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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 96 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 96/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कपिञ्जलः देवता - वयः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    31

    अस॑द॒न्गावः॒ सद॒नेऽप॑प्तद्वस॒तिं वयः॑। आ॒स्थाने॒ पर्व॑ता अस्थुः॒ स्थाम्नि॑ वृ॒क्काव॑तिष्ठिपम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अस॑दन् । गाव॑: । सद॑ने । अप॑प्तत् । व॒स॒तिम् । वय॑: । आ॒ऽस्थाने॑ । पर्व॑ता: । अ॒स्थु॒: । स्थाम्नि॑ । वृ॒क्कौ । अ॒ति॒ष्ठि॒प॒म् ॥१०१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    असदन्गावः सदनेऽपप्तद्वसतिं वयः। आस्थाने पर्वता अस्थुः स्थाम्नि वृक्कावतिष्ठिपम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    असदन् । गाव: । सदने । अपप्तत् । वसतिम् । वय: । आऽस्थाने । पर्वता: । अस्थु: । स्थाम्नि । वृक्कौ । अतिष्ठिपम् ॥१०१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 96; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (गावः) गौएँ (सदने) बैठक में (असदन्) बैठ गयी हैं, (वयः) पक्षी ने (वसतिम्) घोंसले में (अपप्तत्) बसेरा लिया है। (पर्वताः) पहाड़ (आस्थाने) विश्राम स्थान पर (अस्थुः) ठहर गये हैं, (वृक्कौ) दोनों रोक डालनेवाले वा रोकने योग्य [काम क्रोध] को (स्थाम्नि) स्थान पर (अतिष्ठिपम्) मैंने ठहरा दिया है ॥१॥

    भावार्थ - इस मन्त्र में (गृध्रौ) काम क्रोध का अर्थ गत सूक्त से आता है। जैसे गौएँ आदि अपने-अपने स्थान पर विश्राम करते हैं, ऐसे ही मनुष्य काम क्रोध को विद्या आदि से शान्त करके प्रसन्न रहें ॥१॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध कुछ भेद से आ चुका है-अ० ६।७७।१ ॥


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    Meaning -
    The senses are quiet, withdrawn, as cows resting in the stall, the bird of the mind has flown back home for rest, the clouds of imagination are back to rest in the mind, I have kept the two kidneys in proper place and function for eliminating the blocking and disturbing wastes and poisons of body chemistry.


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