अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 79 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 79/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - अमावस्या छन्दः - जगती सूक्तम् - अमावस्य सूक्त
    पदार्थ -

    (अमावास्ये) हे अमावास्या ! [सबके साथ बसी हुई शक्ति परमेश्वर !] (यत्) जिस कारण से (ते) तेरी (महित्वा) महिमा से (संवसन्तः) यथावत् बसते हुए (देवाः) विद्वानों ने (भागधेयम्) अपना सेवनीय काम (अकृण्वन्) किया है। (तेन) उसीसे, (विश्ववारे) हे सब से स्वीकार करने योग्य शक्ति ! (नः) हमारे (यज्ञम्) यज्ञ [पूजनीय व्यवहार] को (पिपृहि) पूरा कर, (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (नः) हमें (सुवीरम्) बड़े वीरोंवाला (रयिम्) धन (धेहि) दान कर ॥१॥

    भावार्थ -

    इस मन्त्र में (अमावास्ये, संवसन्तः) पद [वस-रहना, ढाँकना] धातु से बने हैं। विद्वान् लोग सर्वान्तर्यामी, परमेश्वर में आश्रय लेकर सृष्टि के सब पदार्थों से उपकार करके सबको वीर, पुरुषार्थी और धनी बनावें ॥१॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध आ चुका-अ० ७।२०।४ ॥

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