे उचित लाभ प्राप्त करते हुए उन्नत जीवनवाले बनें|
भावार्थ
प्रभु हमें 'बल , धन , कल्याण व ज्ञान ' प्राप्त कराते हैं| हम ज्ञान प्रभु को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हों|
प्रभु से बल आदि को प्राप्त करनेवाला अथर्वा प्रार्थना करता है कि-
भाषार्थ
(अस्मै) इस [क्षत्रिय] के लिये (क्षत्राणि) क्षात्रबल (धारयन्तम्) प्रदान करते हुए (अग्ने) हे ज्ञानाग्निसम्पन्न ! [शिष्य] (त्वा) तुझे (दैव्येन) देवाधिदेव (ब्रह्मणा) ब्रह्म के साथ (युनज्मि), मैं अध्यात्मगुरु योगविधि द्वारा सम्बद्ध करता हूं। (दीदिहि) तू प्रदान कर (इह) इस राष्ट्र में (अस्मभ्यम्) हम प्रजाजनों को (द्रविणा = द्रविणानि) सुपथ द्वारा अजितधन तथा (भद्रम्) कल्याण और सुखप्रद जीवन तथा (हविर्दाम्) प्रजाओं को हविष्यान्न प्रदान करने वाले (इमम्) इस राजा को (देवतासु) राष्ट्र की विद्वत्समाज में (प्रवोचः) प्रख्यात कर।
टिप्पणी
[अध्यात्मशिष्य को ज्ञानाग्निप्रदान (मन्त्र १) करने वाला अध्यात्म शिष्य के प्रति कहता है कि मैं ब्रह्म के साथ भी तुझे योगयुक्त करता हूं, तू राजा को क्षात्रधर्म के साथ ब्रह्मज्ञान भी प्रदान किया कर और राजा को यह भी उपदेश दे कि वह प्रजाओं के भोजन के लिये उन्हें हविष्यान्न प्रदान किया कर करे, जिससे प्रजाजन सात्त्विक हो सकें। देवतासु ="विद्वांसो वै देवाः")]।
विषय
मुक्ति साधना।
भावार्थ
हे (अग्ने) प्राणरूप अग्ने ! (अस्मै) इस आत्मा के निमित्त ही (क्षत्राणि) समस्त वीर्यों को (धारयन्तम्) धारण करते हुए (त्वा) तुझको (दैव्येन) देव, आत्मसम्बन्धी (ब्रह्मणा) ब्रह्म बलसे (युनज्मि) युक्त करता हूँ, उसमें समाहित करता हूँ। तू (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (इह) इस लोक में ही (द्रविणा) नाना ज्ञानों और बलों और विभूतियों को (दीदिहि) प्रदान कर। और (इमम्) इस आत्मा को वह प्राण (देवतासु) इन इंद्रियगणों में (भद्रम्) सुखकारी (हविर्दाम्) अन्न और बलशक्ति तथा उनकी भोग्यशक्ति को देने वाला (प्र-वोचः) उपदेश किया जाता है। पुरोहित राजा के प्रति भी (अस्मै) इस राष्ट्र के लिये (क्षत्राणि धारयन्तम् हे अग्ने त्वा दैव्येन ब्रह्मणा युनज्मि) क्षत्रबलों को धारण करनेवाले तुझ परंतप राजा को ईश्वरीय वेदज्ञान से युक्त करता हूं। (इह अस्मभ्यं द्रविणा दीदिहि) इस राष्ट्र में हमें श्रेष्ठ धन प्राप्त करा और (देवतासु इमं भद्रं हविर्दाम् प्रवोचः) विद्वान्, उत्तम देवसदृश पुरुषों में इस पुरुषको सुखकारी उत्तम अन्नदाता होनेका उपदेश कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अग्निदेवता। पुरोष्णिग्। २ त्रिष्टुप्। द्वयृचं सक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Bondage
Meaning
Agni, enlightened soul, bearing as you do the powers and obligations of governance, defence and development for this social order, I join you, Agni, enlightened ruler, with the divine knowledge of Veda for the ruler. Shine, reveal and create for us the wealth, honour and excellence of a noble order and speak well of this social order among the divines as a pious order, grateful and generous giver of homage to the divinities of nature and humanity.
Translation
O fire - divine, I unite you, who hold dominion for this sacrificer, with enlightening knowledge. May you grant us riches here. May you declare this man to be a good offerer of oblations to the enlightened ones (devatasu).
Comments / Notes
MANTRA NO 7.83.2AS PER THE BOOK
Translation
O enlightened soul! I with the divine knowledge unite you who has attained all the powers and protection for this world. You brightly shine here for us with spiritual wealth’s and preach this knowledge for our well being and become the giver of oblation for the yajna devatas in the yajna.
Translation
O soul, I unite thee with Vedic knowledge, revealed by God, for maintaining this man in manifold powers. In this world grant us wealth and joy. Declare thou to the learned, this man, as the giver of charity!
Footnote
‘I’ refers to God.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(अस्मै) प्राणिने (क्षत्राणि) अ० २।१५।४। बलानि (धारयन्तम्) धरन्तम् (अग्ने) अग्नितुल्यपराक्रमिन्नात्मन् (युनज्मि) योजयामि (त्वा) त्वाम् (ब्रह्मणा) वेदज्ञानेन (दैव्येन) अ० २।२।२। परमेश्वरसम्बद्धेन (दीदिहि) अ० २।६।१। अन्तर्गतण्यर्थः। संदीपय (अस्मभ्यम्) (द्रविणा) अ० २।२९।३। धनानि (इह) अस्मिन् संसारे (भद्रम्) यथा तथा सुखेन (प्र) प्रकर्षेण (वोचः) लुङि रूपम्। अवोचः। सूचितवानसि (हविर्दाम्) ददातेः-क्विप्। दातव्यस्य दातारम् (देवतासु) विद्वत्सु ॥
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