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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 90 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 90/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - शत्रुबलनाशन सूक्त
    91

    अपि॑ वृश्च पुराण॒वद्व्र॒तते॑रिव गुष्पि॒तम्। ओजो॑ दा॒स्यस्य॑ दम्भय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अपि॑ । वृ॒श्च॒ । पु॒रा॒ण॒ऽवत् । व्र॒तते॑:ऽइव । गु॒ष्पि॒तम् । ओज॑: । दा॒सस्य॑ । द॒म्भ॒य॒ ॥९५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपि वृश्च पुराणवद्व्रततेरिव गुष्पितम्। ओजो दास्यस्य दम्भय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपि । वृश्च । पुराणऽवत् । व्रतते:ऽइव । गुष्पितम् । ओज: । दासस्य । दम्भय ॥९५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 90; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे राजन् !] (पुराणवत्) पुराण [पुराने नियम] के अनुसार (दास्यस्य) दुःखदायी डाकू के (ओजः) बल को (व्रततेः) बेल के (गुष्पितम्) इव) गाँठ के समान (अपि) निश्चय करके (वृश्च) काट दे और (दम्भय) हटा दे ॥१॥

    भावार्थ

    राजा चोर आदि दुष्टों का नाश करके प्रजा को सुखी रक्खे ॥१॥ मन्त्र १, २ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−८।४०।६ ॥

    टिप्पणी

    १−(अपि) अवधारणे (वृश्च) छिन्धि (पुराणवत्) पुरा नीयते पुराणम्। पुरा+णीञ् प्रापणे-ड। णत्वं च, वतिः सादृश्ये। पुरातननियमवत् (व्रततेः) अमेरतिः। उ० ४।५९। वृतु वर्तने-अति। व्रततिर्वरणाच्च सयनाच्च ततनाच्च-निरु० ६।२८। लतायाः (इव) यथा (गुष्पितम्) गुपू रक्षणे-क्त, षकारश्छान्दसः। गुपितम्। लताग्रन्थिम् (ओजः) बलम् (दासस्य) हिंसकस्य (दम्भय) दभि प्रेरणे। प्रेरय। निःसारय ॥

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    विषय

    दास के ओज का दम्भन

    पदार्थ

    १. हे अग्ने! [प्रभो अथवा राजन्!] (व्रतते:) = किसी बेल की (पुराणवत्) -= पुरानी (गुष्पितम्) = झाड़ झंकाड़-सी बनी हुई सूखी डालियों को जिस प्रकार माली खोज-खोजकर काट डालता है, उसी प्रकार आप (दासस्य) = [दस् उपक्षये] औरों का उपक्षय करनेवालों में सर्वाग्रणी पुरुष को [दासेषु उत्तम: दास्यः] (अपिवृश्च) = छिन्नांग कर डाल, इसप्रकार (ओज: दम्भय) = इसके ओज को विनष्ट कर दे।

    भावार्थ

    राजा का कर्तव्य है कि राष्ट्र में दुष्ट पुरुषों को इसप्रकार छिन्नांग कर दे जैसेकि माली बेलों की सूखी, पुरानी डालियों को काट डालता है। राजा औरों का उपक्षय करनेवाले के ओज को विनष्ट कर दे।

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    भाषार्थ

    (इव) जैसे (व्रततेः) लता के (गुष्पितम्) गुच्छे को काटा जाता है उस प्रकार (पुराणवत्) प्राचीन विधि के अनुसार [दासस्य] उपक्षयकारी [व्यभिचारी पुरुष के अण्डकोष या लिङ्ग] को (अपि वृश्च) काट दे। और (दासस्य) उपक्षयकारी के (ओजः) वीर्यजन्य ओज को (दम्भय) विनष्ट कर दे।

    टिप्पणी

    [व्यभिचारी के लिङ्ग के “अपि नह्याम्यस्य मेढ्रम्" द्वारा लिङ्ग-बन्धन का भी वर्णन हुआ है (७।९९।३)। जम्भय; जम्भयतिर्वधकर्मा इति यास्कः; तथा (निघं० २।१९; सायण)। वेदानुसार व्यभिचारी को ऐसा दण्ड पुराण-विधि है। ओजः= बलं प्रजननसमर्थ वीर्य वा जम्भय विनाशय (सायण)]

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    विषय

    नीच पुरुषों का दमन।

    भावार्थ

    हे राजन् अग्ने ! (व्रततेः इव) जिस प्रकार लताओं के (पुराण-वत्) पुराने (गुष्पितं) झाड़ झंकाड़ को माली खोज खोज कर काट डालता है उसी प्रकार तू (दासस्य) राष्ट्र में प्रजाजनों तथा धन सम्पत्ति का नाश करने वाले दुष्ट पुरुष के (ओजः) बल का (दम्भय) विनाश कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अंगिरा ऋषिः। मन्त्रोक्ताः देवताः। १ गायत्री। २ विराट् पुरस्ताद् बृहती। ३ त्र्यवसाना षट्पदा भुरिग् जगती। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Root out Violence

    Meaning

    As of old, cut down and root out the pride and splendour of the violent like the knot of a dried creeper, like a block in the way of progress.

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    Subject

    As in verses ; mantroktah

    Translation

    O Lord, like a tangle of old creepers, may you hack off and destroy the power of the infidel (dasa). (Also Rg. VIII.40.6)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.95.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    O King! tear as under as of old, the strength of the dacoit like the tangles of a creeping plant and demolish it.

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    Translation

    O King, just as a gardener lops off the tangles of a creeping plant, so do thou tear asunder and demolish the might of a violent person!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अपि) अवधारणे (वृश्च) छिन्धि (पुराणवत्) पुरा नीयते पुराणम्। पुरा+णीञ् प्रापणे-ड। णत्वं च, वतिः सादृश्ये। पुरातननियमवत् (व्रततेः) अमेरतिः। उ० ४।५९। वृतु वर्तने-अति। व्रततिर्वरणाच्च सयनाच्च ततनाच्च-निरु० ६।२८। लतायाः (इव) यथा (गुष्पितम्) गुपू रक्षणे-क्त, षकारश्छान्दसः। गुपितम्। लताग्रन्थिम् (ओजः) बलम् (दासस्य) हिंसकस्य (दम्भय) दभि प्रेरणे। प्रेरय। निःसारय ॥

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