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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 9 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 9/ मन्त्र 1
    ऋषि: - उपरिबभ्रवः देवता - पूषा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - स्वस्तिदा पूषा सूक्त
    38

    प्रप॑थे प॒थाम॑जनिष्ट पू॒षा प्रप॑थे दि॒वः प्रप॑थे पृथि॒व्याः। उ॒भे अ॒भि प्रि॒यत॑मे स॒धस्थे॒ आ च॒ परा॑ च चरति प्रजा॒नन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रऽप॑थे । प॒थाम् । अ॒ज॒नि॒ष्ट॒ । पू॒षा । प्रऽप॑थे । दि॒व: । प्रऽप॑थे । पृ॒थि॒व्या: । उ॒भे इति॑ । अ॒भि । प्रि॒यत॑मे॒ इति॑ प्रि॒यऽत॑मे । स॒धऽस्थे इति॑ स॒धऽस्थे॑ । आ । च॒ । परा॑ । च॒ । च॒र॒ति॒ । प्र॒ऽजा॒नन् ॥१०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रपथे पथामजनिष्ट पूषा प्रपथे दिवः प्रपथे पृथिव्याः। उभे अभि प्रियतमे सधस्थे आ च परा च चरति प्रजानन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रऽपथे । पथाम् । अजनिष्ट । पूषा । प्रऽपथे । दिव: । प्रऽपथे । पृथिव्या: । उभे इति । अभि । प्रियतमे इति प्रियऽतमे । सधऽस्थे इति सधऽस्थे । आ । च । परा । च । चरति । प्रऽजानन् ॥१०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (पूषा) पूषा, पोषण करनेवाला परमेश्वर (पथाम्) सब मार्गों में से (प्रपथे) चौड़े मार्ग में (दिवः) सूर्य के (प्रपथे) चौड़े मार्ग में और (पृथिव्याः) पृथिवी के (प्रपथे) चौड़े मार्ग में (अजनिष्ट) प्रकट हुआ है। (प्रजानन्) बड़ा विद्वान् वह (उभे) दोनों (प्रियतमे) [परस्पर] अति प्रिय (सधस्थे) एक साथ स्थिति करनेवाले [सूर्य और पृथिवी लोक] (अभि) में (आ) हमारे निकट (च च) और (परा) दूर (चरति) विचरता रहता है ॥१॥

    भावार्थ - जो परमात्मा सूर्य, पृथिवी आदि लोकों को परस्पर आकर्षण से धारण करता है, वही हमारा पालन पोषण करता है, चाहे हम अपने घर के निकट वा दूर हों ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० १०।१७।६ ॥


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    Meaning -
    Pusha, Lord Divine, all sustainer, bright as sun, beatific as moon and inspiring as soma, manifests, pervades, protects and guides on the highest of the paths of existence, on the path of heaven and on the path of the earth. Both of these, paths and havens of life, earthly and heavenly, the path of earthly prosperity, Abhyudaya, and the path of heavenly bliss, Nihshreyas, the Lord pervades, this one here and the other one there, knowing every thing and all, present, past and future.


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